महाजनपद और राज्यों का उदय

 


महाजनपद काल — इतिहास का एक महान मोड़

भारतीय इतिहास में कुछ कालखंड ऐसे होते हैं जो केवल एक युग का प्रतिनिधित्व नहीं करते — वे एक सभ्यता के समूचे भविष्य की दिशा निर्धारित करते हैं। छठी शताब्दी ईसापूर्व का भारत ऐसा ही एक असाधारण कालखंड था। इस काल में एक साथ इतने महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए कि इसे "इतिहास का अक्षीय काल" (Axial Age) कहा जाता है। यही वह युग था जब महाजनपदों का उदय हुआ, जब बुद्ध और महावीर ने धर्म की नई परिभाषाएँ दीं, जब मगध ने साम्राज्यवाद की नींव रखी और जब भारत की राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक चेतना एक नई ऊँचाई पर पहुँची।

"महाजनपद" शब्द दो शब्दों से बना है — "महा" अर्थात् महान और "जनपद" अर्थात् वह भूमि जहाँ कोई जन (जनजाति या समुदाय) अपने पाँव रखता है। ये महाजनपद उन विशाल और शक्तिशाली राज्यों को कहते हैं जो उत्तर वैदिक काल के छोटे-छोटे जनों से विकसित होकर छठी शताब्दी ईसापूर्व में उभरे। बौद्ध ग्रंथ "अंगुत्तर निकाय" और जैन ग्रंथ "भगवती सूत्र" में सोलह महाजनपदों की सूची मिलती है। ये सोलह महाजनपद भारत के विभिन्न भागों में फैले थे और इनमें से कुछ राजतंत्रात्मक थे तो कुछ गणतंत्रात्मक।

इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता थी — स्थायी और बड़े राज्यों का उदय। पहले जहाँ भारत में सैकड़ों छोटे-छोटे जन और कबीले थे, अब वे विलीन होकर बड़े राज्यों में समाहित होने लगे। लोहे के हथियारों ने सैन्य शक्ति बढ़ाई, कृषि की अधिकता ने राजकोष समृद्ध किया और व्यापार के विकास ने नगरों को जन्म दिया।


सोलह महाजनपद — भारत का प्रथम राजनीतिक मानचित्र

बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में जो सोलह महाजनपदों की सूची मिलती है, वह भारत का पहला व्यवस्थित राजनीतिक मानचित्र है। ये सोलह महाजनपद वर्तमान अफगानिस्तान से लेकर बिहार तक और हिमालय की तराई से लेकर गोदावरी नदी तक फैले हुए थे।

16 महाजनपद: राजधानी और शासन-प्रकार


महाजनपदराजधानीवर्तमान क्षेत्रशासन-प्रकार
मगधराजगृह/पाटलिपुत्रदक्षिण बिहारराजतंत्र
कोशलश्रावस्तीपूर्वी उत्तर प्रदेशराजतंत्र
वत्सकौशाम्बीइलाहाबाद क्षेत्रराजतंत्र
अवंतिउज्जयिनी/महिष्मतीमध्यप्रदेशराजतंत्र
वज्जिवैशालीउत्तरी बिहारगणराज्य
मल्लकुशीनगर/पावापूर्वी उत्तर प्रदेशगणराज्य
चेदिशक्तिमतीबुंदेलखंडराजतंत्र
कुरुइंद्रप्रस्थदिल्ली-हरियाणाराजतंत्र
पंचालअहिच्छत्र/काम्पिल्यउत्तर प्रदेशराजतंत्र
मत्स्यविराटनगरराजस्थानराजतंत्र
शूरसेनमथुरामथुरा क्षेत्रराजतंत्र
अश्मकपोतनमहाराष्ट्रराजतंत्र
गांधारतक्षशिलापाकिस्तान/अफगानिस्तानराजतंत्र
कंबोजराजपुर/हाटकपाकिस्तान/अफगानिस्तानगणराज्य
काशीवाराणसीउत्तर प्रदेशराजतंत्र
अंगचम्पापूर्वी बिहारराजतंत्र

