प्रस्तावना — संविधान की आत्मा
कल्पना कीजिए एक विशाल और भव्य महल की — जिसके प्रवेश द्वार पर एक ऐसा शिलालेख उत्कीर्ण है जो उस पूरे भवन की आत्मा, उसके निर्माण का उद्देश्य और उसमें रहने वालों के अधिकार एवं दायित्व सब कुछ एक साथ व्यक्त करता हो। भारत के संविधान की प्रस्तावना ठीक ऐसा ही शिलालेख है — एक ऐसा आलोकित द्वार जिसके पार जाने पर उस विशाल संवैधानिक भवन की अनंत गलियारों में प्रवेश मिलता है।
प्रस्तावना मात्र कुछ पंक्तियों का एक संक्षिप्त पाठ है — किंतु इन पंक्तियों में भारत की लोकतांत्रिक आत्मा का समूचा सार समाया हुआ है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था — "प्रस्तावना संविधान की कुंजी है।" और सर अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर ने इसे "हमारे दीर्घकालिक स्वप्नों का सार" बताया था। जवाहरलाल नेहरू ने अपने "उद्देश्य प्रस्ताव" में इसके बीज बोए थे और संविधान सभा ने उन बीजों को एक कालजयी वृक्ष के रूप में पल्लवित किया।
प्रस्तावना संविधान का प्रथम पृष्ठ है — किंतु यह अंतिम विचार है, सबसे परिपक्व अभिव्यक्ति है उस स्वप्न की जो भारत के स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था। इसमें केवल 85 शब्द हैं, किंतु इन 85 शब्दों में 140 करोड़ भारतीयों का भाग्य, उनके अधिकार और उनकी गरिमा की रक्षा का वचन निहित है। यह प्रस्तावना भारत की जनता द्वारा, भारत की जनता के लिए और भारत की जनता को समर्पित एक महान घोषणापत्र है।
प्रस्तावना का ऐतिहासिक उद्भव — उद्देश्य प्रस्ताव से प्रस्तावना तक
भारत के संविधान की प्रस्तावना का इतिहास उतना ही रोमांचक है जितना स्वयं स्वतंत्रता संग्राम का। इसकी जड़ें उस ऐतिहासिक क्षण में हैं जब 13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में "उद्देश्य प्रस्ताव" (Objectives Resolution) प्रस्तुत किया। वह दिन भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय था।
नेहरू ने जब उठकर बोलना शुरू किया, तब संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में एक अजीब-सी पवित्र शांति छा गई थी। उनके शब्दों में एक काव्यात्मक गरिमा थी, एक ऐतिहासिक दायित्व का बोझ था और एक नए भारत के निर्माण की अदम्य आकांक्षा थी। उन्होंने कहा — "यह प्रस्ताव एक घोषणा है, एक संकल्प है, एक प्रतिज्ञा है और एक वचन है — हम सबकी ओर से, इस सभा की ओर से और उन करोड़ों लोगों की ओर से जिनने हमें यहाँ भेजा है।"
उद्देश्य प्रस्ताव में जो मूल विचार थे, वे इस प्रकार थे — भारत एक स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य होगा। इसके नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिलेगा। विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और उपासना की स्वतंत्रता होगी। प्रतिष्ठा और अवसर की समानता होगी। अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा होगी। 22 जनवरी 1947 को यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ। यही उद्देश्य प्रस्ताव आगे चलकर संविधान की प्रस्तावना की आत्मा बना।
प्रस्तावना में एक बड़ा परिवर्तन 1976 में आया। 42वें संविधान संशोधन द्वारा इंदिरा गांधी की सरकार ने प्रस्तावना में "समाजवादी" और "पंथनिरपेक्ष" दो शब्द जोड़े। इस संशोधन को लेकर विवाद हुआ और यह प्रश्न उठा कि क्या प्रस्तावना में संशोधन हो सकता है।
प्रस्तावना का पूर्ण पाठ और उसकी संरचना
भारत के संविधान की प्रस्तावना का पूर्ण पाठ इस प्रकार है —
"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए, दृढ़संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"
इन 85 शब्दों की इस प्रस्तावना की संरचना अत्यंत सुविचारित और व्यवस्थित है। इसे तीन भागों में देखा जा सकता है।
प्रथम भाग — सम्प्रभुता की घोषणा: "हम भारत के लोग" — यह वाक्यांश यह घोषित करता है कि संविधान का स्रोत जनता है। द्वितीय भाग — राज्य की प्रकृति: "सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य" — ये पाँच विशेषण भारतीय राज्य की प्रकृति को परिभाषित करते हैं। तृतीय भाग — नागरिकों को प्रदत्त लक्ष्य: न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व — ये चार आदर्श हैं जो भारतीय गणराज्य के मूल उद्देश्य को व्यक्त करते हैं।
