ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — स्वतंत्रता की अनिवार्यता
इतिहास के पन्नों पर कुछ तारीखें ऐसी अमिट स्याही से लिखी जाती हैं जिन्हें न समय धो सकता है, न परिस्थितियाँ मिटा सकती हैं। 15 अगस्त 1947 ऐसी ही एक तारीख है — वह क्षण जब एक प्राचीन सभ्यता ने लगभग दो शताब्दियों की पराधीनता की जंजीरें तोड़कर स्वतंत्र आकाश में साँस ली। किंतु यह स्वतंत्रता किसी एक दिन की घटना नहीं थी — यह दशकों के संघर्ष, लाखों बलिदानों और अनगिनत आँसुओं का परिणाम था। और इस स्वतंत्रता को कानूनी रूप देने वाला दस्तावेज था — "भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947"।
इस अधिनियम को समझने के लिए हमें उस ऐतिहासिक भँवर में उतरना होगा जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारत और ब्रिटेन दोनों को अपनी चपेट में ले रहा था। 1945 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुआ, तब ब्रिटेन एक थकी हुई, आर्थिक रूप से जर्जर महाशक्ति था। युद्ध में ब्रिटेन के लगभग चार लाख सैनिक मारे गए थे, अर्थव्यवस्था ध्वस्त थी और साम्राज्य को बनाए रखने की शक्ति क्षीण हो चुकी थी। इसी वर्ष ब्रिटेन में आम चुनाव हुए और विंस्टन चर्चिल की रूढ़िवादी पार्टी को पराजित कर क्लेमेंट एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी सत्ता में आई। लेबर पार्टी भारतीय स्वतंत्रता के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहानुभूतिपूर्ण थी।
युद्धोत्तर भारत और स्वतंत्रता की अनिवार्यता
भारत में भी परिस्थितियाँ ब्रिटिश शासन की निरंतरता के लिए अनुकूल नहीं रही थीं। 1942 के "भारत छोड़ो आंदोलन" ने यह स्पष्ट कर दिया था कि भारतीय जनता अब किसी भी कीमत पर स्वतंत्रता से कम स्वीकार करने को तैयार नहीं है। 1945–46 में भारतीय नौसेना का विद्रोह, आईएनए के सैनिकों पर मुकदमे और उनके समर्थन में उठी जनभावना ने यह सिद्ध कर दिया कि ब्रिटिश सेना में भी भारतीय सैनिकों की निष्ठा अब संदिग्ध हो गई है। 1946 में हुए प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों को भारी जनसमर्थन मिला।
फरवरी 1946 में प्रधानमंत्री एटली ने तीन कैबिनेट मंत्रियों — लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर — का एक मिशन भारत भेजा जो "कैबिनेट मिशन" के नाम से जाना जाता है। इस मिशन ने एक संघीय संविधान की योजना प्रस्तुत की जिसमें भारत को विभाजित किए बिना एक अखंड स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वतंत्रता देने का प्रयास किया गया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इस योजना को प्रारम्भ में स्वीकार किया, किंतु बाद में विभिन्न व्याख्याओं और आरोप-प्रत्यारोपों के कारण यह योजना विफल हो गई। 1946 में हिंदू-मुस्लिम दंगों की भयावह लहर ने देश को झकझोर दिया और यह स्पष्ट हो गया कि विभाजन अब एक राजनीतिक वास्तविकता बन चुका है।
माउंटबेटन योजना — विभाजन का अंतिम निर्णय
मार्च 1947 में लॉर्ड लुई माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय नियुक्त किया गया। उन्हें स्पष्ट निर्देश था कि जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। किंतु भारत की बिगड़ती परिस्थितियाँ — साम्प्रदायिक हिंसा, पंजाब में अशांति और राजनीतिक गतिरोध — देखकर माउंटबेटन ने इस समय-सीमा को और आगे खींचने की बजाय पहले कर दिया। 3 जून 1947 को माउंटबेटन ने अपनी योजना घोषित की जिसे "माउंटबेटन योजना" या "3 जून योजना" कहा जाता है।