इन सोलह महाजनपदों में से चार — मगध, कोशल, वत्स और अवंति — सबसे अधिक शक्तिशाली थे और इनके बीच ही आगे चलकर भारत के प्रभुत्व के लिए संघर्ष हुआ। अंततः मगध ने इस प्रतिस्पर्धा में विजय पाई और भारत के पहले महान साम्राज्य — मौर्य साम्राज्य — की नींव रखी।


गणराज्य और राजतंत्र — दो भिन्न राजनीतिक परंपराएँ

महाजनपद काल की सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक विशेषता यह थी कि इस काल में दो भिन्न शासन-प्रणालियाँ एक साथ विद्यमान थीं — राजतंत्र (Monarchy) और गणतंत्र (Republic)। यह विविधता भारत की लोकतांत्रिक चेतना की प्राचीनता का प्रमाण है।

राजतंत्रात्मक महाजनपदों में एक वंशानुगत राजा होता था जो सर्वोच्च शक्ति का केंद्र था। राजा की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद होती थी। न्याय, राजस्व और सैन्य प्रबंधन राजा के अधीन था। इन राज्यों में राजा को दैवीय या अर्ध-दैवीय दर्जा दिया जाता था।

गणतंत्रात्मक महाजनपदों में शासन एक परिषद के माध्यम से होता था। इन्हें "संघ" या "गण" कहते थे। परिषद के सदस्य — जिन्हें "राजन्" कहते थे — उस कुलीन परिवारों से आते थे जो क्षत्रिय वर्ण के थे। ये परिषदें बैठकें करती थीं और बहुमत से निर्णय लेती थीं।

प्रमुख गणराज्यों में वज्जि संघ, मल्ल, लिच्छवि, शाक्य, कोलिय, मोरिय और कंबोज सम्मिलित थे। शाक्य वह गणराज्य था जिसमें सिद्धार्थ गौतम (भविष्य के बुद्ध) का जन्म हुआ। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के प्रमुख थे। मल्ल गणराज्य में ही बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ।

इन गणराज्यों में एक विशेष प्रकार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी जो आधुनिक संसदीय लोकतंत्र की याद दिलाती है — परिषद की बैठकें, बहस, मतदान और बहुमत-आधारित निर्णय।


वज्जि संघ — विश्व का प्राचीनतम ज्ञात गणराज्य

वज्जि संघ — जिसकी राजधानी वैशाली थी — विश्व के प्राचीनतम ज्ञात गणराज्यों में से एक माना जाता है। यह गणराज्य उत्तरी बिहार में गंडक नदी के पूर्व में फैला हुआ था। वज्जि संघ वास्तव में कई छोटे गणराज्यों का एक परिसंघ था जिनमें लिच्छवि, विदेह, ज्ञातृक और वज्जि प्रमुख थे।

वज्जि संघ की शासन-व्यवस्था अत्यंत जटिल और विकसित थी। इसमें एक "महासन्निपात" (महाभोज या राष्ट्रीय संसद) होती थी जिसमें 7707 राजन् (प्रतिनिधि) होते थे। यह संख्या इस बात का प्रमाण है कि यहाँ की राजनीतिक भागीदारी कितनी व्यापक थी। महासन्निपात में सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय — युद्ध, शांति, कर-निर्धारण — लिए जाते थे।

लिच्छवि गणराज्य वज्जि संघ का सबसे शक्तिशाली अंग था। लिच्छवियों की राजधानी वैशाली उस काल के सबसे समृद्ध नगरों में से एक थी। बुद्ध ने वैशाली की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। आम्रपाली — वैशाली की प्रसिद्ध नगर-वधू और बुद्ध की भक्त — इसी लिच्छवि गणराज्य की थी।

