संविधान सभा की कार्यप्रणाली

 


संविधान सभा की कार्यप्रणाली — लोकतंत्र का जीवंत उदाहरण

जब हम किसी राष्ट्र के संविधान निर्माण की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान प्रायः उस संविधान के अंतिम स्वरूप पर जाता है — उसके अनुच्छेद, अनुसूचियाँ और प्रावधान। किंतु उतना ही महत्त्वपूर्ण — और शायद उससे भी अधिक रोचक — है वह प्रक्रिया जिसके माध्यम से यह संविधान बना। "संविधान सभा की कार्यप्रणाली" — वह तरीका जिससे भारत के संविधान निर्माताओं ने काम किया — अपने आप में एक महान लोकतांत्रिक उपलब्धि है।

भारत की संविधान सभा ने 9 दिसंबर 1946 से 26 नवंबर 1949 तक — लगभग तीन वर्षों में — अपना कार्य सम्पन्न किया। इस अवधि में 11 सत्र हुए, 166 दिन बैठकें चलीं, 7635 संशोधन प्रस्ताव रखे गए और 2473 संशोधन स्वीकार किए गए।

यह कार्यप्रणाली केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं थी — यह एक जीवंत लोकतांत्रिक संवाद था जिसमें देश के श्रेष्ठतम मस्तिष्क एक-दूसरे से टकराए, तर्क दिए, सुने और अंततः एक ऐसे दस्तावेज को जन्म दिया जो 140 करोड़ भारतीयों के जीवन का आधार है।

संविधान सभा की कार्यप्रणाली का अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि "लोकतंत्र" केवल चुनाव और वोट का नाम नहीं है — यह एक विचार-प्रक्रिया है, एक संवाद है, और सबसे महत्त्वपूर्ण — एक सामूहिक निर्णय की कला है।


सत्रों की संरचना — एक व्यवस्थित कार्यक्रम

संविधान सभा ने अपने कार्य को 11 सत्रों में विभाजित किया। यह सत्र एक साथ नहीं चले — इनके बीच में अंतराल था जब समितियाँ अपना काम करती थीं, प्रारूप तैयार होते थे और सदस्यों को अध्ययन का अवसर मिलता था।

भारतीय संविधान सभा के प्रमुख सत्र और कार्य

सत्रअवधिप्रमुख कार्य
प्रथम9-23 दिसंबर 1946उद्घाटन, अस्थायी अध्यक्ष का चुनाव
द्वितीय20-25 जनवरी 1947स्थायी अध्यक्ष का चुनाव, उद्देश्य प्रस्ताव
तृतीय28 अप्रैल - 2 मई 1947समिति रिपोर्टों पर चर्चा
चतुर्थ14-31 जुलाई 1947विभिन्न समितियों की रिपोर्टें
पंचम14-30 अगस्त 1947स्वतंत्रता के बाद पुनर्गठन
षष्ठ27 जनवरी 1948गांधीजी को श्रद्धांजलि
सप्तम4 नवंबर 1948 - 8 जनवरी 1949प्रारूप संविधान का प्रथम वाचन
अष्टम16 मई - 16 जून 1949द्वितीय वाचन
नवम30 जुलाई - 18 सितंबर 1949द्वितीय वाचन जारी
दशम6-17 अक्टूबर 1949तृतीय वाचन
एकादश14-26 नवंबर 1949अंतिम वाचन और संविधान का अंगीकरण

प्रत्येक सत्र में बैठकें प्रातःकाल आरंभ होती थीं। "कोरम" के लिए कम से कम एक-दशांश सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य थी। बैठकों की कार्यवाही सचिवालय द्वारा रिकॉर्ड की जाती थी और बाद में "संविधान सभा के वाद-विवाद" के रूप में प्रकाशित हुई।


अध्यक्ष की भूमिका — डॉ. राजेंद्र प्रसाद का शांत और निष्पक्ष नेतृत्व

किसी भी विधायी निकाय की कार्यप्रणाली उसके अध्यक्ष की दक्षता और निष्पक्षता पर निर्भर करती है। संविधान सभा इस दृष्टि से अत्यंत भाग्यशाली थी कि उसे "डॉ. राजेंद्र प्रसाद" जैसा अध्यक्ष मिला।