इस योजना की मुख्य विशेषताएँ थीं — ब्रिटिश भारत का दो स्वतंत्र अधिराज्यों — भारत और पाकिस्तान — में विभाजन होगा। पंजाब और बंगाल प्रांतों का विभाजन उनकी मुस्लिम और गैर-मुस्लिम जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा। सिंध, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत की विधानसभाएँ यह निर्णय लेंगी कि वे किस अधिराज्य में सम्मिलित होना चाहती हैं। असम का सिलहट जिला जनमत-संग्रह के माध्यम से पाकिस्तान या भारत में जाने का निर्णय करेगा। देसी रियासतें किसी भी अधिराज्य में सम्मिलित होने या स्वतंत्र रहने के लिए स्वतंत्र होंगी। कांग्रेस के नेताओं — नेहरू, पटेल और अन्य — ने विभाजन को एक दुखद किंतु अपरिहार्य वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया। मुहम्मद अली जिन्ना ने इसे "टूटा-फूटा पाकिस्तान" कहा किंतु स्वीकार किया। केवल महात्मा गांधी इस विभाजन के विरोध में अडिग रहे।
अधिनियम का निर्माण और संसदीय यात्रा
माउंटबेटन योजना की घोषणा के बाद ब्रिटिश सरकार ने अत्यंत त्वरित गति से काम किया। 4 जुलाई 1947 को "भारतीय स्वतंत्रता विधेयक" ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रस्तुत किया गया। यह विधेयक मात्र दो सप्ताह में — अभूतपूर्व गति से — दोनों सदनों से पारित हो गया। 18 जुलाई 1947 को राजा जॉर्ज षष्ठम ने इस पर अपनी सहमति दी और यह "भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947" के रूप में कानून बन गया।
इस विधेयक को इतनी शीघ्रता से पारित करने के पीछे कई कारण थे। ब्रिटिश सरकार जानती थी कि भारत में साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ती जा रही है और देरी से स्थिति और बिगड़ सकती है। अंतर्राष्ट्रीय जनमत — विशेषतः संयुक्त राज्य अमेरिका का — भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में था। ब्रिटेन की स्वयं की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि भारत में शासन बनाए रखना व्यावहारिक रूप से असंभव था। लेबर पार्टी की सरकार भी राजनीतिक कारणों से शीघ्र समझौता चाहती थी। इस प्रकार यह अधिनियम ब्रिटिश साम्राज्यवाद के इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण और अंतिम अध्याय बना — वह दस्तावेज जिसने 190 वर्षों की दासता का कानूनी अंत किया।
अधिनियम की मुख्य धाराएँ — प्रथम भाग
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में कुल 20 धाराएँ थीं। यद्यपि यह अधिनियम संख्या में छोटा था, किंतु इसका ऐतिहासिक महत्त्व असीमित था। आइए इसकी प्रमुख धाराओं का विस्तार से अध्ययन करें।
धारा 1 — दो स्वतंत्र अधिराज्यों की स्थापना: इस धारा ने घोषित किया कि 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र अधिराज्यों के रूप में अस्तित्व में आएंगे। दोनों अधिराज्य ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के सदस्य होंगे किंतु पूर्णतः स्वतंत्र और सम्प्रभु होंगे।
धारा 2 — क्षेत्रों का निर्धारण: इस धारा में पाकिस्तान के क्षेत्र निर्धारित किए गए — पश्चिमी पाकिस्तान (पश्चिम पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत) और पूर्वी पाकिस्तान (पूर्वी बंगाल और असम का सिलहट जिला)। शेष भारतीय क्षेत्र भारत अधिराज्य का हिस्सा बना।
धारा 3 — बंगाल और पंजाब का विभाजन: इस धारा के अंतर्गत बंगाल और पंजाब प्रांतों के विभाजन का प्रावधान किया गया। रेडक्लिफ आयोग की सीमा रेखा निर्धारण की जिम्मेदारी सर सिरिल रेडक्लिफ को दी गई। रेडक्लिफ रेखा का निर्धारण अत्यंत जटिल और विवादास्पद था — उन्हें मात्र कुछ सप्ताहों में करोड़ों लोगों के भाग्य का निर्णय करना था।
धारा 4 — पूर्वी बंगाल और पश्चिम पंजाब: इस धारा ने नए प्रांतों के नामकरण और उनकी संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट किया।
अधिनियम की मुख्य धाराएँ — द्वितीय भाग
अधिनियम की अगली महत्त्वपूर्ण धाराएँ शासन-व्यवस्था के संक्रमणकालीन प्रबंधों से संबंधित थीं।
