संविधान सभा की अवधारणा — स्वशासन का स्वप्न
इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब एक राष्ट्र अपनी नियति को स्वयं निर्धारित करने का अवसर पाता है — जब पराधीनता की जंजीरें टूटती हैं और एक नई व्यवस्था का निर्माण होता है। भारत के लिए ऐसा क्षण था — "संविधान सभा का गठन"। यह एक ऐसी संस्था थी जिसने भारत की आत्मा को कानूनी शब्दों में ढाला, जिसने करोड़ों भारतीयों के स्वप्नों को संवैधानिक यथार्थ बनाया।
"संविधान सभा" की अवधारणा का अर्थ है — एक ऐसी सभा जो जनता के प्रतिनिधियों से मिलकर बने और जो उस देश का संविधान बनाए। यह विचार यूरोपीय ज्ञान-आंदोलन और "1787 की अमेरिकी संविधान सभा" से प्रेरित था। भारत में इस अवधारणा की माँग स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ विकसित हुई।
भारत में संविधान सभा की माँग के पीछे एक मूल प्रश्न था — "भारत का संविधान कौन बनाएगा?" क्या वह ब्रिटिश संसद बनाएगी? या कोई विदेशी आयोग? भारतीय नेताओं का स्पष्ट उत्तर था — "भारत का संविधान केवल भारतीयों द्वारा, भारतीयों के लिए बनाया जाएगा।"
यही वह मूल विचार था जिसने संविधान सभा के गठन की आवश्यकता को अपरिहार्य बना दिया और जिसने अंततः उस असाधारण दस्तावेज को जन्म दिया जो आज भी 140 करोड़ भारतीयों के जीवन का आधार है।
संविधान सभा की माँग — स्वराज की पहली आवाज
भारत में "संविधान सभा" की माँग का एक लंबा और रोचक इतिहास है। यह माँग एकाएक नहीं उठी — यह भारतीय स्वतंत्रता-आंदोलन के साथ धीरे-धीरे परिपक्व होती रही।
"एम.एन. रॉय" (1934) — मार्क्सवादी विचारक मानवेंद्रनाथ रॉय ने पहली बार औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव रखा कि भारत के लिए एक संविधान सभा का गठन होना चाहिए। उनका तर्क था कि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि ही भारत का संविधान बनाने के अधिकारी हैं।
"भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस" (1935) — कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से इस माँग को अपने कार्यक्रम में सम्मिलित किया।
"जवाहरलाल नेहरू" (1938) — अपने ऐतिहासिक भाषण में नेहरू ने कहा — "स्वतंत्र भारत का संविधान वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित संविधान सभा द्वारा बनाया जाएगा।"
"अगस्त प्रस्ताव" (1940) — ब्रिटिश सरकार ने पहली बार यह माना कि भारत का संविधान बनाने का प्रमुख उत्तरदायित्व भारतीयों का है।
"क्रिप्स मिशन" (1942) — संविधान सभा की परिकल्पना को आंशिक मान्यता मिली किंतु शर्तें इतनी अस्वीकार्य थीं कि कांग्रेस ने इसे अस्वीकार किया।
इस प्रकार 12 वर्षों के संघर्ष और विमर्श के बाद संविधान सभा की माँग को अंततः 1946 में वास्तविकता का रूप मिला।
कैबिनेट मिशन योजना 1946 — संविधान सभा का कानूनी आधार
"कैबिनेट मिशन योजना" भारत के संवैधानिक इतिहास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। यह वह योजना थी जिसने संविधान सभा को एक कानूनी और व्यावहारिक आधार दिया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन में "क्लेमेंट एटली" की लेबर सरकार सत्ता में आई। उसने तीन कैबिनेट मंत्रियों — "लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस" (भारत सचिव), "सर स्टैफोर्ड क्रिप्स" (व्यापार बोर्ड अध्यक्ष) और "ए.वी. अलेक्जेंडर" (नौसेना मंत्री) — को भारत भेजा।
"16 मई 1946" को कैबिनेट मिशन ने अपनी योजना प्रकाशित की। इसके अनुसार संविधान सभा का गठन इस प्रकार होगा —
निर्वाचन पद्धति — अप्रत्यक्ष। प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्य अपने प्रतिनिधि चुनेंगे।
आनुपातिक प्रतिनिधित्व — प्रत्येक 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि।