वज्जि संघ की स्थायित्व का रहस्य उसकी सात नीतियों में था जिन्हें बुद्ध ने स्वयं बताया था — एकमत से निर्णय लेना, वृद्धों का सम्मान करना, स्त्रियों की रक्षा करना, धर्म का पालन करना और अर्हत साधुओं का सम्मान करना। यही नीतियाँ वज्जि संघ की शक्ति का स्रोत थीं और जब मगध के अजातशत्रु ने इन्हें षड्यंत्र से तोड़ा, तभी वज्जि संघ का पतन संभव हुआ।


मगध — साम्राज्यवाद का उद्गम

सोलह महाजनपदों में से मगध वह महाजनपद था जो आगे चलकर भारत के पहले महान साम्राज्य की नींव बना। दक्षिण बिहार में गंगा और सोन नदियों के बीच स्थित यह छोटा-सा राज्य अपनी भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधनों और कुशल शासकों के कारण धीरे-धीरे भारत की सबसे शक्तिशाली सत्ता बना।

मगध की शक्ति के कई कारण थे। भौगोलिक दृष्टि से — मगध तीन ओर से नदियों से घिरा था जो प्राकृतिक सुरक्षा का काम करती थीं। उत्तर में गंगा, दक्षिण में विंध्य पर्वत और पूर्व में चंपा नदी। आर्थिक दृष्टि से — मगध के निकट लोहे की खदानें थीं जो शक्तिशाली हथियार और कृषि-औजार बनाने में काम आती थीं। गंगा के मैदान की उपजाऊ भूमि कृषि उत्पादन में समृद्ध थी। सामरिक दृष्टि से — गंगा नदी व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग थी और मगध का इस पर नियंत्रण एक बड़ा लाभ था।

मगध की प्रारंभिक राजधानी "राजगृह" (आज का राजगीर, बिहार) थी जो पाँच पहाड़ियों से घिरी एक प्राकृतिक किलेबंदी वाली नगरी थी। बाद में "पाटलिपुत्र" (आज का पटना) मगध की राजधानी बनी जो गंगा, सोन और गंडक नदियों के संगम पर स्थित थी।

मगध में कई राजवंशों ने शासन किया — हर्यंक वंश, शिशुनाग वंश, नंद वंश और अंततः मौर्य वंश। प्रत्येक वंश ने मगध को और अधिक शक्तिशाली बनाया।


हर्यंक वंश — बिम्बिसार और अजातशत्रु की महागाथा

मगध का सबसे पहला ऐतिहासिक वंश हर्यंक वंश था। इस वंश के दो शासक — बिम्बिसार और अजातशत्रु — भारतीय इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण राजाओं में गिने जाते हैं।

बिम्बिसार (544-492 ईसापूर्व) — मगध के साम्राज्यवादी विस्तार का वास्तविक संस्थापक था। वह केवल 15 वर्ष की आयु में सिंहासन पर बैठा। उसने तीन महत्त्वपूर्ण नीतियों से मगध को शक्तिशाली बनाया —

विवाह-नीति: बिम्बिसार ने विवाह को एक कूटनीतिक हथियार बनाया। उसने कोशल की राजकुमारी महाकोसला से विवाह किया जिसके दहेज में काशी का एक गाँव मिला। लिच्छवि गणराज्य की राजकुमारी चेल्लना से भी विवाह किया। मद्र जनजाति की राजकुमारी क्षेमा से विवाह किया। इन विवाहों ने बिना युद्ध के शक्तिशाली मित्र प्राप्त किए।

विजय-नीति: बिम्बिसार ने अंग महाजनपद को जीतकर मगध में मिलाया। अंग की राजधानी चम्पा एक समृद्ध व्यापारिक केंद्र था।

प्रशासनिक सुधार: बिम्बिसार ने एक कुशल प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। उसने ग्राम-मुखिया की व्यवस्था की और राजकीय अधिकारियों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर की।

बिम्बिसार बुद्ध का समकालीन और प्रिय मित्र था। उसने बुद्ध को वेणुवन विहार भेंट किया। किंतु उसके अंत की कथा अत्यंत करुण है — उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसे बंदी बनाकर भूख से मार डाला।