धारा 5 — गवर्नर-जनरल की नियुक्ति: इस धारा के अनुसार प्रत्येक अधिराज्य का एक गवर्नर-जनरल होगा। भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए एक ही गवर्नर-जनरल भी हो सकता था यदि दोनों अधिराज्य सहमत हों। किंतु जिन्ना ने पाकिस्तान के लिए स्वयं गवर्नर-जनरल बनने की इच्छा व्यक्त की और माउंटबेटन भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
धारा 6 — विधायी शक्तियाँ: यह धारा अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। इसने घोषित किया कि प्रत्येक अधिराज्य की संविधान सभा को अपने अधिराज्य के लिए कोई भी कानून बनाने का पूर्ण अधिकार होगा। ब्रिटिश संसद का भारत या पाकिस्तान में कोई भी कानून बनाने का अधिकार पूर्णतः समाप्त हो जाएगा। यह धारा सम्प्रभुता के हस्तांतरण का सबसे स्पष्ट कानूनी प्रमाण है।
धारा 7 — ब्रिटिश सर्वोच्चता का अंत: इस धारा ने देसी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया। इसका अर्थ था कि सभी 562 देसी रियासतें तकनीकी रूप से स्वतंत्र हो गईं और उन्हें भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित होने या स्वतंत्र रहने का अधिकार मिल गया।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 की प्रमुख धाराएँ
| धारा | विषय | महत्त्व |
| 1 | दो अधिराज्यों की स्थापना | सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण |
| 6 | विधायी सम्प्रभुता | पूर्ण स्वतंत्रता का प्रमाण |
| 7 | ब्रिटिश सर्वोच्चता का अंत | रियासतों की स्वतंत्रता |
| 8 | 1935 अधिनियम का अनुकूलन | अंतरिम संविधान |
| 19 | व्याख्या और परिभाषाएँ | कानूनी स्पष्टता |
देसी रियासतों की जटिल स्थिति
स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 7 ने एक ऐसी जटिल स्थिति उत्पन्न की जो भारत की एकता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी। 562 देसी रियासतें — जो ब्रिटिश भारत के लगभग 48 प्रतिशत भूभाग और 28 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती थीं — तकनीकी रूप से स्वतंत्र हो गईं। इनमें से कुछ रियासतें — जैसे हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर — ने तत्काल विलय से इनकार किया।
हैदराबाद के निजाम — जो विश्व के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक थे — ने एक स्वतंत्र राज्य की घोषणा करने का प्रयास किया। जूनागढ़ के नवाब ने, जिनकी अधिकांश प्रजा हिंदू थी, पाकिस्तान में विलय की घोषणा कर दी। कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने दोनों अधिराज्यों से स्वतंत्र रहने की इच्छा जताई। इन सब समस्याओं का समाधान सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके सचिव वी.पी. मेनन ने किया। उन्होंने अद्भुत कूटनीतिक कौशल, दृढ़ इच्छाशक्ति और कभी-कभी सैन्य बल के माध्यम से लगभग सभी रियासतों को भारत में विलीन करवाया।
15 अगस्त 1947 तक अधिकांश रियासतों ने "विलय-पत्र" (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए थे। यह विलय-पत्र एक कानूनी दस्तावेज था जिसके माध्यम से रियासतें रक्षा, विदेश नीति और संचार के विषयों को भारत सरकार को सौंपते हुए अपनी आंतरिक स्वायत्तता बनाए रखती थीं। इस प्रकार स्वतंत्रता अधिनियम ने जो "रिक्तता" उत्पन्न की थी, उसे पटेल की "लौह इच्छाशक्ति" ने भरा और भारत के एकीकरण का कार्य सम्पन्न हुआ।
विधान सभाओं की भूमिका और अंतरिम व्यवस्था
स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 8 अत्यंत व्यावहारिक महत्त्व की थी। इसने 1935 के भारत सरकार अधिनियम को दोनों नए अधिराज्यों के अंतरिम संविधान के रूप में अनुकूलित करने का प्रावधान किया। जब तक दोनों अधिराज्य अपने नए संविधान नहीं बना लेते, 1935 का अधिनियम — उचित संशोधनों सहित — लागू रहेगा।