सांप्रदायिक विभाजन — तीन समुदायों — सामान्य (हिंदू), मुसलमान और सिख — के सदस्य अलग-अलग अपने प्रतिनिधि चुनेंगे।
देसी रियासतें — उन्हें भी प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।
| समुदाय | सीटें |
|---|---|
| सामान्य | 212 |
| मुसलमान | 78 |
| सिख | 4 |
| देसी रियासतें | 93 |
| कुल | 389 |
यह योजना भारत को अखंड रखते हुए एक स्वतंत्र संविधान सभा बनाने का प्रयास था।
संविधान सभा का चुनाव — जुलाई-अगस्त 1946
कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार "जुलाई-अगस्त 1946" में ब्रिटिश भारत के प्रांतों में संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव हुआ। यह चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से नहीं — बल्कि प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से हुआ।
इस चुनाव में "भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस" ने 210 सामान्य सीटों में से 208 पर जीत दर्ज की — यह एक ऐतिहासिक बहुमत था।
"मुस्लिम लीग" ने 78 मुस्लिम सीटों में से 73 जीतीं।
चुनाव के परिणाम स्पष्ट थे — भारत में दो प्रमुख राजनीतिक शक्तियाँ थीं और दोनों को संविधान सभा में स्थान मिला था।
किंतु मुहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार करने का निर्णय किया। उनकी माँग थी कि पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा हो।
इस बहिष्कार के बावजूद संविधान सभा ने अपना काम जारी रखा। कांग्रेस के नेताओं का मानना था कि जिन्होंने चुनाव में भाग लिया, वे ही संविधान बनाएंगे।
देसी रियासतों के प्रतिनिधि धीरे-धीरे आए और अधिकांश ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करके संविधान सभा में अपना स्थान ग्रहण किया।
संविधान सभा की संरचना — भारत की विविधता का लघु-रूप
संविधान सभा की सदस्यता भारत की अपनी विविधता का एक जीवंत प्रतिनिधित्व थी। यह सभा केवल राजनेताओं की नहीं थी — इसमें विधिवेत्ता, शिक्षाविद, समाज-सुधारक, उद्योगपति और विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधि सम्मिलित थे।
"कुल सदस्य" — 389 (प्रारंभ में), विभाजन के बाद 299।
"महिला सदस्य" — 15 — जिनमें "सरोजिनी नायडू, हंसा मेहता, दुर्गाबाई देशमुख, राजकुमारी अमृत कौर, विजयलक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी" प्रमुख थीं।
"अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि" — डॉ. बी.आर. अंबेडकर सहित अनेक।
"अल्पसंख्यक प्रतिनिधि" — ईसाई, पारसी, एंग्लो-इंडियन।
संविधान सभा के सदस्यों में भारत के श्रेष्ठतम बौद्धिक प्रतिभाएँ थीं —
"डॉ. बी.आर. अंबेडकर" — विधिशास्त्र के महापंडित।
"जवाहरलाल नेहरू" — आधुनिक भारत के शिल्पकार।
"सरदार वल्लभभाई पटेल" — लौह पुरुष।
"डॉ. राजेंद्र प्रसाद" — संविधान सभा के अध्यक्ष।
"के.एम. मुंशी, अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, एन. गोपालस्वामी आयंगर, टी.टी. कृष्णमाचारी" — विधिशास्त्र के विशेषज्ञ।
"मौलाना अबुल कलाम आजाद" — इस्लामी विद्वान और भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतीक।
प्रमुख व्यक्तित्व — संविधान निर्माताओं की असाधारण गाथा
संविधान सभा के प्रमुख व्यक्तित्वों को जाने बिना इसके गठन और कार्य की समझ अधूरी है। ये वे व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी बुद्धि, परिश्रम और देशभक्ति से एक ऐसे दस्तावेज का निर्माण किया जो आज विश्व के महानतम संविधानों में गिना जाता है।
"डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर" — प्रारूप समिति के अध्यक्ष। एक दलित परिवार में जन्मे, जाति-भेद और सामाजिक अपमान को झेलते हुए कोलंबिया और लंदन से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्हें "भारतीय संविधान का जनक" कहा जाता है।