अजातशत्रु (492-460 ईसापूर्व) — पितृहंता होने के बावजूद वह मगध का एक महान विस्तारवादी शासक था। उसने वज्जि संघ के विरुद्ध 16 वर्षों तक युद्ध किया और अंततः जीत हासिल की। कोशल को भी उसने परास्त किया।


शिशुनाग और नंद वंश — मगध की बढ़ती शक्ति

हर्यंक वंश के बाद मगध में शिशुनाग वंश का उदय हुआ। शिशुनाग (412-394 ईसापूर्व) ने अवंति को मगध में मिला लिया — यह एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी क्योंकि अवंति मगध का सबसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी था। अब चार महाजनपदों में से तीन — मगध, कोशल और अवंति — मगध के अधीन हो चुके थे।

शिशुनाग वंश के बाद नंद वंश आया जिसने मगध को एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया। महापद्मनंद नंद वंश का संस्थापक था। बौद्ध और जैन स्रोतों के अनुसार वह एक नाई या शूद्र पिता और क्षत्रिय माँ से उत्पन्न था। यह तथ्य उस काल की सामाजिक गतिशीलता का प्रमाण है।

नंद वंश के बारे में सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उन्होंने भारत का सबसे बड़ा सेना-संगठन बनाया। ग्रीक स्रोतों के अनुसार नंद सेना में 2 लाख पैदल सैनिक, 20,000 घुड़सवार, 2000 रथ और 3000 हाथी थे। यह एक अत्यंत विशाल और भयावह सैन्य शक्ति थी।

अंतिम नंद राजा धनानंद अत्यंत लोभी और क्रूर माना जाता था। उसके कोषागार में अपार धन था किंतु वह जनता पर अत्यधिक कर लगाता था। यही कारण था कि जब चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य ने उसके विरुद्ध विद्रोह किया, तो जनता ने नंद वंश का साथ नहीं दिया।


कोशल — श्रावस्ती की महान विरासत

कोशल महाजनपद मगध के सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वियों में से एक था। यह वर्तमान पूर्वी उत्तर प्रदेश में गंगा के उत्तर में स्थित था। इसकी राजधानी श्रावस्ती थी जो उस काल का एक प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र था।

कोशल के सबसे प्रसिद्ध शासक थे — प्रसेनजित (Pasenadi) जो बुद्ध का समकालीन और घनिष्ठ मित्र था। बौद्ध ग्रंथों में प्रसेनजित और बुद्ध के बीच अनेक ज्ञानपूर्ण संवादों का वर्णन है। प्रसेनजित ने श्रावस्ती में जेतवन विहार बनवाया जो बुद्ध के प्रिय आश्रय-स्थलों में से एक था।

कोशल का एक और महत्त्वपूर्ण नगर था — अयोध्या — जो रामायण की परंपरा के अनुसार भगवान राम की जन्मभूमि थी। इस काल में अयोध्या एक महत्त्वपूर्ण नगर था। कोशल के अधीन ही काशी (वाराणसी) था जो उस काल का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक और शैक्षिक केंद्र था।

अवंति महाजनपद वर्तमान मध्यप्रदेश में था। इसकी दो राजधानियाँ थीं — उत्तरी अवंति की उज्जयिनी (उज्जैन) और दक्षिणी अवंति की महिष्मती। उज्जयिनी उस काल में एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था और क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित होने के कारण धार्मिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण था।


वत्स और अन्य महाजनपद — विविध राजनीतिक परंपराएँ

वत्स महाजनपद वर्तमान इलाहाबाद के निकट कौशाम्बी को राजधानी बनाकर स्थापित था। इसके सबसे प्रसिद्ध शासक उदयन थे जो बुद्ध के समकालीन थे। उदयन की कहानी रोमांटिक प्रेम-कथाओं में भी मिलती है — उन्होंने वासवदत्ता से प्रेम-विवाह किया था।