भारत की संविधान सभा का गठन 1946 में ही हो चुका था। इसकी अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र प्रसाद कर रहे थे। 9 दिसंबर 1946 को इसकी प्रथम बैठक हुई थी। स्वतंत्रता के बाद यही संविधान सभा भारत की अंतरिम संसद भी बन गई। संविधान सभा ने तीन वर्षों की अथक मेहनत — 11 सत्रों, 166 बैठकों और अनगिनत विचार-विमर्शों — के बाद 26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान तैयार किया जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
संविधान सभा में देश के श्रेष्ठतम मस्तिष्क एकत्रित थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति ने विश्व के अनेक संविधानों का अध्ययन कर एक ऐसा दस्तावेज तैयार किया जो भारत की विविधता, इतिहास और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता था। जवाहरलाल नेहरू ने "नियति से साक्षात्कार" का अपना ऐतिहासिक भाषण 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को दिया — यह भाषण भारतीय इतिहास के सबसे प्रेरणादायक वक्तव्यों में से एक है।
सत्ता हस्तांतरण की ऐतिहासिक प्रक्रिया
14 अगस्त 1947 की रात को जब भारत की संविधान सभा नई दिल्ली में "नियति से साक्षात्कार" कर रही थी, उसी समय कराची में पाकिस्तान की स्वतंत्रता की घोषणा हो चुकी थी। 14 अगस्त को पाकिस्तान और 15 अगस्त को भारत स्वतंत्र हुआ। इस तारीख के निर्धारण के पीछे एक रोचक तथ्य है — माउंटबेटन ने 15 अगस्त को इसलिए चुना क्योंकि यह तारीख 1945 में जापान के आत्मसमर्पण की वर्षगाँठ थी।
सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया एक अत्यंत जटिल और बहुस्तरीय कार्य था। प्रशासनिक, सैन्य, वित्तीय और संपत्ति विभाजन के लिए अनेक समितियाँ गठित की गई थीं। भारतीय सिविल सेवा (ICS) के अधिकारियों को यह चुनाव करना था कि वे भारत में रहेंगे या पाकिस्तान जाएंगे। भारतीय सेना का विभाजन — जो एक ऐसी संस्था थी जिसमें विभिन्न धर्मों के सैनिक एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे — अत्यंत कठिन कार्य था।
भारत-पाकिस्तान विभाजन (1947): परिसंपत्तियों का बँवारा
| विषय | भारत को मिला | पाकिस्तान को मिला |
| थल सेना | लगभग दो-तिहाई हिस्सा | लगभग एक-तिहाई हिस्सा |
| नौसेना | अधिकांश जहाज और संसाधन | कुछ चुनिंदा जहाज |
| वायु सेना | अधिकांश स्क्वाड्रन | कुछ स्क्वाड्रन |
| रेलवे | अधिकांश नेटवर्क और लाइनें | भौगोलिक सीमा में आने वाली कुछ लाइनें |
| नकद वित्त | 75 करोड़ रुपये | 55 करोड़ रुपये |
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को दोनों देशों के केंद्रीय बैंक के रूप में कुछ समय के लिए कार्य करना पड़ा। संपत्ति विभाजन में अनेक विवाद उठे जो दशकों तक चलते रहे।
विभाजन की त्रासदी — इतिहास का सबसे बड़ा पलायन
स्वतंत्रता अधिनियम 1947 ने जो स्वतंत्रता दी, वह एक भयंकर मूल्य चुकाकर आई। पंजाब और बंगाल का विभाजन मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बन गया। रेडक्लिफ रेखा — जो एक ऐसे व्यक्ति ने खींची जिसने पहले कभी भारत नहीं देखा था — ने लाखों परिवारों को दो हिस्सों में काट दिया। लगभग एक करोड़ पचास लाख लोगों का विस्थापन हुआ — यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा जन-पलायन था।
पंजाब में जो हिंसा हुई वह अकल्पनीय थी। हिंदू, मुसलमान और सिख — तीनों समुदायों ने एक-दूसरे पर अत्याचार किए। अनुमान है कि इस दौरान पाँच लाख से दस लाख के बीच लोग मारे गए। लाखों महिलाओं को अपहरण और बलात्कार का शिकार होना पड़ा। रेलगाड़ियाँ जो दोनों दिशाओं में चल रही थीं, शवों से भरी हुई पहुँचती थीं। सियालकोट, लाहौर, अमृतसर, लुधियाना — ये सब शहर रक्त और आग में डूब गए।
