ब्रिटिश शासन के प्रमुख अधिनियम

 


ईस्ट इंडिया कंपनी और शासन की आवश्यकता

भारत में ब्रिटिश शासन का इतिहास केवल एक राजनीतिक कहानी नहीं है — यह एक ऐसी गाथा है जिसमें व्यापार, कूटनीति, विश्वासघात और अंततः एक महान सभ्यता की पराधीनता के अध्याय एक साथ गुँथे हुए हैं। 1600 ईस्वी में जब महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत के साथ व्यापार करने का शाही फरमान जारी किया, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह व्यापारिक संस्था एक दिन भारत जैसे विशाल देश की शासक बन जाएगी। कंपनी ने प्रारंभ में सूरत, मद्रास, बम्बई और कलकत्ता में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कीं। धीरे-धीरे इन कोठियों के इर्द-गिर्द सैनिक छावनियाँ बनने लगीं और व्यापारी, सैनिक में परिवर्तित होने लगे। 1757 में प्लासी की लड़ाई और 1764 में बक्सर की लड़ाई के बाद कंपनी का भारत पर राजनीतिक वर्चस्व स्थापित हो गया। किंतु जैसे-जैसे कंपनी की शक्ति बढ़ती गई, उसके शासन में भ्रष्टाचार, अनियमितता और मनमानी भी बढ़ती गई। ब्रिटिश संसद को अनुभव हुआ कि इस अनियंत्रित कंपनी पर लगाम लगाना आवश्यक है — और इसी आवश्यकता से जन्म हुआ भारत के प्रथम महत्त्वपूर्ण संवैधानिक अधिनियम का।


1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट — नियंत्रण की पहली कड़ी

1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट भारत के संवैधानिक इतिहास में एक मील का पत्थर है। यह पहला अवसर था जब ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय मामलों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया। इस अधिनियम की पृष्ठभूमि में कंपनी की घोर अव्यवस्था, वित्तीय दिवालियापन और भारत में उसके कर्मचारियों का अत्याचार था। रॉबर्ट क्लाइव जैसे अधिकारियों ने बंगाल को इस तरह लूटा था कि 1770 का बंगाल अकाल, जिसमें एक करोड़ से अधिक लोग मारे गए, कंपनी की कुप्रबंधन की ही देन था।

इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार थीं — बंगाल के गवर्नर को "गवर्नर-जनरल" का पद दिया गया और उन्हें बम्बई तथा मद्रास प्रेसिडेंसियों पर भी अधिकार दिया गया। वारेन हेस्टिंग्स इस पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे। कलकत्ता में एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद की स्थापना की गई जिसके बिना गवर्नर-जनरल कोई भी महत्त्वपूर्ण निर्णय नहीं ले सकता था। कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए। कंपनी के कर्मचारियों को व्यक्तिगत व्यापार करने और भारतीयों से उपहार लेने पर प्रतिबंध लगाया गया। यद्यपि यह अधिनियम अनेक दोषों से युक्त था — विशेषतः गवर्नर-जनरल और परिषद के बीच निरंतर संघर्ष की संभावना — तथापि इसने एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया कि भारत में कंपनी का शासन ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी है।


1784 का पिट्स इंडिया एक्ट — द्विसत्ता का जन्म

1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट की खामियाँ शीघ्र ही स्पष्ट हो गईं। गवर्नर-जनरल और उनकी परिषद के बीच निरंतर टकराव, वारेन हेस्टिंग्स पर महाभियोग की कार्यवाही और कंपनी की बिगड़ती साख ने ब्रिटिश संसद को एक और अधिनियम बनाने पर विवश किया। 1784 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विलियम पिट द यंगर ने "पिट्स इंडिया एक्ट" पारित करवाया। यह अधिनियम इसलिए महत्त्वपूर्ण था क्योंकि इसने भारतीय शासन में एक "द्विसत्ता" (Double Government) की व्यवस्था स्थापित की।