डॉ. प्रसाद की अध्यक्षीय विशेषताएँ —

"धैर्य और शांतचित्तता" — जब बहस अत्यधिक तीखी हो जाती, वे अपने शांत हस्तक्षेप से वातावरण को सौम्य बना देते।

"निष्पक्षता" — सभी सदस्यों को — चाहे वे प्रमुख नेता हों या साधारण प्रतिनिधि — समान सम्मान और अवसर।

"विद्वत्ता" — उनका विधिक और संवैधानिक ज्ञान अत्यंत व्यापक था।

"लचीलापन" — जहाँ नियमों में लचीलापन उचित था, वहाँ वे उसे अपनाते थे।

अध्यक्ष के रूप में डॉ. प्रसाद के कार्य —

बैठकों का संचालन।

वक्ताओं को समय देना।

संशोधन प्रस्तावों को क्रमबद्ध करना।

मतदान की प्रक्रिया का पर्यवेक्षण।

विवादास्पद बिंदुओं पर निर्णय।

एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण — जब राजभाषा के प्रश्न पर सभा में अत्यंत भावनात्मक और तीव्र वाद-विवाद हो रहा था, डॉ. प्रसाद ने अपनी कुशलता से इस गतिरोध को तोड़ा और एक समझौते का मार्ग प्रशस्त किया।


प्रक्रिया के नियम — संचालन का संवैधानिक ढाँचा

संविधान सभा ने अपने संचालन के लिए एक स्पष्ट "प्रक्रिया-संहिता" बनाई। यह संहिता ब्रिटिश संसदीय परंपरा, भारतीय विधायी अनुभव और नई आवश्यकताओं का एक समन्वय थी।

"प्रक्रिया समिति" (Rules of Procedure Committee) ने ये नियम तैयार किए। इनमें निम्न महत्त्वपूर्ण प्रावधान थे —

"भाषण की अवधि" — सामान्यतः प्रत्येक सदस्य को एक विषय पर एक बार बोलने का अधिकार था। असाधारण परिस्थितियों में दूसरी बार बोला जा सकता था।

"संशोधन प्रस्ताव की विधि" — संशोधन लिखित रूप में पहले से जमा करना होता था। इससे अध्यक्ष सभी संशोधनों को वर्गीकृत करके क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत कर सकते थे।

"कोरम" — बैठक के लिए न्यूनतम उपस्थिति की शर्त।

"मतदान" — सामान्यतः "ध्वनि-मत" (Voice Vote) से। विभाजन की माँग पर "विभाजन मत" (Division) जिसमें सदस्य उठकर अपना मत दर्शाते थे।

"भाषा" — बहसें अंग्रेजी और हिंदी दोनों में हो सकती थीं। कुछ सदस्यों ने उर्दू, तेलुगु, तमिल में भी वक्तव्य दिए जिनका अनुवाद उपलब्ध कराया जाता था।


समितियों की कार्य-पद्धति — विशेषज्ञता का समन्वय

संविधान सभा की सबसे प्रभावशाली कार्यप्रणाली थी — "समिति प्रणाली"। विभिन्न विषयों पर विशेष समितियाँ बनाई गईं जिन्होंने गहन अध्ययन, परामर्श और विचार-विमर्श के बाद अपनी सिफारिशें सभा को प्रस्तुत कीं।

"समितियों की कार्य-पद्धति" इस प्रकार थी —

"बैठकें" — समितियाँ संसद भवन में या बाहर — जहाँ सुविधाजनक हो — बैठकें करती थीं।

"साक्ष्य और परामर्श" — समितियाँ विशेषज्ञों, प्रांतीय सरकारों और अन्य हितधारकों से परामर्श लेती थीं।

"रिपोर्ट तैयारी" — समिति अपनी सिफारिशें एक लिखित रिपोर्ट में प्रस्तुत करती थी।

"सभा में प्रस्तुतीकरण" — यह रिपोर्ट पूरी सभा के सामने रखी जाती थी जहाँ उस पर चर्चा और मतदान होता था।

"विषय-समितियाँ"