महात्मा गांधी — जो विभाजन के विरोधी थे — इस हिंसा को रोकने के लिए नोआखाली और कलकत्ता में अकेले घूमते रहे। उनका उपवास और उनकी उपस्थिति ने कलकत्ता में हिंसा को रोकने में चमत्कारिक भूमिका निभाई। किंतु 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे की गोली ने उस महात्मा को छीन लिया जो इस विभाजन को "आत्मा की हत्या" कहता था।
गवर्नर-जनरल की शक्तियाँ और संवैधानिक संक्रमण
स्वतंत्रता अधिनियम के अंतर्गत गवर्नर-जनरल की स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। धारा 5 और 6 के अनुसार गवर्नर-जनरल को अंतरिम काल में व्यापक शक्तियाँ दी गई थीं। वह संविधान सभा की सिफारिश पर 1935 के अधिनियम में ऐसे संशोधन कर सकता था जो नई परिस्थितियों के लिए आवश्यक हों।
लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल के रूप में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने नेहरू और पटेल के साथ मिलकर अनेक जटिल प्रशासनिक समस्याओं का समाधान किया। जून 1948 में माउंटबेटन के जाने के बाद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) भारत के प्रथम और अंतिम भारतीय गवर्नर-जनरल बने। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ गवर्नर-जनरल का पद समाप्त हो गया और डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने।
पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिन्ना स्वयं गवर्नर-जनरल बने। उनकी शक्तियाँ अत्यंत व्यापक थीं और उन्होंने पाकिस्तान की प्रारम्भिक प्रशासनिक व्यवस्था को अपनी इच्छानुसार आकार दिया। किंतु सितंबर 1948 में उनके निधन से पाकिस्तान एक शक्तिशाली नेतृत्व से वंचित हो गया।
सिविल सेवाओं और सेना का विभाजन
स्वतंत्रता अधिनियम के क्रियान्वयन में सबसे व्यावहारिक चुनौती थी — प्रशासनिक तंत्र का विभाजन। भारतीय सिविल सेवा (ICS) जो ब्रिटिश शासन की "स्टील फ्रेम" कही जाती थी, उसे दो नए राष्ट्रों के बीच बाँटना था। 1947 में ICS में लगभग 1000 अधिकारी थे जिनमें से लगभग 500 भारतीय और 500 ब्रिटिश थे। ब्रिटिश अधिकारियों को सेवानिवृत्त होने या नए देशों में सेवा जारी रखने का विकल्प दिया गया।
भारतीय और पाकिस्तानी मूल के अधिकारियों को यह निर्णय लेना था कि वे किस अधिराज्य में सेवा करेंगे। यह निर्णय अनेक बार व्यक्तिगत धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी जन्मभूमि, परिवार और व्यक्तिगत पसंद के आधार पर लिया गया। कुछ मुस्लिम अधिकारियों ने भारत में रहना पसंद किया और कुछ हिंदू-सिख अधिकारी पाकिस्तान से भारत आए। सेना का विभाजन और भी जटिल था। ब्रिटिश काल में रेजिमेंटें धर्म के आधार पर नहीं बल्कि क्षेत्र और जाति के आधार पर बनाई गई थीं। अब इन्हें धर्म के आधार पर विभाजित करना था। फील्ड मार्शल ऑचिनलेक की अध्यक्षता में "विभाजन परिषद" ने यह कार्य सम्पन्न किया।
अधिनियम की सीमाएँ और आलोचना
स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की व्यापक ऐतिहासिक महत्ता के बावजूद इसकी अनेक आलोचनाएँ भी की गई हैं। इन आलोचनाओं को समझना भारत के स्वतंत्रता-काल के इतिहास की संतुलित समझ के लिए आवश्यक है।
पहली और सबसे बड़ी आलोचना विभाजन से सम्बंधित है। अनेक इतिहासकारों का मत है कि यदि ब्रिटिश सरकार ने 1942 में ही स्पष्ट स्वतंत्रता का वचन दिया होता, तो साम्प्रदायिक विभाजन की त्रासदी टाली जा सकती थी। कैबिनेट मिशन की योजना — जो भारत को अखंड रखने का एक गंभीर प्रयास था — की विफलता के लिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों को जिम्मेदार ठहराया जाता है।