इस अधिनियम के अंतर्गत लंदन में एक "बोर्ड ऑफ कंट्रोल" की स्थापना की गई जिसमें छह सदस्य थे — दो कैबिनेट मंत्री और चार प्रिवी काउंसिल सदस्य। यह बोर्ड कंपनी के सभी राजनीतिक, सैन्य और राजस्व संबंधी मामलों की देखरेख करता था। वाणिज्यिक मामले अभी भी कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के अधीन रहे। भारत में गवर्नर-जनरल की परिषद के सदस्यों की संख्या चार से घटाकर तीन कर दी गई। गवर्नर-जनरल को विशेष परिस्थितियों में परिषद के निर्णय को अस्वीकार करने का अधिकार दिया गया। इस अधिनियम की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि इसने "भारतीय क्षेत्रों के विस्तार" की नीति को ब्रिटिश राष्ट्रीय हित के विरुद्ध घोषित किया — यद्यपि व्यवहार में इस नीति का पालन कभी नहीं हुआ। 1784 का यह अधिनियम 1858 तक प्रभावी रहा और इसने भारतीय प्रशासन की केंद्रीय संरचना को निर्धारित किया।


1793 और 1813 के चार्टर अधिनियम — कंपनी की शक्ति और शिक्षा का प्रश्न

1793 का चार्टर अधिनियम कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को अगले बीस वर्षों के लिए नवीनीकृत करने का अवसर था। इस अधिनियम की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि इसने गवर्नर-जनरल को और अधिक शक्तिशाली बनाया। लॉर्ड कार्नवालिस के सुझावों पर आधारित इस अधिनियम में प्रावधान किया गया कि गवर्नर-जनरल असाधारण परिस्थितियों में परिषद के बहुमत के विरुद्ध भी निर्णय ले सकता है। कंपनी के कर्मचारियों के वेतन और सेवा-शर्तें निर्धारित की गईं। भारतीय राजस्व से कंपनी के प्रशासनिक खर्च की व्यवस्था की गई — यह एक ऐसा प्रावधान था जिसने भारत को आर्थिक रूप से ब्रिटिश हितों का दास बना दिया।

1813 का चार्टर अधिनियम और भी महत्त्वपूर्ण था। इस समय तक नेपोलियन के युद्धों ने ब्रिटिश व्यापारियों की माँग तेज कर दी थी कि भारत में कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त होना चाहिए। इस दबाव के आगे झुकते हुए अधिनियम में चाय और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर शेष सभी व्यापार को ब्रिटिश व्यापारियों के लिए खोल दिया गया। इस अधिनियम की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता थी — भारत में ईसाई मिशनरियों को प्रवेश की अनुमति दी गई। साथ ही भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए एक लाख रुपए वार्षिक की राशि निर्धारित की गई। यद्यपि यह राशि नाममात्र की थी, तथापि इसने भारत में आधुनिक शिक्षा की नींव रखने में एक प्रतीकात्मक भूमिका निभाई। इस अधिनियम ने पहली बार स्वीकार किया कि ब्रिटेन की भारत के प्रति कुछ नैतिक जिम्मेदारियाँ भी हैं।


1833 का चार्टर अधिनियम — केंद्रीकरण और मैकॉले की शिक्षा नीति

1833 का चार्टर अधिनियम भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक युगांतकारी दस्तावेज है। यह अधिनियम उस काल में बना जब ब्रिटेन में स्वयं महान सुधारों की लहर थी — 1832 का रिफॉर्म एक्ट इसी श्रृंखला की एक कड़ी था। इस अधिनियम ने कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को पूरी तरह समाप्त कर दिया। कंपनी अब केवल एक प्रशासनिक निकाय रह गई, व्यापारिक संस्था नहीं। बंगाल के गवर्नर-जनरल को "भारत का गवर्नर-जनरल" बना दिया गया और उन्हें सम्पूर्ण भारत के नागरिक, सैन्य और राजस्व मामलों पर सर्वोच्च अधिकार दिया गया। लॉर्ड विलियम बेंटिंक इस पद पर आसीन होने वाले प्रथम गवर्नर-जनरल थे।