संघ शक्तियाँ समिति (नेहरू), प्रांतीय संविधान समिति (पटेल), मूल अधिकार समिति (पटेल), अल्पसंख्यक समिति, झंडा समिति और हिंदी भाषा समिति — ये सब समानांतर रूप से काम करती थीं।

इस समिति-प्रणाली की सफलता यह थी कि जटिल विषयों पर "गहन विशेषज्ञता" से काम हुआ और पूरी सभा का समय बचा।


संवैधानिक सलाहकार — सर बी.एन. राव की अदृश्य किंतु अनिवार्य भूमिका

संविधान सभा की कार्यप्रणाली में एक महत्त्वपूर्ण किंतु प्रायः अनदेखा व्यक्तित्व था — "सर बेनेगल नरसिंह राव" — जो "संवैधानिक सलाहकार" (Constitutional Adviser) के पद पर नियुक्त थे।

बी.एन. राव एक अत्यंत प्रतिभाशाली ICS अधिकारी और विधिशास्त्र के गहरे ज्ञाता थे। उन्होंने संविधान का "प्रारंभिक मसौदा" तैयार किया जिसे विभिन्न विषय-समितियों की रिपोर्टों और अंतर्राष्ट्रीय संविधानों का संश्लेषण करके बनाया गया था।

"अंतर्राष्ट्रीय परामर्श" — बी.एन. राव ने अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड और अन्य देशों की यात्राएँ कीं।

"अमेरिकी न्यायमूर्ति फेलिक्स फ्रैंकफर्टर" से उन्होंने परामर्श लिया — जिन्होंने मौलिक अधिकारों को अत्यधिक विस्तृत न बनाने की सलाह दी।

बी.एन. राव ने जो "प्रारंभिक मसौदा" तैयार किया, उसी पर प्रारूप समिति ने आगे काम किया।

उनकी भूमिका "नेपथ्य में" थी किंतु "अपरिहार्य" थी — वे वह नींव थे जिस पर संविधान का भव्य भवन खड़ा हुआ।

उनके कार्य की एक रोचक बात यह है कि उन्होंने विश्व के 60 से अधिक संविधानों का अध्ययन किया और सर्वश्रेष्ठ प्रावधानों को भारतीय संदर्भ में अनुकूलित किया।


प्रारूप समिति की कार्य-पद्धति — अंबेडकर का अथक श्रम

"प्रारूप समिति" की कार्यप्रणाली संविधान सभा के सबसे महत्त्वपूर्ण और श्रमसाध्य अध्यायों में से एक है।

"29 अगस्त 1947" को गठित इस समिति ने फरवरी 1948 तक प्रारूप संविधान तैयार किया। यह काम कैसे हुआ?

प्रारूप समिति की कार्य-पद्धति के चरण:

"प्रथम चरण" — बी.एन. राव के मसौदे का अध्ययन। प्रत्येक अनुच्छेद की गहन समीक्षा।

"द्वितीय चरण" — विषय-समितियों की रिपोर्टों का समावेश। जहाँ विरोधाभास था, वहाँ समन्वय।

"तृतीय चरण" — भाषाई परिष्करण। कानूनी शब्दावली का सटीक चयन।

डॉ. अंबेडकर के बारे में एक प्रसिद्ध तथ्य है — प्रारूप समिति के अन्य सदस्य अनेक कारणों से अनुपस्थित रहे। एक सदस्य की मृत्यु हो गई, एक बीमार पड़ा, एक विदेश चला गया। डॉ. अंबेडकर ने अकेले ही अधिकांश कार्य का बोझ उठाया।

उन्होंने कहा था — "मुझे नहीं पता था कि मुझे इतना काम करना होगा।"

"फरवरी 1948" में प्रारूप संविधान प्रकाशित हुआ और आठ महीनों के लिए जनता और प्रांतीय सरकारों के लिए खुला रखा गया। इस अवधि में 7635 सुझाव और आपत्तियाँ प्राप्त हुईं।


प्रथम वाचन — समग्र चर्चा और बुनियादी प्रश्न

"नवंबर 1948" में संविधान सभा का सातवाँ सत्र आरंभ हुआ और "प्रारूप संविधान का प्रथम वाचन" शुरू हुआ।