कुरु महाजनपद — जिसकी राजधानी इंद्रप्रस्थ थी — महाभारत की कथाओं से जुड़ा था। यह वर्तमान दिल्ली और हरियाणा क्षेत्र में था। पंचाल महाजनपद — जिसकी दो राजधानियाँ अहिच्छत्र (उत्तरी पंचाल) और काम्पिल्य (दक्षिणी पंचाल) थीं — उत्तर प्रदेश के बरेली और फर्रुखाबाद क्षेत्र में था। द्रोणाचार्य पंचाल के थे और द्रौपदी भी पंचाल राजकुमारी थी।

मत्स्य महाजनपद — जिसकी राजधानी विराटनगर थी — वर्तमान राजस्थान के जयपुर-भरतपुर क्षेत्र में था। महाभारत की कथा में पांडवों ने अज्ञातवास यहीं बिताया था।

चेदि महाजनपद — जिसकी राजधानी शक्तिमती थी — वर्तमान बुंदेलखंड में था। शिशुपाल यहाँ का प्रसिद्ध राजा था जिसका कृष्ण से विवाद महाभारत में वर्णित है।

अंग महाजनपद — जिसकी राजधानी चम्पा थी — वर्तमान पूर्वी बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ भागों में था। महाभारत में कर्ण अंग के राजा थे। बाद में बिम्बिसार ने अंग को मगध में मिला लिया।

अश्मक — दक्षिण भारत का एकमात्र महाजनपद — वर्तमान महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के तट पर था। इसकी राजधानी पोतन थी।


गांधार और कंबोज — उत्तर-पश्चिम के शक्तिशाली राज्य

गांधार महाजनपद वर्तमान अफगानिस्तान और पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी जो प्राचीन भारत का सबसे प्रसिद्ध शिक्षा-केंद्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में गिना जाता है जहाँ विभिन्न देशों से छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते थे।

गांधार का महत्त्व इसलिए भी असाधारण था क्योंकि यह भारत और पश्चिम एशिया के बीच व्यापार-मार्ग पर स्थित था। आचार्य चाणक्य ने तक्षशिला में ही शिक्षा प्राप्त की थी और वहीं अर्थशास्त्र और राजनीति के अध्यापन का कार्य किया था। गांधार से ही बाद में "गांधार शैली" की मूर्तिकला विकसित हुई जो ग्रीक और भारतीय कला का अद्भुत संयोग था।

कंबोज महाजनपद वर्तमान पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा क्षेत्र में था। यह एक गणराज्य था जो अपनी घुड़सवार सेना के लिए प्रसिद्ध था। "कंबोज अश्व" उस काल के सर्वश्रेष्ठ घोड़े माने जाते थे।

गांधार और कंबोज दोनों 518 ईसापूर्व में ईरानी सम्राट दारयस प्रथम के साम्राज्य का हिस्सा बन गए। यह भारत का पहला विदेशी आक्रमण था जिसका प्रभाव भारतीय सांस्कृतिक जीवन पर पड़ा।


महाजनपद काल का आर्थिक जीवन — व्यापार और नगरीकरण

महाजनपद काल भारतीय आर्थिक इतिहास का एक अत्यंत गतिशील और परिवर्तनकारी दौर था। इस काल में तीन महत्त्वपूर्ण आर्थिक परिवर्तन हुए — सिक्कों का प्रचलन, लंबी दूरी के व्यापार का विकास और नगरों का उदय

पंच-मार्क सिक्के (Punch-marked Coins) — जिन्हें "आहत मुद्राएँ" भी कहते हैं — इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक उपलब्धि थी। चाँदी और तांबे के ये सिक्के व्यापार को सुगम बनाते थे। पहले विनिमय की मुख्य इकाई गाय और अनाज था — अब सिक्के ने उसकी जगह ली।

इस काल में "श्रेणी व्यवस्था" (Guild System) का भी विकास हुआ। एक ही व्यवसाय के व्यापारी और शिल्पी मिलकर एक श्रेणी बनाते थे। "श्रेष्ठि" (Sethi) श्रेणी का प्रमुख होता था। ये श्रेणियाँ बैंकिंग का कार्य भी करती थीं — ऋण देना, जमा रखना और व्यापारिक दस्तावेज बनाना।

