पोस्ट-मौर्य काल (Post-Mauryan Period)

 


पोस्ट-मौर्य काल — विखंडन और पुनर्निर्माण का युग

भारतीय इतिहास में पोस्ट-मौर्य काल — लगभग 185 ईसापूर्व से 320 ईस्वी तक — एक ऐसा कालखंड है जो पहली दृष्टि में अराजकता और विखंडन का युग लगता है। मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति के टूटने के बाद भारत के विभिन्न भागों में अनेक छोटे-बड़े राज्यों का उदय हुआ। उत्तर-पश्चिम से यूनानी, शक, पार्थियन और कुषाण आए। दक्षिण में सातवाहनों ने अपनी सत्ता स्थापित की। मगध में शुंग और कण्व वंशों ने शासन किया।

किंतु इस कालखंड को केवल "राजनीतिक अव्यवस्था" का काल कहना न्यायसंगत नहीं होगा। यह वास्तव में एक ऐसा काल था जिसमें भारतीय सभ्यता की अद्भुत आत्मसात करने की क्षमता का प्रदर्शन हुआ। विदेशी विजेता भारत आए और भारत ने उन्हें अपने में समाहित कर लिया। यूनानी, शक और कुषाण — ये सब एक पीढ़ी या दो पीढ़ियों में भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग बन गए। उन्होंने भारतीय धर्म अपनाए, भारतीय परंपराओं का सम्मान किया और भारतीय कला को संरक्षण दिया।

इस काल की सबसे बड़ी उपलब्धि थी — "गांधार कला शैली" का विकास, "सिल्क रोड" के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का उत्कर्ष, बौद्ध धर्म का एशिया में प्रसार और "संगम साहित्य" के रूप में तमिल साहित्य का उद्भव। यह काल भारत के सांस्कृतिक और बौद्धिक इतिहास का एक अत्यंत समृद्ध और जीवंत अध्याय है।


शुंग वंश — ब्राह्मण पुनरुत्थान और सांची का स्तूप

185 ईसापूर्व में पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य राजा बृहद्रथ की हत्या करके शुंग वंश की स्थापना की। यह केवल एक राजवंश परिवर्तन नहीं था — यह एक विचारधारात्मक बदलाव भी था। मौर्य काल में बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण मिला था; शुंगों के साथ ब्राह्मणवादी परंपरा पुनः सत्ता के केंद्र में आ गई।

पुष्यमित्र शुंग एक सेनापति था जिसने सत्ता पर कब्जा किया। उसे परंपरागत रूप से बौद्ध-विरोधी बताया जाता है। बौद्ध ग्रंथ "दिव्यावदान" में उल्लेख है कि उसने बौद्ध मठों को नष्ट किया और बौद्ध भिक्षुओं को सताया। किंतु आधुनिक इतिहासकार इस वर्णन को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं। सांची का "महास्तूप" — जो मूलतः अशोक ने बनवाया था — को शुंग काल में ही विस्तारित और परिष्कृत किया गया।

पुष्यमित्र शुंग ने दो "अश्वमेध यज्ञ" किए — यह वैदिक परंपरा का पुनरुद्धार था। उसके यज्ञों का पुरोहित महान व्याकरणशास्त्री पतंजलि था जिन्होंने "महाभाष्य" की रचना की। इस काल में वैदिक कर्मकांड पुनः लोकप्रिय हुए।

शुंग वंश के राजाओं में अग्निमित्र उल्लेखनीय है — कालिदास का प्रसिद्ध नाटक "मालविकाग्निमित्रम्" इसी अग्निमित्र पर आधारित है। शुंग वंश ने लगभग 112 वर्षों (185-73 ईसापूर्व) तक शासन किया। इस वंश के शासन का केंद्र विदिशा (वर्तमान मध्यप्रदेश) था।