"4 नवंबर 1948" को डॉ. अंबेडकर ने प्रारूप समिति की ओर से एक ऐतिहासिक भाषण दिया। यह भाषण संविधान सभा के इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण भाषणों में से एक है।

प्रथम वाचन की विशेषता —

"समग्र चर्चा" — इस वाचन में संविधान के समग्र स्वरूप पर चर्चा होती थी। प्रत्येक अनुच्छेद पर अलग-अलग नहीं।

"मूल प्रश्न" — सदस्यों ने बुनियादी प्रश्न उठाए — क्या संसदीय प्रणाली उचित है? क्या केंद्र बहुत शक्तिशाली है? क्या मौलिक अधिकार पर्याप्त हैं?

"विविध दृष्टिकोण" — गांधीवादी, समाजवादी, उदारवादी, परंपरावादी — सभी ने अपने-अपने विचार रखे।

प्रमुख बहसें —

"संघीय बनाम एकात्मक" — क्या भारत अत्यधिक केंद्रीकृत हो रहा है?

"संपत्ति का अधिकार" — क्या यह मौलिक अधिकार होना चाहिए?

"धर्मनिरपेक्षता" — क्या यह शब्द स्पष्ट रूप से संविधान में होना चाहिए?

"राजभाषा" — हिंदी, हिंदुस्तानी या अंग्रेजी?


द्वितीय वाचन — अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद की कठिन परीक्षा

"द्वितीय वाचन" संविधान निर्माण की प्रक्रिया का सबसे विस्तृत और श्रमसाध्य चरण था। इसमें प्रत्येक अनुच्छेद पर अलग-अलग चर्चा और मतदान होता था।

"द्वितीय वाचन की प्रक्रिया"

प्रथम चरण — प्रारूप समिति का कोई सदस्य (प्रायः डॉ. अंबेडकर) अनुच्छेद प्रस्तुत करता था।

द्वितीय चरण — उस अनुच्छेद पर संशोधन प्रस्ताव रखे जाते थे।

तृतीय चरण — सदस्य अपने संशोधनों की व्याख्या करते और पक्ष में तर्क देते।

चतुर्थ चरण — प्रारूप समिति के प्रतिनिधि प्रत्येक संशोधन का उत्तर देते।

पंचम चरण — मतदान होता था।

इस प्रक्रिया की विशेषता यह थी कि किसी भी अनुच्छेद पर 50 से अधिक संशोधन आ सकते थे। इन सबको क्रमबद्ध करना, चर्चा कराना और मतदान करवाना — यह एक अत्यंत जटिल और समय-साध्य कार्य था।

"डॉ. अंबेडकर की भूमिका" इस वाचन में सर्वाधिक प्रभावशाली थी। वे प्रत्येक अनुच्छेद के पक्ष में तर्क देते, विरोधी संशोधनों का उत्तर देते और जहाँ उचित लगता, संशोधन स्वीकार भी करते।


संशोधन प्रस्तावों की प्रक्रिया — लोकतंत्र का जीवंत स्वरूप

संविधान सभा में "संशोधन प्रस्तावों की प्रक्रिया" लोकतांत्रिक संवाद का सबसे सुंदर उदाहरण थी।

"संशोधन प्रस्ताव रखने की विधि"

सदस्य को अपना प्रस्ताव लिखित रूप में सचिवालय को पहले से देना होता था।

सचिवालय सभी संशोधनों को वर्गीकृत करता था।

अध्यक्ष तय करते थे कि किस संशोधन को चर्चा के लिए लिया जाएगा।

जो संशोधन एक-दूसरे से मिलते-जुलते थे, उन्हें एक साथ लिया जाता था।

"संशोधनों के प्रकार"

"मूल प्रारूप में शब्द-परिवर्तन" — भाषाई या तकनीकी सुधार।

"वैकल्पिक अनुच्छेद" — मूल अनुच्छेद के स्थान पर नया प्रस्ताव।

"अनुच्छेद को हटाना" — पूरे प्रावधान को समाप्त करने का प्रस्ताव।

"रोचक तथ्य" — कुल 7635 संशोधन प्रस्ताव आए किंतु केवल 2473 स्वीकार किए गए। शेष या तो वापस लिए गए, या मतदान में गिरे, या अध्यक्ष ने उन्हें अव्यावहारिक मानकर नहीं लिया।

यह संख्या दर्शाती है कि संविधान निर्माण कितनी जीवंत, बहुस्तरीय और सहभागी प्रक्रिया थी।


मतदान प्रक्रिया — निर्णय की पारदर्शी व्यवस्था

संविधान सभा में "मतदान प्रक्रिया" अत्यंत स्पष्ट और पारदर्शी थी।

"ध्वनि-मत" (Voice Vote) — सामान्य परिस्थितियों में अध्यक्ष "पक्ष में" और "विपक्ष में" की आवाज लेते थे। जिस पक्ष की आवाज अधिक होती, उसे विजेता माना जाता था।

"विभाजन" (Division) — यदि किसी पक्ष को ध्वनि-मत का परिणाम संतोषजनक न लगता, तो वह "विभाजन" माँग सकता था। इसमें सदस्य उठकर अपना मत दर्शाते थे और उनकी गणना होती थी।

"बहुमत" — अधिकांश निर्णय साधारण बहुमत से होते थे। किंतु कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर विशेष बहुमत की आवश्यकता थी।

संविधान सभा में दलीय अनुशासन का कठोर पालन नहीं होता था। सदस्य अपने विवेक से मत दे सकते थे। यह संविधान सभा को एक वास्तविक विचार-सभा बनाता था।

"महत्त्वपूर्ण मतदान"

राजभाषा प्रश्न पर मतदान — जिसमें "हिंदी" एक मत के अंतर से पारित हुई।

अस्पृश्यता निषेध पर मतदान — जो सर्वसम्मति से पारित हुआ।

संपत्ति के अधिकार पर मतदान — जो अनेक चर्चाओं के बाद पारित हुआ।


वाद-विवाद की गुणवत्ता — महान भाषणों की एक अनूठी श्रृंखला

संविधान सभा में जो वाद-विवाद हुए, वे "विचार की गुणवत्ता" की दृष्टि से विश्व के किसी भी संवैधानिक सभा से तुलनीय हैं।

"डॉ. अंबेडकर के भाषण"

"4 नवंबर 1948" — प्रथम वाचन का उद्घाटन भाषण जिसमें उन्होंने संविधान के दर्शन को स्पष्ट किया।

"25 नवंबर 1949" — समापन भाषण जो सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

"नेहरू के भाषण" — उनका "उद्देश्य प्रस्ताव" वाला भाषण काव्यात्मक और दूरदर्शी था।

"अन्य प्रभावशाली वक्ता"

"के.एम. मुंशी" — विधिक तर्कशक्ति।

"एच.वी. कामथ" — गांधीवादी दृष्टिकोण।

"के.टी. शाह" — समाजवादी आर्थिक दृष्टि।

"टी.टी. कृष्णमाचारी" — व्यंग्यात्मक और तीखी शैली।

"अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर" — विधिशास्त्र की गहरी समझ।

"महिला सदस्यों के भाषण"

"हंसा मेहता" ने महिला अधिकारों के लिए जो तर्क दिए, वे आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने "मनुष्य" की जगह "व्यक्ति" शब्द के प्रयोग के लिए तर्क दिया।

"दुर्गाबाई देशमुख" ने कमजोर वर्गों के अधिकारों की पक्षधरता की।


तृतीय वाचन — अंतिम परिष्करण और भाषाई सटीकता

"अक्टूबर 1949" में संविधान सभा का दसवाँ सत्र आरंभ हुआ और "तृतीय वाचन" (Third Reading) की प्रक्रिया शुरू हुई।

तृतीय वाचन का स्वरूप प्रथम और द्वितीय वाचन से भिन्न था।

"तृतीय वाचन की विशेषताएँ"