इस अधिनियम में केंद्रीय विधान परिषद की स्थापना की गई जिसे भारत के किसी भी भाग के लिए कानून बनाने का अधिकार था। थॉमस मैकॉले को इस परिषद का प्रथम विधि सदस्य नियुक्त किया गया। मैकॉले ने 1835 में अपना प्रसिद्ध "मिनट ऑन एजुकेशन" लिखा जिसमें उन्होंने अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा की वकालत की। उनका कुख्यात कथन था कि "एक अच्छी यूरोपीय पुस्तकालय की एक शेल्फ समूचे भारत और अरब के साहित्य से अधिक मूल्यवान है।" यद्यपि यह कथन भारतीय सभ्यता के प्रति अज्ञान और अहंकार का प्रतीक था, तथापि अंग्रेजी शिक्षा की इस नीति के परिणाम दूरगामी रहे। इसी शिक्षा-व्यवस्था ने आगे चलकर एक ऐसा भारतीय मध्यवर्ग तैयार किया जो अंग्रेजी जानता था और जो राष्ट्रवादी आंदोलन की रीढ़ बना।


1853 का चार्टर अधिनियम — प्रतियोगी परीक्षाओं का आरंभ

1853 का चार्टर अधिनियम ब्रिटिश-भारतीय प्रशासन के इतिहास में एक नई दिशा का सूचक था। इस अधिनियम की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसने कंपनी की सेवाओं में नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा का सिद्धांत अपनाया। इससे पहले कंपनी के निदेशक अपने परिचितों और रिश्तेदारों को सेवाओं में नियुक्त करते थे। अब योग्यता का मापदंड संरक्षण की जगह लेने लगा। यह भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की आधुनिक प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली का मूल बीज है।

इस अधिनियम में विधान परिषद में छह नए सदस्य जोड़े गए जो विभिन्न प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे। यह पहला अवसर था जब विधायी और कार्यकारी कार्यों को अलग करने का प्रयास किया गया। गवर्नर-जनरल की परिषद अब विशुद्ध रूप से कार्यकारी निकाय बन गई और विधान परिषद एक अलग निकाय के रूप में काम करने लगी। इसके अतिरिक्त इस अधिनियम ने भारतीयों को सिविल सेवाओं में भर्ती होने का सैद्धांतिक अधिकार दिया, यद्यपि व्यावहारिक रूप से यह अत्यंत कठिन था क्योंकि परीक्षाएँ केवल लंदन में आयोजित होती थीं और पाठ्यक्रम पूरी तरह यूरोपीय था। सत्येंद्रनाथ टैगोर 1863 में इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले प्रथम भारतीय थे — यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी जो भारतीय क्षमता का प्रमाण था।


1858 का भारत सरकार अधिनियम — क्राउन का शासन

1857 की महान क्रांति — जिसे ब्रिटिश इतिहासकारों ने "सिपाही विद्रोह" कहा और भारतीय इतिहासकारों ने "प्रथम स्वतंत्रता संग्राम" — ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। मेरठ से आरंभ हुई यह क्रांति देखते-देखते उत्तर और मध्य भारत के विशाल भूभाग में फैल गई। दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी और अनेक स्थानों पर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी गई। इस विद्रोह को दबाने में ब्रिटेन को अपनी पूरी शक्ति लगानी पड़ी। विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने निर्णय लिया कि ईस्ट इंडिया कंपनी — जो इतने बड़े संकट को संभालने में असमर्थ सिद्ध हुई — को अब भारत का शासन नहीं सौंपा जा सकता।