कण्व वंश और सातवाहन — मगध और दक्षिण में नई शक्तियाँ

शुंग वंश के अंतिम राजा देवभूति को उसके ब्राह्मण मंत्री वासुदेव कण्व ने 73 ईसापूर्व में मारकर कण्व वंश की स्थापना की। यह वंश अत्यंत अल्पकालिक था — केवल 45 वर्षों (73-28 ईसापूर्व) तक शासन किया। कण्व वंश के चार राजा हुए — वासुदेव, भूमिमित्र, नारायण और सुशर्मन। 28 ईसापूर्व में सातवाहन शासक सिमुक ने सुशर्मन को मारकर कण्व वंश का अंत किया।

सातवाहन वंश पोस्ट-मौर्य काल की सबसे महत्त्वपूर्ण और दीर्घकालिक शक्ति थी। इसने लगभग तीन शताब्दियों (पहली शताब्दी ईसापूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी) तक दक्कन और मध्य भारत पर शासन किया।

सातवाहनों की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद है। उनकी प्रारंभिक राजधानी प्रतिष्ठान (आज का पैठन, महाराष्ट्र में) थी। सातवाहन वंश के सबसे महान शासक थे —

गौतमीपुत्र शातकर्णि (106-130 ईस्वी) — जिन्हें "तीन समुद्रों का स्वामी" कहा जाता था। उनकी माता गौतमी बलश्री के नासिक शिलालेख में उनकी उपलब्धियों का विस्तृत वर्णन है। उन्होंने शकों को परास्त करके अपना खोया हुआ राज्य वापस पाया।

वशिष्ठिपुत्र पुलमावि — जिन्होंने रोमन साम्राज्य के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए। अमरावती में उनके शासनकाल की उत्कृष्ट कला के नमूने मिले हैं।

सातवाहनों का सांस्कृतिक योगदान असाधारण था। उन्होंने प्राकृत भाषा को संरक्षण दिया। अमरावती और नागार्जुनकोंडा के स्तूपों का निर्माण इसी काल में हुआ।


हिंद-यूनानी शासक — यूनान और भारत का सांस्कृतिक मिलन

पोस्ट-मौर्य काल की सबसे रोचक घटना थी — हिंद-यूनानी शासकों (Indo-Greek Kings) का भारत पर शासन। ये वे यूनानी थे जो सिकंदर के बाद बैक्ट्रिया (आज के अफगानिस्तान) में बस गए थे और धीरे-धीरे उत्तर-पश्चिमी भारत पर अधिकार कर लिया।

डिमेट्रियस (190-180 ईसापूर्व) पहला हिंद-यूनानी राजा था जिसने भारत में प्रवेश किया। उसने पंजाब और सिंध पर अधिकार जमाया। उसके सिक्कों पर वह हाथी की खाल की टोपी पहने हुए है — यह भारत पर विजय का प्रतीक था।

किंतु हिंद-यूनानी शासकों में सबसे प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण थे — मिनांडर (165-145 ईसापूर्व) — जिन्हें बौद्ध परंपरा में "मिलिंद" कहा जाता है। बौद्ध ग्रंथ "मिलिंदपन्हो" (मिलिंद के प्रश्न) में उनका और बौद्ध भिक्षु नागसेन का एक प्रसिद्ध दार्शनिक संवाद वर्णित है। इस संवाद में मिलिंद ने बौद्ध धर्म के कठिनतम प्रश्न पूछे और नागसेन ने उनका उत्तर दिया।

मिनांडर/मिलिंद ने बौद्ध धर्म अंगीकार किया। उनके सिक्कों पर एक ओर धर्मचक्र है और दूसरी ओर यूनानी शैली की आकृतियाँ — यह सांस्कृतिक समन्वय का एक अद्भुत प्रतीक है।

हिंद-यूनानी शासन का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान था — "गांधार कला शैली" को जन्म देना। इस कला में बुद्ध की मूर्तियों पर यूनानी शिल्प का स्पष्ट प्रभाव है — बुद्ध की मूर्तियों में यूनानी देवताओं जैसी शारीरिक बनावट और वस्त्र-विन्यास दिखाई देता है।


शक (सीथियन) — मध्य एशिया से आए विजेता

शक (Shakas) या सीथियन मध्य एशिया के घुमंतू योद्धा थे जो लगभग पहली शताब्दी ईसापूर्व में भारत में आए। उन्होंने पहले हिंद-यूनानी शासकों को पराजित किया और फिर उत्तर-पश्चिमी भारत में अपने राज्य स्थापित किए।