| प्रस्तावना के तत्त्व | श्रेणी | महत्त्व |
| हम भारत के लोग | जन-सम्प्रभुता | सत्ता का स्रोत जनता |
| सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न | बाह्य स्वतंत्रता | किसी की अधीनता नहीं |
| समाजवादी | आर्थिक न्याय | संसाधनों का समान वितरण |
| पंथनिरपेक्ष | धार्मिक स्वतंत्रता | सभी धर्म समान |
| लोकतांत्रिक | राजनीतिक व्यवस्था | जनता का शासन |
| गणराज्य | निर्वाचित प्रमुख | वंशानुगत शासन नहीं |
"हम भारत के लोग" — जनसम्प्रभुता की महान घोषणा
प्रस्तावना के प्रथम चार शब्द — "हम भारत के लोग" — भारतीय लोकतंत्र की सबसे क्रांतिकारी और शक्तिशाली घोषणा हैं। ये शब्द अमेरिकी संविधान के "We the People" से प्रेरित थे, किंतु भारतीय संदर्भ में इनका महत्त्व और भी गहरा और व्यापक है।
इन चार शब्दों में जो दर्शन समाया है, वह युगों की परंपरा को एक झटके में उलट देता है। हजारों वर्षों से भारत में राजाओं, सम्राटों, सुल्तानों, मुगलों और अंततः ब्रिटिश वायसरायों का शासन था। सत्ता सदा ऊपर से नीचे की ओर आती थी — शासक से प्रजा की ओर। किंतु इन चार शब्दों ने यह क्रम उलट दिया। अब सत्ता नीचे से ऊपर की ओर जाती है — जनता से सरकार की ओर। जनता शासित नहीं, जनता शासक है।
"हम भारत के लोग" — यह केवल एक कानूनी सूत्र नहीं है। यह एक दार्शनिक घोषणा है जो यह स्थापित करती है कि इस विशाल गणराज्य में सर्वोच्च शक्ति किसी राजा में नहीं, किसी चुनी हुई सरकार में नहीं, किसी न्यायालय में नहीं — बल्कि उस जनता में है जो इस देश की मिट्टी पर रहती है, जो इस देश की हवा में साँस लेती है और जो इस देश के भविष्य को अपने श्रम और संघर्ष से गढ़ती है।
डॉ. अंबेडकर ने इस वाक्यांश की व्याख्या करते हुए कहा था कि यह संविधान की "प्रामाणिकता" का स्रोत है। संविधान इसलिए वैध है क्योंकि इसे जनता के प्रतिनिधियों ने बनाया और जनता के नाम पर अर्पित किया। यह कोई राजाज्ञा नहीं, कोई औपनिवेशिक फरमान नहीं — यह जनता का अपना दस्तावेज है।
"सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न" — स्वतंत्रता का उद्घोष
प्रस्तावना में "सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न" शब्द भारत की बाह्य और आंतरिक स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं। "सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न" का अर्थ है कि भारत किसी बाहरी शक्ति के प्रति उत्तरदायी नहीं है, किसी विदेशी नियंत्रण के अधीन नहीं है और अपनी घरेलू और विदेश नीति निर्धारित करने में पूरी तरह स्वतंत्र है।
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो वह तत्काल "डोमिनियन" बना — अर्थात् ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का एक स्वशासी सदस्य जो ब्रिटिश सम्राट को अपना राज्याध्यक्ष मानता था। किंतु 26 जनवरी 1950 को जब संविधान लागू हुआ और भारत एक "गणराज्य" बना, तब ब्रिटिश सम्राट से सभी संबंध समाप्त हो गए। अब भारत का अपना राष्ट्रपति था — जनता द्वारा, जनता के प्रतिनिधियों के माध्यम से निर्वाचित।
"सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न" शब्द का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है — यह भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर भी लागू होता है। भारत किसी सैन्य गठबंधन का स्थायी सदस्य नहीं है, किसी महाशक्ति का उपनिवेश नहीं है। भारत की विदेश नीति — जो "गुटनिरपेक्षता" के सिद्धांत पर आधारित रही — इसी प्रभुत्वसम्पन्नता की अभिव्यक्ति है। नेहरू के शब्दों में — "भारत किसी के आगे नहीं झुकेगा, भारत अपनी शर्तों पर जीएगा।" यही "सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्नता" का वास्तविक अर्थ है।
"समाजवादी" — आर्थिक न्याय की व्यापक संकल्पना
प्रस्तावना में "समाजवादी" शब्द 1976 के 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया था। इस शब्द के जुड़ने से प्रस्तावना में एक नया आयाम आया — आर्थिक न्याय का आयाम। किंतु यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि भारतीय संविधान का "समाजवाद" मार्क्सवादी या सोवियत-शैली के समाजवाद से भिन्न है।