2 अगस्त 1858 को ब्रिटिश संसद ने "भारत सरकार अधिनियम 1858" पारित किया जिसे "अच्छे शासन के लिए भारत अधिनियम" भी कहा जाता है। इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार थीं — ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया। "बोर्ड ऑफ कंट्रोल" और "कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स" समाप्त कर दिए गए। लंदन में एक "सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया" का पद सृजित किया गया जो एक 15 सदस्यीय "काउंसिल ऑफ इंडिया" की सहायता से कार्य करता था। भारत में गवर्नर-जनरल को अब "वायसराय" भी कहा जाने लगा — वह ब्रिटिश सम्राट का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि था। लॉर्ड कैनिंग प्रथम वायसराय बने। 1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया की ऐतिहासिक घोषणा में भारतीयों के साथ न्याय और समानता का आश्वासन दिया गया।


1861 और 1892 के परिषद अधिनियम — भारतीयों की सीमित भागीदारी

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने महसूस किया कि भारतीय जनमत और भारतीय नेताओं को शासन-प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखना खतरनाक हो सकता है। इसी सोच के परिणामस्वरूप 1861 का भारतीय परिषद अधिनियम आया। इस अधिनियम ने वायसराय की कार्यकारी परिषद में पाँचवें सदस्य के रूप में एक विधि सदस्य जोड़ा। विधान परिषद का विस्तार किया गया जिसमें 6 से 12 तक अतिरिक्त सदस्य नामांकित किए जा सकते थे, और इनमें कुछ भारतीयों को भी स्थान मिला। बम्बई और मद्रास प्रेसिडेंसियों को पुनः विधायी शक्तियाँ दी गईं जो 1833 के अधिनियम में छीन ली गई थीं।

किंतु इस अधिनियम की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता थी "विभागीय प्रणाली" का उदय — वायसराय की परिषद के प्रत्येक सदस्य को एक विभाग सौंपा गया। यह भविष्य के मंत्रिमंडलीय शासन का प्रारंभिक स्वरूप था। 1892 का परिषद अधिनियम एक और छोटा किंतु महत्त्वपूर्ण कदम था। इसने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ाई। सदस्यों को बजट पर बहस करने और प्रशासनिक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। विभिन्न संस्थाओं को — जैसे विश्वविद्यालय, नगरपालिकाएँ, व्यापार मंडल — परिषद सदस्यों की सिफारिश करने का अधिकार दिया गया। यद्यपि यह वास्तविक निर्वाचन नहीं था, तथापि इसने "प्रतिनिधित्व" के सिद्धांत को मान्यता दी।


1909 का मार्ले-मिंटो अधिनियम — साम्प्रदायिक विभाजन का बीज

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय राष्ट्रवाद एक नई शक्ति के रूप में उभर रहा था। 1905 में बंगाल विभाजन के विरुद्ध स्वदेशी आंदोलन ने ब्रिटिश शासन को हिला दिया था। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल की "लाल-बाल-पाल" तिकड़ी ने पूर्ण स्वराज की माँग उठाई। इन परिस्थितियों में भारत सचिव जॉन मार्ले और वायसराय लॉर्ड मिंटो ने मिलकर 1909 का "भारतीय परिषद अधिनियम" तैयार किया जिसे मार्ले-मिंटो सुधार के नाम से जाना जाता है।

इस अधिनियम ने केंद्रीय विधान परिषद के सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी। प्रांतीय परिषदों में भी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। सदस्यों को पूरक प्रश्न पूछने और बजट पर मतदान करने का अधिकार दिया गया। एक भारतीय — सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा — को वायसराय की कार्यकारी परिषद में स्थान मिला। किंतु इस अधिनियम की सबसे विवादास्पद और घातक विशेषता थी — मुसलमानों के लिए "पृथक निर्वाचन क्षेत्र" की व्यवस्था। मुस्लिम लीग के दबाव में और ब्रिटिश "फूट डालो और राज करो" की नीति के अंतर्गत यह व्यवस्था की गई कि मुसलमान केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को मत दे सकते हैं। मार्ले ने स्वयं स्वीकार किया था कि इस प्रावधान से वे संतुष्ट नहीं हैं, किंतु राजनीतिक दबाव में यह पारित हुआ। इस एक प्रावधान के दूरगामी परिणाम 1947 के भारत-विभाजन के रूप में सामने आए।