शकों ने भारत में "क्षत्रप व्यवस्था" स्थापित की — क्षत्रप (Satraps) ईरानी शब्द "क्षत्रपाण" से आया है जिसका अर्थ है प्रांतीय शासक। शकों ने उत्तरी क्षत्रप (उत्तर-पश्चिम में) और पश्चिमी क्षत्रप (गुजरात और महाराष्ट्र में) स्थापित किए।

पश्चिमी क्षत्रप सबसे महत्त्वपूर्ण और दीर्घकालिक थे। इनमें सबसे प्रसिद्ध शासक था — रुद्रदामन प्रथम (130-150 ईस्वी) — जो जूनागढ़ शिलालेख के लिए प्रसिद्ध है। यह शिलालेख संस्कृत गद्य का सबसे प्रारंभिक उदाहरण माना जाता है। इस शिलालेख में बताया गया है कि रुद्रदामन ने सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार करवाया — यह झील मूलतः मौर्य काल में बनी थी।

रुद्रदामन ने सातवाहनों को दो बार पराजित किया किंतु उन्हें पूरी तरह नष्ट नहीं किया क्योंकि उनकी पुत्री सातवाहन वंश में विवाहित थी। यह मध्यकालीन भारतीय कूटनीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

शकों ने अंततः भारतीय संस्कृति को पूरी तरह अपनाया। उन्होंने संस्कृत को राजकीय भाषा बनाया, हिंदू धर्म अपनाया और भारतीय परंपराओं का सम्मान किया। शकों का भारतीय समाज में विलय भारत की सांस्कृतिक आत्मसात की क्षमता का जीवंत प्रमाण है।


पार्थियन (पहलव) और उनका अल्पकालिक प्रभाव

पार्थियन (Parthians) — जिन्हें भारतीय स्रोतों में "पहलव" कहते हैं — ईरानी मूल के थे। उन्होंने भारत में एक अल्पकालिक किंतु रोचक उपस्थिति दर्ज की।

पार्थियन शासकों में सबसे प्रसिद्ध था — गोंडोफर्नीज (Gondophernes, लगभग 20-46 ईस्वी)। ईसाई परंपरा में संत थॉमस को भारत में ईसाई धर्म का पहला प्रचारक माना जाता है और उनका संबंध गोंडोफर्नीज के दरबार से जोड़ा जाता है। यदि यह परंपरा सत्य है, तो गोंडोफर्नीज का काल भारत में ईसाई धर्म के प्रवेश का पहला ऐतिहासिक संदर्भ है।

गोंडोफर्नीज के सिक्के तक्षशिला और अफगानिस्तान में मिले हैं। उनके कुछ सिक्कों पर ग्रीक और कुछ पर खरोष्ठी लिपि है — यह उस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता का प्रमाण है।

पार्थियन शासन अधिक समय तक नहीं चला। कुषाणों के आगमन से उनका प्रभाव समाप्त हो गया। किंतु पार्थियन सांस्कृतिक प्रभाव — विशेषतः पहलवी भाषा और ईरानी कला शैली का — भारतीय संस्कृति पर अवश्य पड़ा।

पार्थियन काल में व्यापार का विशेष महत्त्व था। ईरानी उच्चभूमि से होकर जाने वाले व्यापार-मार्ग पर पार्थियनों का नियंत्रण था और वे भारत और रोम के बीच व्यापार में मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे।


कुषाण साम्राज्य — पोस्ट-मौर्य काल की सबसे बड़ी शक्ति

कुषाण साम्राज्य पोस्ट-मौर्य काल की सबसे शक्तिशाली और विस्तृत राजनीतिक शक्ति थी। कुषाण मूलतः "युएझी" (Yuezhi) कबीले के थे जो मध्य एशिया के घुमंतू लोग थे। उन्हें हुनों ने उनकी मूल भूमि से खदेड़ा था जिसके बाद वे बैक्ट्रिया होते हुए भारत पहुँचे।