भारतीय "समाजवाद" एक लोकतांत्रिक समाजवाद है — जो निजी संपत्ति और बाजार अर्थव्यवस्था को पूरी तरह नकारता नहीं, किंतु यह सुनिश्चित करता है कि समाज के कमजोर वर्गों को आर्थिक न्याय मिले। इसमें राज्य की एक सक्रिय भूमिका है — संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण, आर्थिक असमानता को कम करना और सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त अवसर प्रदान करना।
नेहरू के भाषणों में इस भारतीय समाजवाद की स्पष्ट झलक मिलती है। उनका मानना था कि भारत को एक "मध्यमार्ग" अपनाना चाहिए — न पूर्णतः पूँजीवादी अमेरिका की तरह और न ही पूर्णतः साम्यवादी सोवियत संघ की तरह। भारत एक "मिश्रित अर्थव्यवस्था" (Mixed Economy) अपनाएगा जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र दोनों का स्थान होगा। इस दृष्टिकोण ने भारत की पंचवर्षीय योजनाओं, सार्वजनिक उपक्रमों और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जन्म दिया।
1991 के उदारीकरण के बाद "समाजवाद" की व्याख्या बदली है। किंतु मूल भावना — आर्थिक न्याय और कमजोर वर्गों की रक्षा — आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
"पंथनिरपेक्ष" — धर्मनिरपेक्षता का भारतीय स्वरूप
"पंथनिरपेक्ष" शब्द भी 1976 के 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया था। यह शब्द भारत के उस मूल चरित्र को संवैधानिक अभिव्यक्ति देता है जो विभाजन की त्रासदी के बावजूद एक बहुधर्मी, बहुसांस्कृतिक गणराज्य के रूप में विकसित होने का स्वप्न देखता था।
"पंथनिरपेक्षता" या "धर्मनिरपेक्षता" का भारतीय स्वरूप पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से भिन्न है। पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव है — राज्य धर्म के मामलों में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करता और धर्म को राज्य के क्षेत्र से बाहर रखता है। किंतु भारत की पंथनिरपेक्षता "सर्वधर्म समभाव" पर आधारित है — राज्य का कोई अपना धर्म नहीं है, किंतु वह सभी धर्मों का समान सम्मान करता है।
भारतीय पंथनिरपेक्षता का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि राज्य को धार्मिक सुधार का अधिकार है। उदाहरण के लिए, हिंदू धर्म में अस्पृश्यता की कुप्रथा के विरुद्ध कानून बनाना या मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना — ये सब "धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप" नहीं बल्कि "सामाजिक सुधार" माने जाते हैं।
मौलाना अबुल कलाम आजाद — जो इस्लामी विद्वत्ता और भारतीय राष्ट्रवाद के एक अनूठे संगम थे — ने कहा था कि इस्लाम और पंथनिरपेक्षता विरोधाभासी नहीं हैं। एक सच्चा मुसलमान, एक सच्चा हिंदू, एक सच्चा सिख — सभी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्र में सम्मानपूर्वक रह सकते हैं क्योंकि पंथनिरपेक्षता किसी को उसके धर्म से नहीं हटाती, बल्कि सभी को समान सम्मान देती है।
"लोकतांत्रिक" — जनता की सर्वोच्चता का सिद्धांत
प्रस्तावना में "लोकतांत्रिक" शब्द भारत के शासन-तंत्र की मूल प्रकृति को व्यक्त करता है। लोकतंत्र का अर्थ है — "जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन।" अब्राहम लिंकन के इस सुप्रसिद्ध वाक्य को भारतीय संविधान ने अपनी प्रस्तावना में "लोकतांत्रिक" शब्द के माध्यम से मूर्त रूप दिया है।
भारत का लोकतंत्र बहुआयामी है। यह केवल राजनीतिक लोकतंत्र नहीं — यह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की भी आकांक्षा रखता है। डॉ. अंबेडकर ने इस विषय पर अत्यंत गहरी बात कही थी — "राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता जब तक उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो। सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ है — एक ऐसी जीवन-पद्धति जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के मूलभूत सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करे।"