1919 का मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड अधिनियम — द्वैध शासन

प्रथम विश्वयुद्ध (1914–18) में भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया — लाखों भारतीय सैनिकों ने यूरोप, अफ्रीका और मध्य-पूर्व में लड़कर जान दी। युद्ध के बाद भारतीयों को आशा थी कि ब्रिटेन अपने वादे के अनुसार उन्हें स्वशासन देगा। 1917 में भारत सचिव मांटेग्यू ने घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार का लक्ष्य "भारत में उत्तरदायी शासन की क्रमिक स्थापना" है। किंतु जो अधिनियम आया, वह इस वादे से बहुत कम था।

1919 का "भारत सरकार अधिनियम" जिसे मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है, ने प्रांतीय स्तर पर "द्वैध शासन" (Dyarchy) की व्यवस्था लागू की। इसके अंतर्गत प्रांतीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया — "हस्तांतरित विषय" जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, जो भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए; और "आरक्षित विषय" जैसे भूमि राजस्व, पुलिस, न्याय, जो गवर्नर के नियंत्रण में रहे।

द्वैध शासन के अंतर्गत विषयों का वर्गीकरण


विषय वर्गीकरणनियंत्रण/उत्तरदायित्वप्रमुख उदाहरण
हस्तांतरित विषयभारतीय मंत्री (विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी)शिक्षा, स्थानीय स्वशासन, स्वास्थ्य, कृषि और सार्वजनिक कार्य।
आरक्षित विषयगवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद (बिना विधायी उत्तरदायित्व के)पुलिस, राजस्व, न्याय, वित्त, जेल और कानून व्यवस्था।
केंद्रीय विषयवायसराय (गवर्नर जनरल) और उसकी परिषदरक्षा, विदेश नीति, डाक-तार, मुद्रा और रेलवे।

केंद्र में भी द्विसदनीय विधानमंडल स्थापित किया गया — केंद्रीय विधानसभा और राज्य परिषद। मताधिकार का विस्तार किया गया यद्यपि अभी भी केवल सम्पत्तिधारी, शिक्षित और कर-दाता ही मतदान कर सकते थे। इस अधिनियम के साथ ही 1919 में "रॉलेट एक्ट" भी आया जिसने बिना मुकदमे के गिरफ्तारी का अधिकार दिया — इसके विरोध में हुए जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने पूरे भारत को झकझोर दिया।


1935 का भारत सरकार अधिनियम — स्वायत्तता का अधूरा स्वप्न

1935 का भारत सरकार अधिनियम ब्रिटिश-भारतीय संवैधानिक इतिहास का सर्वाधिक विस्तृत और महत्त्वाकांक्षी दस्तावेज था। इस अधिनियम में 321 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ थीं — यह अपने आप में एक सम्पूर्ण संविधान था। इसकी पृष्ठभूमि में साइमन कमीशन की रिपोर्ट (1930), गोलमेज सम्मेलन (1930–32) और पूना पैक्ट (1932) जैसी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ थीं।

इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार थीं। अखिल भारतीय संघ की स्थापना का प्रावधान किया गया जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांत और देसी रियासतें शामिल होती — यद्यपि यह संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया क्योंकि पर्याप्त संख्या में रियासतें इसमें सम्मिलित नहीं हुईं। प्रांतों में "प्रांतीय स्वायत्तता" की व्यवस्था की गई और द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया। अब प्रांतीय सरकारें विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी मंत्रिपरिषद के माध्यम से चलाई जानी थीं। केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल का प्रावधान था। मताधिकार का और विस्तार हुआ — अब लगभग 14 प्रतिशत जनसंख्या को मत देने का अधिकार था। बर्मा को भारत से अलग किया गया। संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना की गई। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना भी इसी अधिनियम के अंतर्गत हुई।


1935 के अधिनियम की सीमाएँ और आलोचना

1935 के अधिनियम की बहुत तीव्र आलोचना हुई। जवाहरलाल नेहरू ने इसे "दासता का नया चार्टर" कहा। महात्मा गांधी ने इसे "पूर्णतः अस्वीकार्य" बताया। आलोचकों ने जो मुख्य कमियाँ गिनाईं, वे इस प्रकार थीं। गवर्नर-जनरल और प्रांतीय गवर्नरों को व्यापक "विशेष शक्तियाँ" और "सुरक्षा उपाय" दिए गए थे जिनके आधार पर वे निर्वाचित मंत्रिमंडल के निर्णयों को रद्द कर सकते थे। संघीय स्तर पर उत्तरदायी शासन का कोई प्रावधान नहीं था। वायसराय पूरी तरह लंदन के प्रति उत्तरदायी रहा। देसी रियासतों को अनुचित रूप से अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया जो ब्रिटिश हितों के अनुकूल था। साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था और भी जटिल बना दी गई।

फिर भी 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने 11 में से 8 प्रांतों में सरकार बनाई और 1935 के अधिनियम के अंतर्गत काम करना प्रारम्भ किया। इस अनुभव ने भारतीय नेताओं को वास्तविक शासन-प्रशासन की समझ दी। 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के आरम्भ होने पर वायसराय ने भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत को युद्ध में घोषित कर दिया और कांग्रेस की मंत्रिपरिषदों ने इस्तीफा दे दिया। 1942 का "क्रिप्स मिशन" और "भारत छोड़ो आंदोलन" इसी पृष्ठभूमि में हुए। भारत का स्वतंत्रता का मार्ग अब अनिवार्य हो चुका था।


1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम — एक युग का अंत

18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने "भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम" पारित किया — यह वह दस्तावेज था जिसने 190 वर्षों के ब्रिटिश शासन का अंत किया। इस अधिनियम के अंतर्गत 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र और सम्प्रभु अधिराज्यों (Dominions) के रूप में अस्तित्व में आए। ब्रिटिश भारत का विभाजन लॉर्ड माउंटबेटन की योजना के आधार पर किया गया।

इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार थीं — दो स्वतंत्र अधिराज्यों — भारत और पाकिस्तान — की स्थापना की गई। प्रत्येक अधिराज्य की संविधान सभा को अपना संविधान बनाने और किसी भी कानून को लागू करने या समाप्त करने का पूर्ण अधिकार दिया गया। ब्रिटिश संसद का भारत या पाकिस्तान में कोई भी कानून बनाने का अधिकार समाप्त हो गया। देसी रियासतों पर से ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त कर दी गई और उन्हें स्वतंत्र रूप से किसी भी अधिराज्य में सम्मिलित होने या स्वतंत्र रहने का अधिकार दिया गया — यद्यपि बाद में सरदार वल्लभभाई पटेल के अथक प्रयासों से 562 रियासतें भारत में विलीन हुईं। गवर्नर-जनरल का पद रखा गया जो संवैधानिक प्रमुख होगा। लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल का पद स्वीकार किया।


ब्रिटिश अधिनियमों का भारतीय संविधान पर प्रभाव

ब्रिटिश शासनकाल के इन अधिनियमों ने भारतीय संविधान को गहरे तक प्रभावित किया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 1950 का भारतीय संविधान इन्हीं अधिनियमों की विरासत पर खड़ा है। डॉ. अंबेडकर ने स्वयं स्वीकार किया था कि संविधान के अनेक प्रावधान 1935 के अधिनियम से प्रेरित हैं।

ब्रिटिश भारत के अधिनियम और संवैधानिक प्रभाव


ब्रिटिश अधिनियमभारतीय संविधान पर मुख्य प्रभाव/अवधारणा
1773 का रेग्युलेटिंग एक्टकेंद्रीय शासन की अवधारणा: भारत में पहली बार शासन के केंद्रीकरण की नींव रखी गई।
1833 का चार्टर एक्टकेंद्रीय विधायिका की संकल्पना: प्रशासन और विधि निर्माण के केंद्रीकरण को पूर्णता दी गई।
1858 का अधिनियमकार्यपालिका संरचना: सत्ता का हस्तांतरण (क्राउन को) और प्रशासनिक उत्तरदायित्व की संरचना।
1861 का परिषद अधिनियमविभागीय प्रणाली (Portfolio System): आधुनिक कैबिनेट प्रणाली की शुरुआत हुई।
1919 का अधिनियमद्विसदनीय विधानमंडल: केंद्र में दो सदनों वाली व्यवस्था और प्रांतों में द्वैध शासन।
1935 का अधिनियमसंघीय ढाँचा, मौलिक अधिकार, न्यायपालिका: वर्तमान संविधान का सबसे बड़ा स्रोत (संघीय व्यवस्था और शक्तियों का विभाजन)।

संघीय ढाँचा, केंद्र-राज्य शक्ति विभाजन, आपातकाल के प्रावधान, लोक सेवा आयोग, उच्चतम न्यायालय की संरचना, राज्यपाल की शक्तियाँ — ये सब प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ब्रिटिश अधिनियमों से आए हैं। 1919 के अधिनियम से द्विसदनीय व्यवस्था आई, 1935 से न्यायिक समीक्षा का सिद्धांत आया। किंतु भारतीय संविधान ने इन विरासतों को भारतीय मूल्यों और आकांक्षाओं के अनुसार ढाला। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय जैसे सिद्धांत भारतीय संविधान की मौलिक देन हैं।


विरासत का मूल्यांकन — शोषण और सुधार का द्वंद्व

ब्रिटिश शासन के इन अधिनियमों का मूल्यांकन करते समय हमें एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। एक ओर यह सत्य है कि ये अधिनियम मूलतः ब्रिटिश साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए बने थे। भारत की अपार संपदा का दोहन, भारतीय उद्योगों का विनाश, कृत्रिम अकालों में लाखों की मृत्यु, और भारतीय समाज में साम्प्रदायिक विभाजन के बीज — ये सब ब्रिटिश शासन के अक्षम्य पाप हैं।

किंतु दूसरी ओर यह भी सत्य है कि इन अधिनियमों ने — चाहे अनजाने ही सही — भारत में आधुनिक संस्थाओं की नींव रखी। न्यायिक स्वतंत्रता की अवधारणा, विधायिका का महत्त्व, प्रतिनिधित्व का सिद्धांत, प्रतियोगी सिविल सेवा, संघीय शासन — ये सब उपहार थे जो ब्रिटिश अधिनियमों के माध्यम से भारतीय शासन-व्यवस्था को मिले। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने इन्हीं संस्थाओं के भीतर रहकर संघर्ष किया, इन्हीं कानूनों का उपयोग करके अपने अधिकारों की माँग की, और अंततः इन्हीं ढाँचों पर स्वतंत्र भारत की इमारत खड़ी की।

भारतीय शासन-व्यवस्था की यह यात्रा — रेग्युलेटिंग एक्ट से स्वतंत्रता अधिनियम तक — एक ऐसी कथा है जिसमें पराधीनता और प्रतिरोध, शोषण और संघर्ष, और अंततः एक महान राष्ट्र के आत्म-निर्धारण की विजय का अद्भुत आख्यान है। यह अध्याय भारत के संवैधानिक इतिहास की वह पृष्ठभूमि है जिसके बिना स्वतंत्र भारत के संविधान और लोकतंत्र की पूर्ण समझ संभव नहीं है।

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