कुषाण वंश के संस्थापक कुजुल कडफिसेस ने पहली शताब्दी ईस्वी में कुषाण साम्राज्य की नींव रखी। उनके उत्तराधिकारी विम कडफिसेस ने उत्तर-पश्चिमी भारत पर अधिकार किया। किंतु कुषाण साम्राज्य का वास्तविक स्वर्ण युग आया कनिष्क प्रथम के शासनकाल में।

कुषाण साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर अत्यंत विशाल था। इसमें मध्य एशिया (बैक्ट्रिया, सोग्डियाना), अफगानिस्तान, पाकिस्तान, उत्तर-पश्चिमी भारत और गंगा के मैदान का बड़ा हिस्सा सम्मिलित था।

कुषाण वंश के प्रमुख शासक और उनकी उपलब्धियाँ

कुषाण शासककालप्रमुख उपलब्धि
कुजुल कडफिसेस30-80 ईस्वीसाम्राज्य की नींव
विम कडफिसेस80-105 ईस्वीउत्तर भारत पर अधिकार
कनिष्क प्रथम105-127 ईस्वीस्वर्ण युग
हुविष्क127-150 ईस्वीसाम्राज्य का विस्तार
वासुदेव150-190 ईस्वीहिंदू धर्म की ओर झुकाव

कुषाणों की राजधानियाँ पेशावर (पुरुषपुर) और मथुरा थीं — एक उत्तर-पश्चिम में और एक गंगा के मैदान में। यह दो-केंद्रीय व्यवस्था उनके विशाल साम्राज्य के प्रशासन की आवश्यकता से उत्पन्न हुई थी।


कनिष्क — कुषाण साम्राज्य का महानतम शासक

कनिष्क प्रथम कुषाण साम्राज्य का सबसे महान और प्रसिद्ध शासक था। उसके शासन-काल की सटीक तिथि विवादास्पद है — विभिन्न विद्वान 78 ईस्वी, 105 ईस्वी या 127 ईस्वी को उसके राज्यारोहण का वर्ष मानते हैं। एक मत के अनुसार 78 ईस्वी में आरंभ होने वाला शक संवत् कनिष्क से ही जुड़ा है।

कनिष्क एक महान विजेता था। उसने पाटलिपुत्र को जीता, कश्मीर को अपने साम्राज्य में मिलाया और चीन के साथ युद्ध में भी सफलता प्राप्त की। उसके साम्राज्य की सीमाएँ अफगानिस्तान से बिहार तक और मध्य एशिया के कुछ भागों तक फैली थीं।

कनिष्क का सबसे बड़ा योगदान था — बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित करना और उसे अंतर्राष्ट्रीय धर्म बनाना। उसने "चतुर्थ बौद्ध संगीति" का आयोजन किया जो कश्मीर में हुई। इस संगीति में अश्वघोष, नागार्जुन और वसुमित्र जैसे महान बौद्ध विद्वान सम्मिलित हुए।

कनिष्क ने बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय को संरक्षण दिया — जो बाद में चीन, जापान, कोरिया और तिब्बत में फैला। उसके राजकीय संरक्षण में बौद्ध ग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद किया गया।

कनिष्क के सिक्के अत्यंत रोचक हैं — उन पर भारतीय, ईरानी, यूनानी और बौद्ध सभी प्रकार की आकृतियाँ मिलती हैं। यह उसके बहुसांस्कृतिक साम्राज्य और सर्वधर्म-समभाव का प्रतीक है।


पोस्ट-मौर्य काल की अर्थव्यवस्था — व्यापार का स्वर्ण युग

पोस्ट-मौर्य काल भारतीय आर्थिक इतिहास का एक अत्यंत समृद्ध और गतिशील दौर था। इस काल में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अपने चरमोत्कर्ष पर था और भारत विश्व की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं में से एक था।

रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक विशेषता थी। रोमन इतिहासकार प्लिनी ने लिखा कि रोम प्रतिवर्ष भारत को 55 मिलियन सेस्टर्स (रोमन सिक्के) देता था — यह एक विशाल धन-प्रवाह था जो भारत के पक्ष में था। रोम से सोना और चाँदी भारत आती थी और भारत से मसाले, मलमल, रेशम, हाथीदाँत, रत्न, इत्र और नील रोम जाते थे।

"पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी" — एक यूनानी नाविक द्वारा पहली शताब्दी ईस्वी में लिखा गया यह ग्रंथ — भारत के बंदरगाहों और व्यापार का अत्यंत विस्तृत विवरण देता है। इसमें भरूच (Barygaza), मुजिरिस, अरिकामेडु और अन्य बंदरगाहों का वर्णन है।

सिक्के इस काल की आर्थिक समृद्धि के स्पष्ट प्रमाण हैं। कुषाण सोने के "दीनार" सिक्के बनाते थे जो रोमन "ऑरियस" के समकक्ष थे — यह दोनों साम्राज्यों के बीच व्यापारिक संबंध का प्रमाण है।

श्रेणी व्यवस्था (Guild System) इस काल में अत्यंत विकसित थी। "महाश्रेणी" (महान श्रेणी) बड़े व्यापारिक संगठन थे जो बैंकिंग, बीमा और व्यापारिक विवादों के निपटारे का काम करते थे।


सिल्क रोड — भारत का विश्व से जुड़ाव

"सिल्क रोड" — इतिहास का सबसे प्रसिद्ध व्यापार-मार्ग — पोस्ट-मौर्य काल में अपने चरमोत्कर्ष पर था। यह मार्ग चीन से आरंभ होकर मध्य एशिया, ईरान, मेसोपोटामिया होते हुए रोमन साम्राज्य तक जाता था। भारत इस मार्ग पर एक महत्त्वपूर्ण और समृद्ध पड़ाव था।

कुषाण साम्राज्य सिल्क रोड के एक महत्त्वपूर्ण भाग को नियंत्रित करता था। तक्षशिला और पेशावर सिल्क रोड पर प्रमुख व्यापारिक केंद्र थे। यहाँ से माल भारत और चीन दोनों दिशाओं में जाता था।

भारत से सिल्क रोड के माध्यम से क्या जाता था और क्या आता था —

भारत से निर्यात: मसाले (काली मिर्च, इलायची, दालचीनी), सूती वस्त्र, रेशमी वस्त्र, हाथीदाँत, रत्न (हीरा, माणिक, नीलम), इत्र, नील, चावल और इस्पात।

भारत में आयात: सोना और चाँदी (रोम से), रेशम (चीन से), घोड़े (मध्य एशिया से), शराब और काँच (रोम से)।

सिल्क रोड केवल वस्तुओं का मार्ग नहीं था — यह विचारों, धर्मों और संस्कृतियों का भी मार्ग था। बौद्ध धर्म इसी मार्ग से चीन, कोरिया और जापान पहुँचा। ईसाई धर्म के कुछ प्रारंभिक प्रभाव भी इसी मार्ग से भारत में पहुँचे।


गांधार और मथुरा कला शैली — दो महान परंपराओं का उदय

पोस्ट-मौर्य काल भारतीय कला के इतिहास में एक क्रांतिकारी युग था। इस काल में दो महान कला शैलियाँ उभरीं — गांधार कला शैली और मथुरा कला शैली — जिन्होंने बुद्ध की मूर्तिकला की दो भिन्न परंपराओं को जन्म दिया।

गांधार कला शैली पेशावर और तक्षशिला क्षेत्र में विकसित हुई। इस पर यूनानी और रोमन कला का गहरा प्रभाव था। गांधार शैली की विशेषताएँ —

बुद्ध की मूर्तियों में यूनानी देवताओं जैसी शारीरिक बनावट। मोटे, लहराते वस्त्र जो यूनानी मूर्तिकला की याद दिलाते हैं। बालों में लहरें (wavy hair) — जो अपोलो की मूर्तियों से प्रेरित था। कथा-फलकों में जीवंत और गतिशील दृश्य।

मथुरा कला शैली गंगा के मैदान में विकसित हुई और यह पूरी तरह भारतीय परंपरा पर आधारित थी। मथुरा शैली की विशेषताएँ —