दूसरी आलोचना देसी रियासतों के संबंध में है। अधिनियम की धारा 7 ने रियासतों को "स्वतंत्र" घोषित कर एक अत्यंत खतरनाक राजनीतिक स्थिति उत्पन्न की। यदि सरदार पटेल न होते, तो भारत सैकड़ों छोटे-बड़े राज्यों में बिखर जाता। तीसरी आलोचना यह है कि अधिनियम में विभाजन के कारण होने वाले जन-पलायन और हिंसा से सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं किए गए। सीमा रेखा का निर्धारण इतनी जल्दबाजी में किया गया कि रेडक्लिफ ने स्वयं माना कि उनका निर्णय त्रुटिपूर्ण था। चौथी आलोचना यह है कि अधिनियम ने "डोमिनियन स्टेटस" की व्यवस्था की, पूर्ण गणराज्य की नहीं — यद्यपि यह सीमा भारत ने 1950 में अपना संविधान लागू करके पार कर ली।
भारतीय संविधान पर अधिनियम का प्रभाव
स्वतंत्रता अधिनियम 1947 ने भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया। धारा 6 ने संविधान सभा को पूर्ण विधायी सम्प्रभुता प्रदान की — यह एक क्रांतिकारी प्रावधान था जिसने संविधान निर्माताओं को पूरी स्वतंत्रता दी कि वे जैसा चाहें वैसा संविधान बनाएँ।
संविधान सभा ने इस स्वतंत्रता का सदुपयोग किया। डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में प्रारूप समिति ने विश्व के विभिन्न संविधानों का अध्ययन किया — अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और जापान के संविधानों से प्रेरणा ली गई। किंतु सबसे अधिक प्रभाव 1935 के भारत सरकार अधिनियम का था जो स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत अंतरिम संविधान के रूप में कार्य कर रहा था।
स्वतंत्रता अधिनियम ने "गणराज्य" की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। यद्यपि प्रारम्भ में भारत एक "डोमिनियन" था जो ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य था और ब्रिटिश सम्राट को राज्याध्यक्ष मानता था, किंतु 26 जनवरी 1950 को भारत एक "सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य" बन गया। इस संक्रमण को संभव बनाने में स्वतंत्रता अधिनियम की वह धारा महत्त्वपूर्ण थी जिसने ब्रिटिश संसद के भारत पर किसी भी प्रकार के कानूनी अधिकार को समाप्त कर दिया था।
ऐतिहासिक मूल्यांकन — एक युग का अंत, एक युग का आरंभ
स्वतंत्रता अधिनियम 1947 को उसके समग्र ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो यह एक ऐसा दस्तावेज था जिसने एक साथ अनेक युगों का अंत और आरंभ किया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के युग का अंत हुआ — वह साम्राज्य जिसके बारे में कभी कहा जाता था कि इसमें सूर्य कभी अस्त नहीं होता। उपनिवेशवाद के विरुद्ध एशिया और अफ्रीका में जो संघर्ष चल रहे थे, उन्हें भारत की स्वतंत्रता से एक नई प्रेरणा और ऊर्जा मिली।
भारत की दृष्टि से यह अधिनियम एक "आज़ादी का मैग्ना कार्टा" था — वह कागज जिस पर 190 वर्षों की दासता की समाप्ति लिखी गई थी। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, चंद्रशेखर आजाद — उन सभी अमर बलिदानियों के सपनों की आंशिक परिपूर्णता इस अधिनियम में थी। किंतु विभाजन की त्रासदी ने इस उत्सव पर विषाद की छाया डाली। महात्मा गांधी ने 15 अगस्त 1947 को कोई उत्सव नहीं मनाया — वे कलकत्ता में उपवास पर थे और उस हिंसा पर आँसू बहा रहे थे जो स्वतंत्रता की कीमत बनी।
किंतु इतिहास में स्वतंत्रता अधिनियम 1947 का स्थान अमर है। यह वह क्षण था जब एक प्राचीन सभ्यता ने आधुनिक राष्ट्र के रूप में विश्व मंच पर अपना स्थान ग्रहण किया। नेहरू के शब्दों में — "जब दुनिया सो रही थी, भारत ने जीवन और स्वतंत्रता की ओर करवट ली।" यह अधिनियम न केवल एक कानूनी दस्तावेज है, यह उन करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं, बलिदानों और स्वप्नों का प्रतीक है जिन्होंने इस स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया।