दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate)

 


दिल्ली सल्तनत — एक नए युग का उदय

भारतीय इतिहास में 1206 ईस्वी एक ऐसा वर्ष है जो एक युग का अंत और एक नए युग का आरंभ दोनों एक साथ चिह्नित करता है। मुहम्मद गोरी की हत्या के बाद उसके दास और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की — यही "दिल्ली सल्तनत" का जन्म था। यह भारत में मुस्लिम राजनीतिक शक्ति का पहला स्थायी और संगठित स्वरूप था।

दिल्ली सल्तनत ने 1206 से 1526 ईस्वी तक — लगभग 320 वर्षों — तक भारत के बड़े भाग पर शासन किया। इस काल में पाँच राजवंशों ने दिल्ली की गद्दी पर बैठकर शासन किया — गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश, सैयद वंश और लोदी वंश। इनमें से प्रत्येक ने भारतीय इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

दिल्ली सल्तनत का इतिहास केवल एक राजनीतिक इतिहास नहीं है। यह उस महान सांस्कृतिक संगम की कहानी है जब दो महान सभ्यताएँ — भारतीय और इस्लामी — एक-दूसरे से टकराईं, संघर्ष किया, और अंततः एक नई मिश्रित संस्कृति का निर्माण किया। "हिंदवी" भाषा का उदय, "गंगा-जमुनी तहजीब", सूफी-भक्ति का समन्वय — ये सब दिल्ली सल्तनत काल की अमर देन हैं।


गुलाम वंश — एक दास से सुल्तान तक की असाधारण यात्रा

"गुलाम वंश" — जिसे "दास वंश" या "मामलुक वंश" भी कहते हैं — दिल्ली सल्तनत का प्रथम राजवंश था। इस वंश की विशेषता यह थी कि इसके अनेक शासक मूलतः दास (गुलाम) थे जो अपनी योग्यता, बुद्धि और साहस के बल पर सुल्तान बने।

"कुतुबुद्दीन ऐबक" (1206-1210 ईस्वी) —

ऐबक तुर्कमानिस्तान में "ऐबक" कबीले का था। बचपन में दास के रूप में बिका। मुहम्मद गोरी ने उसे खरीदा और उसकी प्रतिभा को पहचाना। ऐबक ने तराइन के युद्धों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1206 में गोरी की हत्या के बाद ऐबक ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। उसे कभी औपचारिक रूप से "सुल्तान" की उपाधि नहीं मिली — वह "मलिक" के रूप में शासन करता था।

ऐबक की दो महत्त्वपूर्ण स्मारक उपलब्धियाँ हैं —

"कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद" (दिल्ली) — दिल्ली की पहली मस्जिद, जो 27 हिंदू मंदिरों के अवशेषों से बनाई गई।

"कुतुब मीनार" का निर्माण आरंभ — जिसे उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने पूरा किया।

ऐबक "लाखबख्श" (लाखों देने वाला) के नाम से प्रसिद्ध था — उसकी उदारता के कारण। 1210 ईस्वी में चौगान (पोलो) खेलते समय घोड़े से गिरने पर उनकी मृत्यु हो गई।


इल्तुतमिश — दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

"शम्सुद्दीन इल्तुतमिश" (1211-1236 ईस्वी) को इतिहासकार दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक मानते हैं। ऐबक ने जो बीज बोया, उसे इल्तुतमिश ने एक विशाल वृक्ष बनाया।

इल्तुतमिश भी एक दास था — इलबरी तुर्क जनजाति का। ऐबक ने उसे खरीदा और उसकी बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उसकी पुत्री से उसका विवाह कराया।

इल्तुतमिश की प्रमुख उपलब्धियाँ —

"सल्तनत की एकता" — उसने "यल्दोज" (लाहौर), "कुबाचा" (सिंध) और "अली मर्दान" (बंगाल) को परास्त करके सल्तनत को एकजुट किया।

"मंगोल खतरे से रक्षा" — जब "चंगेज खान" की सेना भारत की सीमा तक आ गई, इल्तुतमिश ने कूटनीतिक चातुरी से उसे टाल दिया।

"खलीफा से मान्यता" (1229 ईस्वी) — "बगदाद के अब्बासिद खलीफा" ने उसे "सुल्तान-ए-आजम" की उपाधि दी — यह इस्लामी विश्व में भारत के सुल्तान की पहली औपचारिक मान्यता थी।

"इक्ता व्यवस्था" का सुव्यवस्थित रूप — उसने प्रशासन को "इक्ता" (भूमि-अनुदान) आधारित किया।

"कुतुब मीनार" का निर्माण पूर्ण किया।

"चालीस अमीरों का दल""तुर्कान-ए-चहलगानी" — इल्तुतमिश के 40 विश्वसनीय तुर्क अमीर जो बाद में सल्तनत की राजनीति में एक शक्तिशाली गुट बने।


रजिया सुल्तान — एक असाधारण महिला शासक

"रजिया सुल्तान" (1236-1240 ईस्वी) भारतीय इतिहास की एकमात्र महिला सुल्तान थी। उनकी कहानी साहस, बुद्धिमत्ता और एक पितृसत्तात्मक समाज में अपनी पहचान बनाने के संघर्ष की अद्भुत गाथा है।

इल्तुतमिश ने स्वयं रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था — उन्होंने कहा था कि उनके पुत्र अयोग्य हैं और रजिया में एक महान शासक के सभी गुण हैं।

रजिया ने सुल्तान बनते ही कई क्रांतिकारी कदम उठाए —

उन्होंने "पर्दा-प्रथा" त्याग दी और खुले दरबार में बिना घूँघट के बैठीं।

उन्होंने हाथी पर सवार होकर सेना का नेतृत्व किया।

उन्होंने "याकूत" — एक अबीसीनियाई दास — को "अमीर-ए-आखुर" (अश्वशाला का प्रमुख) नियुक्त किया।

यही उनकी कमजोरी बनी। "तुर्कान-ए-चहलगानी" (40 अमीर) उनकी शक्ति से घबरा गए और उनके विरुद्ध षड्यंत्र किया।

"अल्तुनिया" — भटिंडा के अमीर — ने विद्रोह किया। रजिया ने उनसे युद्ध किया, बंदी हुईं और बाद में अल्तुनिया से विवाह करके मुक्ति पाई। किंतु दिल्ली वापसी पर उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

1240 ईस्वी में रजिया और अल्तुनिया दोनों मारे गए। इब्न बतूता ने लिखा कि उनकी समाधि दिल्ली में आज भी पूजनीय है।


बलबन — कठोर शासन का अद्वितीय शासक

"गयासुद्दीन बलबन" (1265-1287 ईस्वी) गुलाम वंश का सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली शासक था। वह इल्तुतमिश का खरीदा हुआ दास था जो धीरे-धीरे उठकर सुल्तान बना।

बलबन का शासन-दर्शन एक शब्द में कहा जा सकता है — "ताकत"। उसका मानना था कि सुल्तान की शक्ति और प्रतिष्ठा ही सल्तनत की नींव है।

बलबन का "राजत्व सिद्धांत"

उसने "ईरानी राजत्व की अवधारणा" को अपनाया। सुल्तान "जिल्ल-ए-इलाही" (ईश्वर की छाया) है। दरबार में "सिजदा" (साष्टांग दंडवत) और "पाय-बोस" (पैर चूमना) अनिवार्य किया।

"चहलगानी" का दमन — उसने उन 40 अमीरों की शक्ति को तोड़ा जो सुल्तान को कठपुतली बनाना चाहते थे।

"गुप्तचर तंत्र" — उसने प्रत्येक प्रांत में एक गुप्त जासूस नियुक्त किया।

"मेवातियों का दमन" — दिल्ली के आसपास के जंगलों में रहने वाले डाकुओं को कठोरतापूर्वक दंडित किया।

"मंगोल आक्रमण से रक्षा" — उसने उत्तर-पश्चिम में एक मजबूत सैन्य सीमा स्थापित की।

किंतु उसके जीवन का सबसे दुखद क्षण था — उसके पुत्र "मुहम्मद" की मंगोलों के साथ युद्ध में मृत्यु। बलबन कभी इस आघात से उबर नहीं सका।


खिलजी वंश — एक नई राजनीतिक क्रांति

1290 ईस्वी में "जलालुद्दीन खिलजी" ने गुलाम वंश के अंतिम शासक "कैकुबाद" को पदच्युत करके "खिलजी वंश" की स्थापना की। खिलजी वंश के शासन ने दिल्ली सल्तनत के इतिहास में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया।

जलालुद्दीन खिलजी (1290-1296 ईस्वी) —

वह 70 वर्ष की आयु में सुल्तान बना। उसकी सबसे बड़ी विशेषता थी — उदारता और शांतिप्रियता। उसने "ठगी" (Thugee) — ठगों के गिरोह — का दमन किया।

उसकी सबसे बड़ी भूल थी — अपने भतीजे "अलीगुरशास्प" (जो बाद में अलाउद्दीन खिलजी बना) पर अंध-विश्वास। इसी भतीजे ने उसे धोखे से मार दिया और सल्तनत पर कब्जा कर लिया।

"अलाउद्दीन खिलजी" (1296-1316 ईस्वी) — दिल्ली सल्तनत का सबसे महान और शक्तिशाली सुल्तान।

अलाउद्दीन ने सत्ता प्राप्त करने के लिए जो कठोर रास्ता चुना — अपने चाचा की हत्या — वही उसके शासन की भूमिका बनी। उसने "विश्व-विजय का स्वप्न" देखा और लिखित में एक विद्वान से पूछा कि क्या उसे एक नया धर्म चलाना चाहिए। विद्वान ने उसे समझाया।

उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी — दक्षिण भारत पर विजय। उसके सेनापति "मलिक काफूर" ने 1308-1312 ईस्वी में देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र और मदुरै तक के राज्यों को जीता और अपार धन दिल्ली लाया।


अलाउद्दीन का बाजार नियंत्रण — मध्यकालीन भारत का अनूठा आर्थिक प्रयोग

अलाउद्दीन खिलजी की सबसे क्रांतिकारी और आधुनिक दिखने वाली नीति थी — "बाजार नियंत्रण" (Market Reforms)। यह मध्यकालीन विश्व में राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था का एक अभूतपूर्व प्रयोग था।

इन सुधारों की आवश्यकता क्यों पड़ी? अलाउद्दीन की योजना थी — एक विशाल स्थायी सेना रखना जो मंगोल आक्रमण से भारत की रक्षा करे। किंतु इतनी बड़ी सेना का खर्च उठाना कठिन था। उपाय था — सैनिकों का वेतन कम रखा जाए किंतु बाजार में वस्तुओं के मूल्य भी कम हों जिससे सैनिकों का जीवन-स्तर बना रहे।

चार बाजार स्थापित किए गए:

"अनाज बाजार" (मंडी-ए-अनाज) — जहाँ गेहूँ, चावल, दालें निर्धारित मूल्य पर बिकती थीं।

"कपड़ा बाजार" (बाजार-ए-सरा) — जहाँ कपड़े और वस्त्र बिकते थे।

"पशु बाजार" (बाजार-ए-चहार पायान) — जानवरों का बाजार।

"विविध वस्तु बाजार" (बाजार-ए-मेवाफरोश) — अन्य वस्तुओं के लिए।

प्रत्येक बाजार में एक "शाहना-ए-मंडी" (बाजार नियंत्रक) नियुक्त था। "बरीद" (जासूस) और "मुन्ही" (गुप्तचर) बाजारों पर निगाह रखते थे।

दंड अत्यंत कठोर था — मूल्य से अधिक लेने पर व्यापारी का मांस उसी वजन में काट दिया जाता था।

यह व्यवस्था अलाउद्दीन के जीवनकाल में अत्यंत सफल रही — किंतु उसकी मृत्यु के बाद समाप्त हो गई।


तुगलक वंश — महान महत्त्वाकांक्षाएँ और दुखद विफलताएँ

1320 ईस्वी में "गाजी मलिक" ने अलाउद्दीन के अयोग्य उत्तराधिकारियों को हटाकर "तुगलक वंश" की स्थापना की। वह "गयासुद्दीन तुगलक" के नाम से सुल्तान बना।

गयासुद्दीन तुगलक (1320-1325 ईस्वी) —

कुशल प्रशासक और अनुभवी सेनापति। उसने बंगाल, उड़ीसा और तेलंगाना पर आक्रमण किया। किंतु उसका अंत रहस्यमय था — तुगलकाबाद के निकट एक लकड़ी का मंच उस पर गिरा और वह मर गया। "इब्न बतूता" के अनुसार यह उसके पुत्र "जूना खान" (मुहम्मद बिन तुगलक) का षड्यंत्र था।

"मुहम्मद बिन तुगलक" (1325-1351 ईस्वी) — दिल्ली सल्तनत का सबसे विवादास्पद और जटिल शासक।

वह एक "विरोधाभासों का पुलिंदा" था — अत्यंत विद्वान किंतु व्यावहारिक दृष्टि से कमजोर। उसके पाँच विवादास्पद प्रयोग:

"राजधानी परिवर्तन" — दिल्ली से "दौलताबाद" (महाराष्ट्र)। संपूर्ण जनसंख्या को 1500 किलोमीटर पैदल चलाया — हजारों लोग मारे गए।

"सांकेतिक मुद्रा" — सोने-चाँदी की जगह "तांबे के सिक्के" चलाए जो सोने के बराबर मूल्य रखते थे। जनता ने घर पर ही सिक्के बनाने शुरू किए — अर्थव्यवस्था चरमरा गई।

"खुरासान अभियान" — मध्य एशिया पर आक्रमण की योजना।

"कराचिल अभियान" — हिमालय क्षेत्र में।

"दोआब में कर-वृद्धि" — जो किसान-विद्रोह का कारण बना।


फिरोज शाह तुगलक — एक कल्याणकारी मध्यकालीन शासक

"फिरोज शाह तुगलक" (1351-1388 ईस्वी) मुहम्मद बिन तुगलक के पूर्णतः विपरीत व्यक्तित्व था। जहाँ मुहम्मद बिन तुगलक क्रांतिकारी और व्यावहारिक दृष्टि से असफल था, वहाँ फिरोज एक व्यावहारिक और जनकल्याणकारी शासक था।

फिरोज के कल्याणकारी कार्य:

"नहरें" — उसने पाँच प्रमुख नहरें बनवाईं जो पंजाब की खेती के लिए वरदान थीं। "रक्त-ए-शाही नहर" और "उलुगखानी नहर" सबसे प्रसिद्ध थीं।

"अस्पताल""दार-उल-शफा" (अस्पताल) जहाँ मुफ्त चिकित्सा मिलती थी।

"रोजगार विभाग""दीवान-ए-खैरात" — जो बेरोजगारों को रोजगार देता था।

"विवाह कार्यालय""दीवान-ए-इशरत" — जो गरीब लड़कियों के विवाह में सहायता करता था।

"मकबरे और स्मारक" — उसने "फिरोजाबाद" नामक एक नया नगर बसाया। अशोक के स्तंभों को दिल्ली लाया।

फिरोज की सीमाएँ भी थीं —

धार्मिक असहिष्णुता — उसने ब्राह्मणों पर जजिया लगाया और गैर-मुस्लिमों के प्रति कठोरता बरती।

"गुलाम-प्रथा" — उसने 1,80,000 दासों का एक विशाल दल रखा।

सैन्य कमजोरी — बंगाल और दक्षिण के विद्रोही प्रांत उसके नियंत्रण से बाहर थे।


सैयद और लोदी वंश — सल्तनत का पतन-काल

"तैमूर का आक्रमण" (1398 ईस्वी) ने दिल्ली सल्तनत की कमर तोड़ दी। तुगलक वंश के अंतिम शासक "नासिरुद्दीन महमूद तुगलक" के काल में दिल्ली पर "तैमूर लंग" ने आक्रमण किया। दिल्ली में भीषण नरसंहार हुआ और अपार धन लूटा गया। दिल्ली एक वर्ष तक वीरान रही।

"सैयद वंश" (1414-1451 ईस्वी) —

"खिज्र खान" — जो तैमूर का प्रतिनिधि था — ने सैयद वंश की स्थापना की। उसने "सुल्तान" की उपाधि नहीं ली — केवल "रैयत-ए-आला" (उच्च अधिकारी) कहलाया।

सैयद वंश के चार शासक — खिज्र खान, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह और अलाउद्दीन आलम शाह — कमजोर और अप्रभावी थे। सल्तनत की सीमाएँ सिकुड़ती गईं।

"लोदी वंश" (1451-1526 ईस्वी) —

"बहलोल लोदी" — अफगान था और दिल्ली का पहला अफगान सुल्तान। उसने जौनपुर के "शर्की सुल्तानों" को पराजित किया।

"सिकंदर लोदी" (1489-1517 ईस्वी) — लोदी वंश का सबसे सफल शासक। "आगरा" नगर की स्थापना की। जाट और राजपूत विद्रोहों को दमन किया।

"इब्राहिम लोदी" (1517-1526 ईस्वी) — अंतिम लोदी सुल्तान जो "पानीपत के प्रथम युद्ध" में "बाबर" से पराजित और मारा गया।


दिल्ली सल्तनत का प्रशासन — एक नई व्यवस्था का जन्म

दिल्ली सल्तनत ने भारतीय प्रशासन में कई नए तत्त्व जोड़े जो मध्यकालीन और आधुनिक प्रशासन को प्रभावित करते रहे।

केंद्रीय प्रशासन में "सुल्तान" सर्वोच्च था। उसके अधीन —

"वजीर" (प्रधानमंत्री) — "दीवान-ए-विजारत" का प्रमुख।

"आरिज-ए-मुमालिक" — सैन्य विभाग प्रमुख।

"दीवान-ए-इंशा" — राजकीय पत्राचार विभाग।

"दीवान-ए-रिसालत" — विदेश विभाग।

"काजी-उल-कुजात" — सर्वोच्च न्यायाधीश।

"बरीद-ए-मुमालिक" — गुप्तचर विभाग।

प्रांतीय प्रशासन में साम्राज्य "इक्ता" में विभाजित था। "मुक्ति" या "वली" इक्ता का प्रमुख था।

"इक्ता व्यवस्था" — यह प्रशासन और सैन्य व्यवस्था का एक अनोखा समन्वय था। सुल्तान "इक्ता" (भूमि-राजस्व का अधिकार) किसी अमीर को देता था जो उसके बदले एक निश्चित संख्या में सैनिक रखता था। यह वेतन नहीं था — यह राजस्व-अधिकार था।

"खराज" (भूमि-कर), "खम्स" (युद्ध-लूट का पाँचवाँ हिस्सा), "जजिया" (गैर-मुस्लिमों पर कर) — मुख्य राजस्व-स्रोत थे।


दिल्ली सल्तनत की अर्थव्यवस्था — व्यापार और उत्पादन

दिल्ली सल्तनत के काल में भारत की अर्थव्यवस्था में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

कृषि इस काल में भी अर्थव्यवस्था की नींव थी। "खराज" के रूप में उपज का 1/3 से 1/2 भाग सरकारी राजस्व था। फिरोज तुगलक ने "नहर व्यवस्था" से कृषि को नई शक्ति दी।

व्यापार इस काल में अत्यंत सक्रिय था। "अरब, ईरानी, तुर्क और मध्य एशियाई व्यापारी" भारत में आए। भारतीय "हिंदू व्यापारियों" (बनिया, मारवाड़ी) ने अपनी परंपरा जारी रखी।

"बाजार" (सूक) नगरों के केंद्र में थे। "करवाँसराय" (यात्री-आश्रय) व्यापारी मार्गों पर थे।

उत्पादन में "कपड़ा उद्योग" सबसे महत्त्वपूर्ण था। "बंगाल की मलमल", "गुजरात का रेशम" और "दक्खन का कपड़ा" प्रसिद्ध थे।

मुद्रा में "टंका" (चाँदी का सिक्का) और "जीतल" (तांबे का सिक्का) प्रचलित थे। मुहम्मद बिन तुगलक के तांबे के सिक्के वाला प्रयोग अंततः विफल रहा।

"इब्न बतूता" ने लिखा कि भारत विश्व का सबसे समृद्ध देश है। दिल्ली एशिया के सबसे बड़े नगरों में से एक थी।


सल्तनत काल की कला और साहित्य — दो संस्कृतियों का संगम

दिल्ली सल्तनत काल भारतीय कला और साहित्य के इतिहास में एक अत्यंत रचनात्मक और नवोन्मेषी युग था। इस काल में दो महान सभ्यताएँ — भारतीय और इस्लामी — के मिलन से एक नई, समृद्ध और विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा का जन्म हुआ।

स्थापत्य कला:

"इंडो-इस्लामिक स्थापत्य शैली" का उदय इस काल की सबसे बड़ी वास्तुकला-उपलब्धि है। इस शैली में भारतीय और इस्लामी दोनों तत्त्वों का अद्भुत समन्वय है।

"कुतुब मीनार" (दिल्ली) — 72.5 मीटर ऊँची, विश्व की सबसे ऊँची ईंट की मीनार।

"अलाई दरवाजा" — अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित, पहली बार सच्ची "मेहराब" (arch) का प्रयोग।

"तुगलकाबाद" — गयासुद्दीन तुगलक का विशाल किला।

"फिरोजाबाद" — फिरोज तुगलक का नगर।

"लोदी उद्यान" (दिल्ली) — लोदी काल के मकबरे।

साहित्य:

"अमीर खुसरो" (1253-1325 ईस्वी) — दिल्ली सल्तनत का सबसे महान साहित्यकार। उन्हें "तूती-ए-हिंद" (भारत का तोता) कहते हैं। उन्होंने फारसी और हिंदवी दोनों में लिखा। "तराना", "कव्वाली" और "खयाल" संगीत शैलियों के जनक माने जाते हैं। "हिंदवी" (प्रारंभिक हिंदी) को साहित्यिक भाषा के रूप में विकसित करने में उनका अभूतपूर्व योगदान है।


मंगोल आक्रमण और भारत की रक्षा

दिल्ली सल्तनत के इतिहास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण किंतु अक्सर अनदेखा पहलू है — मंगोल आक्रमणों से भारत की रक्षा। 13वीं-14वीं शताब्दी में मंगोल विश्व की सबसे भयावह सैन्य शक्ति थे। उन्होंने चीन, मध्य एशिया, ईरान, इराक और रूस को रौंद डाला। बगदाद (1258 ईस्वी) को नष्ट करके 8 लाख लोगों का नरसंहार किया।

भारत इस महाविनाश से कैसे बचा? — दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों के कारण।

इल्तुतमिश ने "चंगेज खान" के समय कूटनीतिक रूप से मंगोल आक्रमण टाला।

"बलबन" ने उत्तर-पश्चिम में एक मजबूत सैन्य सीमा बनाई।

अलाउद्दीन खिलजी — मंगोलों के विरुद्ध सबसे सफल। उसने 6 बार मंगोल आक्रमणों को पराजित किया। 1298 में "जरन-मंजपुर" (पंजाब), 1299 में "किली" (दिल्ली के निकट) — इन युद्धों में मंगोलों को भारी पराजय मिली।

"जफर खान" — अलाउद्दीन का वीर सेनापति जो मंगोलों से लड़ते हुए शहीद हुआ। उसकी वीरता की कहानियाँ सैनिकों में प्रेरणा जगाती थीं।

यदि दिल्ली सल्तनत मंगोलों को न रोकती, तो भारत की वही दुर्दशा होती जो ईरान और इराक की हुई। इस दृष्टि से दिल्ली सल्तनत ने भारतीय सभ्यता को एक महाविनाश से बचाया।


दिल्ली सल्तनत की विरासत — एक जटिल और समृद्ध धरोहर

दिल्ली सल्तनत (1206-1526 ईस्वी) की विरासत को एक शब्द में नहीं समेटा जा सकता। यह विरासत जटिल है, विरोधाभासी है और इसीलिए इतनी रोचक और महत्त्वपूर्ण है।

प्रशासनिक विरासत

सल्तनत ने जो "इक्ता व्यवस्था, केंद्रीय दीवान, अमीरों की परिषद" आदि प्रशासनिक संस्थाएँ विकसित कीं, वे मुगल प्रशासन का आधार बनीं। "मुगल मनसबदारी व्यवस्था" सल्तनत की इक्ता व्यवस्था का विकसित रूप है।

भाषाई विरासत

सल्तनत काल में "हिंदवी" — जो बाद में हिंदी और उर्दू बनी — का जन्म हुआ। "अमीर खुसरो" की भाषाई देन अतुलनीय है। फारसी शब्दों का हिंदी में समावेश, उर्दू का जन्म — ये सब इसी काल की देन हैं।

स्थापत्य विरासत

"इंडो-इस्लामिक स्थापत्य शैली" जो सल्तनत काल में विकसित हुई, आगे चलकर "मुगल स्थापत्य" की नींव बनी। "ताज महल" उसी परंपरा का सर्वोच्च फल है।

सामाजिक विरासत

सल्तनत काल में "भक्ति आंदोलन" और "सूफी परंपरा" ने मिलकर एक ऐसे समाज की नींव रखी जो विविधता में एकता का आदर्श था। "कबीर" इसी समन्वय के सबसे बड़े प्रतीक हैं।

दिल्ली सल्तनत के 320 वर्ष भारत के लिए एक अग्नि-परीक्षा थे — किंतु इस परीक्षा से भारत न केवल जीवित निकला, बल्कि एक नई, समृद्ध और बहुस्तरीय सांस्कृतिक पहचान लेकर निकला।

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