बुद्ध की मूर्तियों में भारतीय शरीर-सौष्ठव। पतले, चिपके हुए वस्त्र जो शरीर की रेखाएँ स्पष्ट करते हैं। उष्णीष (सिर पर उभार) — ज्ञान का प्रतीक। सरल और आत्मिक अभिव्यक्ति।

अमरावती कला शैली आंध्र में सातवाहन काल में विकसित हुई। इस शैली में बुद्ध को प्रतीकों के माध्यम से दिखाया जाता था — पैरों के निशान, छाता, धर्मचक्र। बाद में मानव रूप में भी दर्शाया गया।


पोस्ट-मौर्य काल का धार्मिक जीवन — विविधता और समन्वय

पोस्ट-मौर्य काल भारतीय धार्मिक इतिहास में एक अत्यंत गतिशील और विविधतापूर्ण युग था। इस काल में बौद्ध, जैन, हिंदू और विदेशी धर्म एक साथ फले-फूले।

बौद्ध धर्म में इस काल में एक महत्त्वपूर्ण विभाजन हुआ। "हीनयान" (Theravada) और "महायान" (Mahayana) — दो प्रमुख संप्रदाय उभरे। हीनयान व्यक्तिगत मुक्ति पर जोर देता था जबकि महायान ने "बोधिसत्त्व" की अवधारणा विकसित की — जो जीव अपनी मुक्ति को दूसरों की मुक्ति के लिए स्थगित करता है।

"नागार्जुन" — जिन्हें "बौद्ध दर्शन का आइंस्टीन" कहा जाता है — इसी काल में हुए। उन्होंने "माध्यमिक दर्शन" (शून्यवाद) की स्थापना की। उनका मत था कि सभी वस्तुएँ अपने-आप में खाली (शून्य) हैं — उनका अस्तित्व केवल अन्य वस्तुओं के संबंध में है।

"अश्वघोष" — कनिष्क के दरबारी कवि — ने "बुद्धचरित" लिखा जो बुद्ध के जीवन पर संस्कृत का प्रथम महाकाव्य है। उन्होंने "सौंदरानंद" भी लिखा।

हिंदू धर्म में इस काल में "वैष्णव" और "शैव" संप्रदायों का विकास हुआ। "भागवत धर्म" का उदय हुआ जिसमें विष्णु या कृष्ण की भक्ति पर जोर था। हेलियोडोरस स्तंभ (विदिशा, मध्यप्रदेश) इस काल का एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है — इस पर लिखा है कि हेलियोडोरस (एक यूनानी राजदूत) "भागवत" (वैष्णव) हो गए थे।


संगम साहित्य — दक्षिण भारत की महान साहित्यिक परंपरा

पोस्ट-मौर्य काल में दक्षिण भारत में एक ऐसी साहित्यिक परंपरा का उदय हुआ जो उत्तर भारत की संस्कृत परंपरा से बिल्कुल अलग थी — "संगम साहित्य" (Sangam Literature)। यह तमिल भाषा की सबसे प्राचीन साहित्यिक कृतियों का संग्रह है।

"संगम" का अर्थ है — कवियों की सभा। परंपरा के अनुसार तीन संगम हुए जिनमें तमिल कवियों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। तृतीय संगम की रचनाएँ ही उपलब्ध हैं जो लगभग 300 ईसापूर्व से 300 ईस्वी के बीच की हैं।

संगम साहित्य दो श्रेणियों में विभाजित है —

"अकम्" (Akam) साहित्य — प्रेम और आंतरिक भावनाओं पर केंद्रित। इसमें प्रकृति के विभिन्न परिदृश्यों — पर्वत, समुद्र तट, वन, मैदान — को प्रेम की विभिन्न अवस्थाओं से जोड़ा गया।

"पुरम्" (Puram) साहित्य — युद्ध, वीरता, राजाओं की प्रशंसा और बाह्य जीवन पर केंद्रित।

संगम साहित्य की प्रमुख कृतियाँ हैं —

"तोल्काप्पियम्" — तमिल व्याकरण का सबसे प्राचीन ग्रंथ। "पुरनानूरु" — 400 पुरम् कविताओं का संग्रह। "नट्टिनाई" — 400 अकम् कविताओं का संग्रह। "तिरुक्कुरल्"तिरुवल्लुवर की रचना जो नैतिकता, प्रेम और राजनीति पर 1330 द्विपदियों का संग्रह है।