नगरों का उदय इस काल की एक और महत्त्वपूर्ण घटना थी। राजगृह, पाटलिपुत्र, वैशाली, श्रावस्ती, उज्जयिनी, तक्षशिला, वाराणसी और कौशाम्बी — ये सब बड़े और समृद्ध नगर थे। इन नगरों में व्यापारी, शिल्पी, कारीगर और पुरोहित सभी रहते थे।

व्यापार-मार्ग भी इस काल में विकसित हुए। "उत्तरापथ" (Uttarapath) — जो बाद में "ग्रैंड ट्रंक रोड" बना — उत्तर-पश्चिम से पूर्व की ओर जाता था। "दक्षिणापथ" दक्षिण भारत की ओर जाता था। इन मार्गों पर "व्यापारिक सार्थवाह" (Caravans) चलते थे।


सामाजिक और धार्मिक जीवन — ब्राह्मण वर्चस्व और प्रतिक्रिया

महाजनपद काल में सामाजिक और धार्मिक जीवन में एक बड़ा तनाव था — एक ओर ब्राह्मणवादी परंपरा थी जो जटिल यज्ञों और वर्ण-व्यवस्था पर जोर देती थी, और दूसरी ओर उभरती हुई श्रमण परंपरा थी जो इन सबको चुनौती दे रही थी।

ब्राह्मणवादी परंपरा में यज्ञों की केंद्रीय भूमिका थी। राजा बड़े-बड़े यज्ञ करते थे जिनमें हजारों पशुओं की बलि दी जाती थी। पुरोहितों की शक्ति इन यज्ञों पर निर्भर थी। वर्ण-व्यवस्था जन्म-आधारित और कठोर हो चुकी थी।

किंतु इस व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रिया भी उभर रही थी। व्यापारी वर्ग — जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो रहा था — ब्राह्मणों की धार्मिक सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं करना चाहता था। क्षत्रिय राजा भी पुरोहितों की बाध्यता से मुक्त होना चाहते थे।

इसी पृष्ठभूमि में "श्रमण परंपरा" का उदय हुआ। श्रमण वे साधक थे जो वेदों के अधिकार को अस्वीकार करते थे, यज्ञों को व्यर्थ मानते थे और व्यक्तिगत साधना और नैतिक आचरण को सर्वोच्च महत्त्व देते थे।


बौद्ध और जैन धर्म — एक आध्यात्मिक क्रांति

महाजनपद काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी — बौद्ध और जैन धर्म का उदय। ये दोनों धर्म उसी सामाजिक और धार्मिक असंतोष की उपज थे जो ब्राह्मणवादी वर्चस्व और जटिल कर्मकांडों के विरुद्ध उभर रहा था।

महावीर (599-527 ईसापूर्व) — जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर — वैशाली के निकट कुंडग्राम में जन्मे थे। वे लिच्छवि गणराज्य के एक क्षत्रिय परिवार से थे। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने गृह-त्याग किया, 12 वर्षों की कठोर साधना के बाद "केवल-ज्ञान" प्राप्त किया। महावीर ने "अहिंसा", "सत्य", "अस्तेय" (चोरी न करना), "ब्रह्मचर्य" और "अपरिग्रह" (संग्रह न करना) — इन पाँच सिद्धांतों पर आधारित एक नैतिक धर्म की स्थापना की।

गौतम बुद्ध (563-483 ईसापूर्व) — बौद्ध धर्म के संस्थापक — शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी में जन्मे थे। उनका नाम सिद्धार्थ था और वे राजकुमार थे। 29 वर्ष की आयु में उन्होंने "महाभिनिष्क्रमण" किया — गृह-त्याग। 35 वर्ष की आयु में बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें "ज्ञान-प्राप्ति" हुई।

बुद्ध ने "मध्यम-मार्ग" का उपदेश दिया — न अत्यधिक विलास, न अत्यधिक तपस्या। उनके "चार आर्य सत्य" और "अष्टांगिक मार्ग" मानवता के लिए एक व्यावहारिक नैतिक जीवन-पद्धति थे।