"जवाहरलाल नेहरू" — उद्देश्य प्रस्ताव के प्रस्तावक। धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समाजवादी भारत के स्वप्नद्रष्टा।
"डॉ. राजेंद्र प्रसाद" — संविधान सभा के अध्यक्ष। बिहार के साधारण किसान परिवार से आए, प्रतिभा और परिश्रम से देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचे।
"सरदार पटेल" — सलाहकार समिति के अध्यक्ष। रियासतों के एकीकरण के साथ-साथ मौलिक अधिकारों की संरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका।
"हंसा मेहता" — जिन्होंने सुनिश्चित किया कि संविधान में "मनुष्य" की जगह "व्यक्ति" शब्द हो ताकि महिलाओं को समान अधिकार मिले। यह एक छोटा परिवर्तन था किंतु इसका महत्त्व असीम था।
संविधान सभा की प्रथम बैठक — 9 दिसंबर 1946
"9 दिसंबर 1946" — यह वह दिन था जब भारत के भाग्य ने एक नई करवट ली। नई दिल्ली के "संसद भवन के केंद्रीय कक्ष" में संविधान सभा की प्रथम बैठक हुई।
उस दिन का वातावरण अत्यंत भावपूर्ण था। बाहर दिल्ली की ठंडी दिसंबर की सुबह थी — किंतु भीतर एक ऐतिहासिक क्षण की गर्मी और उत्साह था। 207 सदस्य उपस्थित थे। मुस्लिम लीग के सदस्यों ने बहिष्कार किया था।
बैठक का आरंभ एक अनोखे निर्णय से हुआ — सबसे वरिष्ठ सदस्य "डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा" को "अस्थायी अध्यक्ष" (Provisional President) चुना गया।
डॉ. सिन्हा ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा — "यह सभा एक राष्ट्र की प्रसव-पीड़ा है। इस पीड़ा से जो बालक जन्म लेगा, वह भारत का भविष्य होगा।"
इस बैठक में एक महत्त्वपूर्ण संकेत था — जब "फ्रैंक एंथोनी" (एंग्लो-इंडियन) ने अपना भाषण अंग्रेजी में दिया तो सभा में एक मुस्कान फैल गई। भारत की विविधता — जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र — इस सभा में एक साथ उपस्थित थी।
प्रथम बैठक की अवधि 14 से 23 दिसंबर 1946 तक चली।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद — स्थायी अध्यक्ष का चुनाव
"11 दिसंबर 1946" को संविधान सभा ने अपना "स्थायी अध्यक्ष" चुना — "डॉ. राजेंद्र प्रसाद"। यह चुनाव सर्वसम्मति से हुआ।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का चुनाव क्यों महत्त्वपूर्ण था? वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें सभी राजनीतिक दलों और विचारधाराओं का सम्मान प्राप्त था। वे न अत्यंत कट्टर हिंदू थे, न पश्चिमीकृत। वे बिहार के एक साधारण परिवार से आए थे और अपनी योग्यता से ऊपर उठे थे।
डॉ. प्रसाद के अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा — "हम यहाँ एक ऐसा संविधान बनाने आए हैं जो न केवल आज के भारत के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उचित हो। हमारा लक्ष्य केवल कानून बनाना नहीं — बल्कि एक ऐसे भारत की नींव रखना है जहाँ प्रत्येक नागरिक सम्मान और स्वतंत्रता के साथ जी सके।"
"उपाध्यक्ष" के रूप में "एच.सी. मुखर्जी" चुने गए — जो एक ईसाई थे। यह संविधान सभा की धर्मनिरपेक्ष भावना का प्रतीक था।
"वी.टी. कृष्णमाचारी" और "जे.बी. कृपलानी" को भी उपाध्यक्ष की भूमिकाएँ दी गईं।
उद्देश्य प्रस्ताव — नेहरू की ऐतिहासिक घोषणा
"13 दिसंबर 1946" को जवाहरलाल नेहरू खड़े हुए और उन्होंने "उद्देश्य प्रस्ताव" (Objectives Resolution) प्रस्तुत किया। यह संविधान सभा के इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण था।
नेहरू का भाषण अत्यंत काव्यात्मक और दूरदर्शी था। उन्होंने कहा —
"यह क्षण — जो इतिहास में दुर्लभ है — वह क्षण है जब हम पुराने से नए की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, संकीर्णता से विशालता की ओर कदम रखते हैं।"
उद्देश्य प्रस्ताव में घोषित किया गया कि भारत एक —
"स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य" होगा।