लोकतंत्र के दो प्रमुख स्तंभ हैं — स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। भारतीय संविधान ने दोनों की व्यवस्था की है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है। स्वतंत्र और स्वायत्त चुनाव आयोग चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करता है। और अनुच्छेद 19 के अंतर्गत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक को सरकार की आलोचना करने का अधिकार देती है — यह लोकतंत्र का सबसे मूल्यवान तत्त्व है।
"गणराज्य" — वंशानुगत राजतंत्र का अंत
प्रस्तावना में "गणराज्य" शब्द भारत की राज्य-व्यवस्था की एक और मूलभूत विशेषता को रेखांकित करता है। गणराज्य का अर्थ है — एक ऐसी व्यवस्था जिसमें राज्याध्यक्ष वंशानुगत नहीं, बल्कि निर्वाचित होता है। राजतंत्र में राजा अपना उत्तराधिकारी स्वयं तय करता है — पुत्र या परिवार का सदस्य। किंतु गणराज्य में सर्वोच्च पद पर व्यक्ति जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है।
भारत के गणराज्य बनने की कहानी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ किंतु "डोमिनियन" के रूप में — जिसका अर्थ था कि ब्रिटिश सम्राट अभी भी भारत के नाममात्र के राज्याध्यक्ष थे। जब 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और भारत "गणराज्य" बना, तब इस अंतिम औपनिवेशिक कड़ी को भी तोड़ दिया गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने — एक ऐसे व्यक्ति जो बिहार के एक साधारण किसान परिवार से आए थे और जो अपनी प्रतिभा और देशसेवा के बल पर देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचे।
26 जनवरी — जिसे "गणतंत्र दिवस" के रूप में मनाया जाता है — इसी ऐतिहासिक परिवर्तन की स्मृति में है। इस दिन भारत केवल एक देश नहीं, एक विचार बन गया — यह विचार कि एक देश की सर्वोच्च शक्ति उसकी जनता में निहित है और राज्याध्यक्ष जनता का सेवक है, जनता का स्वामी नहीं।
न्याय — सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक
प्रस्तावना में उल्लिखित चार मूल आदर्शों में प्रथम है — न्याय। और यह न्याय केवल एकायामी नहीं है — यह तीन आयामों में अभिव्यक्त होता है: सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और राजनीतिक न्याय।
सामाजिक न्याय का अर्थ है — एक ऐसा समाज जहाँ जाति, धर्म, लिंग, वंश या जन्म-स्थान के आधार पर कोई भेदभाव न हो। भारत में हजारों वर्षों से वर्ण-व्यवस्था और जाति-प्रथा ने लाखों लोगों को सामाजिक न्याय से वंचित किया था। दलितों के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार, महिलाओं के साथ भेदभाव, आदिवासियों का शोषण — ये सब सामाजिक अन्याय के ज्वलंत उदाहरण थे। संविधान ने इन सबके विरुद्ध स्पष्ट प्रावधान किए।
आर्थिक न्याय का अर्थ है — संसाधनों का ऐसा वितरण जो समाज के सभी वर्गों को न्यूनतम जीवन-स्तर प्रदान करे। जब कुछ लोगों के पास अपार संपदा हो और करोड़ों लोग भूखे रहें, तो वह आर्थिक न्याय नहीं है। नीति निदेशक तत्त्वों में आर्थिक न्याय के अनेक प्रावधान हैं — आजीविका का अधिकार, समान काम के लिए समान वेतन, बाल श्रम का निषेध और न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था।
राजनीतिक न्याय का अर्थ है — शासन में सभी की समान भागीदारी। सार्वभौमिक मताधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार और सरकारी पदों पर समान पहुँच — ये सब राजनीतिक न्याय के घटक हैं। भारतीय संविधान ने इन सभी की गारंटी दी।
स्वतंत्रता — विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और उपासना
प्रस्तावना में उल्लिखित द्वितीय महान आदर्श है — स्वतंत्रता। और यह स्वतंत्रता बहुआयामी है — "विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता।" इन पाँच प्रकार की स्वतंत्रताओं में मानवीय जीवन के सभी महत्त्वपूर्ण पहलुओं को समाहित किया गया है।