"समग्र समीक्षा" — पूरे संविधान को एक बार फिर देखा गया।

"भाषाई परिष्करण" — कानूनी शब्दावली की सटीकता सुनिश्चित की गई।

"तकनीकी सुधार" — जहाँ कोई अस्पष्टता थी, उसे दूर किया गया।

"हिंदी संविधान" — हिंदी अनुवाद समिति ने संविधान का हिंदी संस्करण तैयार किया।

"हिंदी में संवैधानिक शब्दावली" — अनेक कानूनी शब्दों के हिंदी समकक्ष ढूँढना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य था। "न्यायिक पुनरीक्षण" (Judicial Review), "संघवाद" (Federalism), "धर्मनिरपेक्षता" (Secularism) जैसे शब्दों के हिंदी प्रतिरूप विकसित किए गए।

तृतीय वाचन में "डॉ. अंबेडकर" ने अपना "अंतिम और सर्वाधिक प्रसिद्ध भाषण" दिया — 25 नवंबर 1949 को।

इस भाषण में उन्होंने तीन चेतावनियाँ दीं —

महान व्यक्तियों की अंध-भक्ति से बचना।

संवैधानिक मार्ग कभी न छोड़ना।

राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र में बदलना।


संविधान का अंगीकरण — 26 नवंबर 1949 का ऐतिहासिक दिन

"26 नवंबर 1949" — यह वह दिन था जिसकी प्रतीक्षा तीन वर्षों से की जा रही थी। संविधान सभा की अंतिम बैठक में संविधान को अंगीकृत (adopted) किया गया।

"अंगीकरण की प्रक्रिया"

"डॉ. राजेंद्र प्रसाद" ने अध्यक्ष के रूप में एक "भावपूर्ण भाषण" दिया जिसमें उन्होंने सभी सदस्यों, समितियों और संवैधानिक सलाहकार के योगदान को याद किया।

फिर संविधान को अंगीकृत करने का "प्रस्ताव" रखा गया।

यह प्रस्ताव "सर्वसम्मति से" पारित हुआ।

"284 सदस्यों" ने संविधान पर अपने हस्ताक्षर किए।

"हस्ताक्षर का दृश्य" अत्यंत भावपूर्ण था — एक-एक करके सदस्य आगे आते और उस दस्तावेज पर अपनी मोहर लगाते जो उनके देश का भविष्य था।

"26 जनवरी 1950" को संविधान लागू हुआ — इस तारीख को इसलिए चुना गया क्योंकि 1930 में इसी दिन कांग्रेस ने "पूर्ण स्वराज" की घोषणा की थी।

"संविधान की प्रति" — मूल संविधान प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने हाथ से कैलिग्राफी में लिखा। प्रत्येक पृष्ठ को नंदलाल बोस और उनके शिष्यों ने अलंकृत किया।


संविधान सभा की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन — उपलब्धि और सीमाएँ

संविधान सभा की कार्यप्रणाली का समग्र मूल्यांकन करते समय हमें इसकी असाधारण उपलब्धियों और कुछ सीमाओं दोनों को निष्पक्षता से देखना होगा।

"उपलब्धियाँ"

"लोकतांत्रिक विमर्श" — 166 दिनों में हुई बहसों की गुणवत्ता असाधारण थी। प्रत्येक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर गहन और बहुस्तरीय विचार हुआ।

"समावेशिता" — संविधान सभा में महिलाओं, अल्पसंख्यकों, दलितों और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि थे।

"व्यावहारिकता" — तीन वर्षों में विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान तैयार करना एक असाधारण उपलब्धि है।

"अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि" — विश्व के अनेक संविधानों का अध्ययन करके सर्वश्रेष्ठ प्रावधानों को भारतीय संदर्भ में अपनाया गया।

"आलोचनाएँ"

"जन-भागीदारी का अभाव" — संविधान सभा के सदस्य सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से नहीं चुने गए थे।

"कांग्रेस का वर्चस्व" — अधिकांश निर्णय कांग्रेस की सोच के अनुरूप थे।

"मुस्लिम लीग का बहिष्कार" — सभा पूरी तरह प्रतिनिधिक नहीं थी।

किंतु इन सीमाओं के बावजूद, संविधान सभा की कार्यप्रणाली एक अनुकरणीय आदर्श बनी हुई है। यह सभा अपने युग और संदर्भ में "असाधारण" थी और इसने जो संविधान बनाया, वह आज 75 वर्षों से 140 करोड़ भारतीयों के जीवन का आधार है — यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।

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