नागरिकों को "सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय" मिलेगा।
"विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और उपासना" की स्वतंत्रता होगी।
"प्रतिष्ठा और अवसर की समता" होगी।
"अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और जनजातियों" के हितों की रक्षा होगी।
यह उद्देश्य प्रस्ताव 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से पारित हुआ।
इसी उद्देश्य प्रस्ताव से आगे चलकर "संविधान की प्रस्तावना" का जन्म हुआ — जिसमें "न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व" के चार महान आदर्श हैं।
मुस्लिम लीग का बहिष्कार और उसके परिणाम
संविधान सभा के इतिहास में "मुस्लिम लीग का बहिष्कार" एक महत्त्वपूर्ण और दुखद अध्याय है। "मुहम्मद अली जिन्ना" का मत था कि एक संयुक्त संविधान सभा में मुसलमानों के हित सुरक्षित नहीं रह सकते।
जिन्ना की माँगें —
मुसलमानों के लिए अलग संविधान सभा।
"पाकिस्तान" की स्वतंत्र स्थापना।
कैबिनेट मिशन योजना की अपनी व्याख्या — जिसे कांग्रेस ने अस्वीकार किया।
इस बहिष्कार के दूरगामी परिणाम हुए —
संविधान सभा की प्रतिनिधित्व क्षमता पर प्रश्नचिह्न।
साम्प्रदायिक तनाव का बढ़ना।
अंततः "भारत का विभाजन" (अगस्त 1947)।
किंतु इस बहिष्कार का एक "सकारात्मक पहलू" भी था — कांग्रेस और संविधान सभा के बहुमत को अपनी दृष्टि से संविधान बनाने की अधिक स्वतंत्रता मिली।
जो मुस्लिम प्रतिनिधि भारत में रहे — जैसे "मौलाना आजाद, टी.टी. कृष्णमाचारी" और अन्य — उन्होंने संविधान सभा में सक्रिय भूमिका निभाई और यह सिद्ध किया कि धर्मनिरपेक्ष भारत में मुसलमानों का सम्मानजनक स्थान है।
विभाजन के बाद संविधान सभा का पुनर्गठन
"अगस्त 1947" में भारत के विभाजन के बाद संविधान सभा की संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया।
"पाकिस्तान बनने" के बाद वे प्रांत और रियासतें जो पाकिस्तान का हिस्सा बन गईं, उनके प्रतिनिधि भारतीय संविधान सभा से बाहर हो गए।
"सदस्य संख्या" 389 से घटकर लगभग 299 रह गई।
विभाजन के बाद संविधान सभा ने "दोहरी भूमिका" निभाई —
"संविधान निर्मात्री सभा" — नया संविधान बनाना।
"अंतरिम संसद" — देश का शासन चलाना।
"15 अगस्त 1947" को भारत स्वतंत्र हुआ — किंतु संविधान अभी बना नहीं था। "1935 के भारत सरकार अधिनियम" को अंतरिम संविधान के रूप में संशोधित रूप में प्रयोग किया गया।
देसी रियासतों के एकीकरण के बाद उनके प्रतिनिधियों ने संविधान सभा में स्थान लिया। सरदार पटेल के नेतृत्व में 562 रियासतें भारत में विलीन हुईं।
इस पुनर्गठित संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत किया और 26 जनवरी 1950 को यह लागू हुआ।
समितियों का गठन — कार्य का वैज्ञानिक विभाजन
संविधान सभा ने अपने विशाल और जटिल कार्य को सम्पन्न करने के लिए एक अत्यंत व्यवस्थित पद्धति अपनाई — विभिन्न समितियों का गठन।
कुल मिलाकर 22 समितियाँ बनाई गईं जो दो प्रकार की थीं —
"प्रक्रियात्मक समितियाँ" — संविधान सभा के आंतरिक संचालन के लिए।
"विषय-संबंधी समितियाँ" — संविधान के विभिन्न पहलुओं पर विचार के लिए।
प्रमुख समितियाँ:
"संचालन समिति" — डॉ. राजेंद्र प्रसाद (अध्यक्ष)। कार्यक्रम निर्धारण।
"संघ शक्तियाँ समिति" — जवाहरलाल नेहरू (अध्यक्ष)। केंद्र सरकार की शक्तियाँ।
"प्रांतीय संविधान समिति" — सरदार पटेल (अध्यक्ष)। राज्य सरकारों की संरचना।
"मूल अधिकार और अल्पसंख्यक समिति" — सरदार पटेल (अध्यक्ष)। नागरिक अधिकार।
"प्रारूप समिति" — डॉ. अंबेडकर (अध्यक्ष)। संविधान का मूल प्रारूप।
इन समितियों ने अंतर्राष्ट्रीय संविधानों का अध्ययन किया, विशेषज्ञों से परामर्श लिया और अपनी सिफारिशें संविधान सभा को प्रस्तुत कीं।
"संवैधानिक सलाहकार" के रूप में "सर बी.एन. राव" ने अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विश्व के प्रमुख संविधानों का अध्ययन करके एक प्रारंभिक मसौदा तैयार किया।
प्रारूप समिति — अंबेडकर का असाधारण नेतृत्व
"29 अगस्त 1947" को "प्रारूप समिति" (Drafting Committee) का गठन हुआ — यह संविधान सभा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग था।
"डॉ. भीमराव अंबेडकर" को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी — एक दलित समुदाय से आए व्यक्ति को देश का संविधान लिखने की जिम्मेदारी दी जाना स्वतंत्र भारत की समतावादी भावना का प्रतीक था।
"प्रारूप समिति के सात सदस्य" थे —
"एन. गोपालस्वामी आयंगर" — पूर्व कश्मीर प्रधानमंत्री।
"अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर" — महान विधिवेत्ता।
"के.एम. मुंशी" — गुजराती साहित्यकार और विधिज्ञ।
"सैयद मुहम्मद सादुल्लाह" — असम के पूर्व मुख्यमंत्री।
"बी.एल. मिट्टर" (बाद में एन. माधव राव द्वारा प्रतिस्थापित)।
"डी.पी. खेतान" (बाद में टी.टी. कृष्णमाचारी द्वारा प्रतिस्थापित)।
डॉ. अंबेडकर के बारे में एक प्रसिद्ध कथन है — प्रारूप समिति के अन्य सदस्य अनेक कारणों से अनुपस्थित रहे और अधिकांश कार्य का बोझ अंबेडकर पर ही पड़ा। उन्होंने रात-रात भर जागकर काम किया।
"फरवरी 1948" में प्रारूप संविधान प्रकाशित किया गया और जनता के लिए आठ महीनों तक खुला रखा गया।
संविधान सभा की कार्यप्रणाली — लोकतंत्र का जीवंत उदाहरण
संविधान सभा की कार्यप्रणाली अपने आप में एक लोकतांत्रिक आदर्श थी। यहाँ प्रत्येक अनुच्छेद पर विस्तृत चर्चा होती थी, संशोधन प्रस्ताव रखे जाते थे और मतदान होता था।
"कुल 11 सत्र" में संविधान सभा ने काम किया — 166 दिन।
"7635 संशोधन प्रस्ताव" रखे गए जिनमें से 2473 स्वीकार किए गए।
चर्चा का स्तर अत्यंत उच्च था। "एच.वी. कामथ, के.टी. शाह, महावीर त्यागी, लोकनाथ मिश्र" जैसे सदस्यों ने तर्कपूर्ण और प्रखर भाषण दिए।
महत्त्वपूर्ण विषयों पर जो बहसें हुईं —
"धर्मनिरपेक्षता" — क्या यह शब्द संविधान में होना चाहिए?
"राष्ट्रभाषा" — हिंदी या हिंदुस्तानी? यह सबसे तीखी बहसों में से एक थी।
"मौलिक अधिकार" — उनकी सीमाएँ क्या हों?
"आरक्षण" — किन वर्गों को और कितने समय के लिए?
"संपत्ति का अधिकार" — क्या यह मौलिक अधिकार हो?
संविधान सभा ने "तीन वाचनों" में संविधान को पारित किया।
"26 नवंबर 1949" को संविधान अंगीकृत हुआ और 284 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए।
संविधान सभा के गठन की अमर विरासत
संविधान सभा का गठन और उसका कार्य भारतीय इतिहास की एक ऐसी उपलब्धि है जिसे जितना सराहा जाए, उतना कम है।
"विविधता में एकता" — एक ऐसे देश में जहाँ सैकड़ों भाषाएँ, दर्जनों धर्म और हजारों जातियाँ हों, एक ऐसी सभा का निर्माण करना जो सभी का प्रतिनिधित्व करे — यह अपने आप में एक चमत्कार था।
"लोकतांत्रिक प्रक्रिया" — संविधान सभा ने यह सिद्ध किया कि भारतीय लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं का संचालन कर सकते हैं। तीन वर्षों की विस्तृत चर्चा, हजारों संशोधन प्रस्ताव और अंततः सर्वसम्मत संविधान — यह प्रक्रिया स्वयं एक महान उपलब्धि थी।
"सामाजिक न्याय का आधार" — संविधान सभा ने न केवल एक राजनीतिक ढाँचा दिया, बल्कि "अस्पृश्यता का निषेध, मौलिक अधिकार, आरक्षण की व्यवस्था" जैसे प्रावधान करके सामाजिक न्याय की नींव रखी।
"नालंदा से संसद भवन तक" — भारत की बौद्धिक परंपरा जो नालंदा और तक्षशिला में फली-फूली थी, वह 1946-1949 में संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में एक नए रूप में प्रकट हुई।
संविधान सभा का गठन भारत की "लोकतांत्रिक यात्रा का प्रारंभिक बिंदु" था — वह नींव जिस पर आज विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र खड़ा है।