संगम साहित्य का ऐतिहासिक महत्त्व असाधारण है। इसमें तमिल नाडु के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन का विस्तृत चित्रण है। इसमें रोम के साथ व्यापार, मुजिरिस बंदरगाह की समृद्धि और तीन तमिल राजवंशोंचेर, चोल और पांड्य — का वर्णन मिलता है।


दक्षिण के तीन राजवंश — चेर, चोल और पांड्य

पोस्ट-मौर्य काल में दक्षिण भारत में तीन प्रमुख राजवंश शासन कर रहे थे — चेर, चोल और पांड्य। ये तीनों राजवंश संगम काल में अपने चरमोत्कर्ष पर थे।

चेर (Chera) वंश वर्तमान केरल और तमिलनाडु के पश्चिमी भाग में था। इनकी राजधानी वांजि थी। मुजिरिस (आज का कोडुंगल्लूर) इनका प्रमुख बंदरगाह था जहाँ से रोम के साथ व्यापार होता था।

चोल (Chola) वंश वर्तमान तमिलनाडु के मध्य और उत्तरी भाग में था। इनकी राजधानी उरैयूर थी। संगम काल में करिकाल चोल सबसे प्रसिद्ध शासक था जिसने कावेरी नदी पर एक विशाल बाँध बनवाया।

पांड्य (Pandya) वंश वर्तमान दक्षिणी तमिलनाडु में था। इनकी राजधानी मदुरै थी जो संगम साहित्य का प्रमुख केंद्र था। पांड्य शासकों ने रोम के साथ सीधे राजनयिक संबंध रखे — उन्होंने ऑगस्टस सीजर के दरबार में दूत भेजे।

संगम काल में दक्षिण भारत की अर्थव्यवस्था अत्यंत समृद्ध थी। काली मिर्च — जिसे "काला सोना" कहते थे — दक्षिण से रोम जाती थी। मुसलियन मलमल विश्व का सबसे उत्कृष्ट सूती वस्त्र था।


पोस्ट-मौर्य काल की विरासत — गुप्त साम्राज्य की भूमिका

पोस्ट-मौर्य काल — अपनी सारी जटिलताओं, विखंडनों और सांस्कृतिक मिश्रणों के साथ — भारतीय इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जिसने अगले महान युग — गुप्त काल — की नींव रखी।

इस काल की सबसे बड़ी और स्थायी विरासत थी — सांस्कृतिक समन्वय। यूनानी, शक, पार्थियन और कुषाण — ये सब भारत में आए, जीते और फिर भारत में समाहित हो गए। इस प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति केवल बची ही नहीं — वह और समृद्ध हो गई। गांधार कला ने बौद्ध मूर्तिकला को एक नई भाषा दी। कुषाण काल में बौद्ध धर्म एशिया का धर्म बना। रोमन व्यापार से आई संपदा ने भारतीय कला और स्थापत्य को पोषित किया।

इस काल की दूसरी महत्त्वपूर्ण विरासत थी — अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क। भारत पहली बार विश्व की कई सभ्यताओं के साथ एक साथ जुड़ा — रोम, चीन, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया — और यह सम्पर्क न केवल आर्थिक बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक भी था।

भारतीय गणित, खगोल-विज्ञान और चिकित्सा इस काल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित हुए। "शून्य" और "दशमलव पद्धति" के बीज इसी काल में पड़े।

320 ईस्वी में जब चंद्रगुप्त प्रथम ने गुप्त साम्राज्य की नींव रखी, तब वे एक ऐसी धरती पर खड़े थे जो पाँच शताब्दियों के सांस्कृतिक और बौद्धिक संघर्ष, समन्वय और समृद्धि से तैयार हुई थी। पोस्ट-मौर्य काल वह महान प्रयोगशाला थी जिसमें भारत की विविधता परखी गई, निखरी और अंततः उस महान सांस्कृतिक संश्लेषण के रूप में सामने आई जिसे हम "गुप्त स्वर्ण युग" कहते हैं।

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