सिकंदर का आक्रमण — भारत और यूनान का पहला मिलन

326 ईसापूर्व में एक ऐसी घटना घटी जिसने भारतीय इतिहास को एक नया आयाम दिया — मेसिडोनिया के यूनानी सम्राट सिकंदर (Alexander the Great) ने भारत पर आक्रमण किया। यह भारत और पश्चिमी विश्व का पहला बड़ा राजनीतिक संपर्क था।

सिकंदर ईरान, बैक्ट्रिया और अफगानिस्तान को जीतते हुए खैबर दर्रे के रास्ते भारत में प्रवेश किया। उसने गांधार और कंबोज को जीता और तक्षशिला के राजा आम्भी ने बिना युद्ध के उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

किंतु जब सिकंदर झेलम नदी के पार गया, तो उसका सामना पुरु (Porus) के साथ हुआ। "हाइडास्पीज का युद्ध" (Battle of Hydaspes, 326 ईसापूर्व) भारतीय इतिहास की एक यादगार लड़ाई है। पुरु एक विशाल काया के साहसी और स्वाभिमानी राजा थे। युद्ध में पुरु की सेना पराजित हुई किंतु उनका साहस और गरिमा देखकर सिकंदर ने उनका राज्य वापस कर दिया और उन्हें अपना मित्र बनाया।

सिकंदर आगे व्यास नदी तक पहुँचा। किंतु यहाँ उसकी सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। नंद वंश की विशाल सेना का डर और लंबे अभियान की थकान — इन दोनों कारणों से सिकंदर को वापस लौटना पड़ा।

सिकंदर के आक्रमण के दीर्घकालीन प्रभाव महत्त्वपूर्ण थे। इसने उत्तर-पश्चिम भारत में यूनानी बस्तियाँ और प्रशासनिक केंद्र स्थापित किए। भारत और यूनान के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध बने।


महाजनपद काल की विरासत — मौर्य साम्राज्य का द्वार

महाजनपद काल भारतीय इतिहास का वह संधि-काल था जब छोटे-छोटे जन और राज्य एकजुट होकर एक महान राष्ट्रीय राज्य बनाने की दिशा में बढ़ रहे थे। यह काल मौर्य साम्राज्य का पूर्व-अभ्यास था।

महाजनपद काल की सबसे महत्त्वपूर्ण विरासत थी — राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया। छोटे राज्यों का बड़े राज्यों में विलय, बड़े राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा और अंततः मगध की सर्वोच्चता — यह एक स्वाभाविक ऐतिहासिक प्रक्रिया थी जो भारत को एक सूत्र में पिरो रही थी।

इस काल की दूसरी महत्त्वपूर्ण विरासत थी — लोकतांत्रिक परंपरा। वज्जि संघ, लिच्छवि, मल्ल और शाक्य गणराज्यों ने यह सिद्ध किया कि भारत में प्रजातांत्रिक शासन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। यह परंपरा भले ही इन गणराज्यों के पतन के साथ राजनीतिक रूप से लुप्त हो गई, किंतु इसकी स्मृति भारतीय चेतना में बनी रही।

बौद्ध और जैन धर्म की विरासत भी असाधारण है। इन धर्मों ने न केवल भारत, बल्कि समूचे एशिया को प्रभावित किया। अहिंसा, करुणा और सत्य के मूल्य जो बुद्ध और महावीर ने दिए, वे आज भी मानवता के लिए प्रासंगिक हैं।

और अंततः — महाजनपद काल के गर्भ से एक ऐसे महापुरुष का जन्म हुआ जिसने भारत के राजनीतिक इतिहास को पूरी तरह बदल दिया — चंद्रगुप्त मौर्य, जिन्होंने आचार्य चाणक्य के मार्गदर्शन में नंद वंश को उखाड़ फेंका और भारत का पहला महान साम्राज्य स्थापित किया। महाजनपद काल इसी महान राजनीतिक परिवर्तन की भूमिका था।

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