विचार की स्वतंत्रता सबसे मूलभूत स्वतंत्रता है। यह स्वतंत्रता कहती है कि आपके मन में क्या विचार हैं — इसे कोई नहीं रोक सकता, कोई नहीं जाँच सकता। विचार पर कोई नियंत्रण संभव नहीं और संविधान इसकी रक्षा करता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — जो अनुच्छेद 19(1)(a) में विस्तार से वर्णित है — वह स्वतंत्रता है जो आपको अपने विचारों को बोलने, लिखने, प्रकाशित करने और प्रसारित करने का अधिकार देती है। यह लोकतंत्र का सबसे मूल्यवान तत्त्व है क्योंकि इसके बिना कोई भी राजनीतिक विमर्श, सामाजिक परिवर्तन या वैज्ञानिक प्रगति संभव नहीं।
विश्वास की स्वतंत्रता का अर्थ है — प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा के अनुसार जीने का अधिकार है। धर्म की स्वतंत्रता यह कहती है कि आप कोई भी धर्म मान सकते हैं, उसका आचरण कर सकते हैं और उसका प्रचार कर सकते हैं। उपासना की स्वतंत्रता का अर्थ है — आप जिस भी देवता या शक्ति में विश्वास रखते हैं, उसकी उपासना कर सकते हैं।
ये सभी स्वतंत्रताएँ मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करती हैं जहाँ व्यक्ति की गरिमा और स्वायत्तता सर्वोच्च है — जहाँ राज्य व्यक्ति का स्वामी नहीं, रक्षक है।
समानता — प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्रस्तावना का तृतीय महान आदर्श है — समानता। और यह समानता दो रूपों में व्यक्त होती है: "प्रतिष्ठा की समता" और "अवसर की समता।"
प्रतिष्ठा की समता का अर्थ है — प्रत्येक भारतीय नागरिक, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग या वर्ग का हो, मानवीय गरिमा का समान अधिकारी है। एक सफाईकर्मी और एक मुख्यमंत्री — दोनों समान मानवीय गरिमा के हकदार हैं। यह प्रस्तावना की सबसे क्रांतिकारी घोषणा है क्योंकि यह जाति-व्यवस्था की उस मूल अवधारणा को नकारती है जो मनुष्यों के बीच जन्म के आधार पर श्रेणी-विभाजन करती थी।
अवसर की समता का अर्थ है — प्रत्येक नागरिक को अपनी प्रतिभा और परिश्रम के अनुसार जीवन में आगे बढ़ने का समान अवसर मिलना चाहिए। सरकारी नौकरियों में, शिक्षण संस्थाओं में, व्यापार में — कहीं भी जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। यह वह आदर्श है जो भारत को एक "मेधा-आधारित समाज" बनाने की दिशा में ले जाता है।
किंतु समानता की यह अवधारणा एक जटिल प्रश्न उठाती है — क्या सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करना वास्तव में समानता है? यदि एक व्यक्ति के पास संसाधन हैं और दूसरे के पास नहीं, तो दोनों के साथ "एक जैसा" व्यवहार करना वास्तव में असमानता को बढ़ाएगा। इसीलिए भारतीय संविधान "सकारात्मक भेदभाव" (Positive Discrimination) की अनुमति देता है — अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण इसी सिद्धांत का व्यावहारिक रूप है।
बंधुत्व — राष्ट्रीय एकता और व्यक्ति की गरिमा
प्रस्तावना का चतुर्थ और अंतिम महान आदर्श है — बंधुत्व। और यह बंधुत्व दो उद्देश्यों की सेवा करता है — "व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करना" और "राष्ट्र की एकता और अखंडता।"
"बंधुत्व" — fraternity — फ्रांसीसी क्रांति के तीन आदर्शों — स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व — में से एक है। किंतु भारतीय संविधान में इसे एक विशेष भारतीय अर्थ दिया गया है। डॉ. अंबेडकर के लिए बंधुत्व का विशेष महत्त्व था। उन्होंने कहा था — "बंधुत्व वह भावना है जो यह मानती है कि सभी मनुष्य एक हैं। यह वह भावना है जो न्याय और स्वतंत्रता को सभी के लिए सुलभ बनाती है।"
अंबेडकर ने जाति-व्यवस्था को भारतीय समाज में बंधुत्व के सबसे बड़े शत्रु के रूप में देखा था। जब एक जाति दूसरी जाति को अस्पृश्य मानती है, तो बंधुत्व की भावना नष्ट हो जाती है। इसीलिए संविधान ने अस्पृश्यता का निषेध किया और समाज में बंधुत्व की भावना विकसित करने को एक संवैधानिक दायित्व बना दिया।
"राष्ट्र की एकता और अखंडता" — ये शब्द विभाजन के घावों की पृष्ठभूमि में विशेष महत्त्व रखते हैं। 1947 में जो देश विभाजित हुआ था, जो लाखों लोग विस्थापित हुए थे — उस पृष्ठभूमि में "एकता और अखंडता" का संकल्प एक मरहम की तरह था।
प्रस्तावना की न्यायिक स्थिति — सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय
प्रस्तावना की न्यायिक स्थिति — अर्थात् क्या प्रस्तावना संविधान का अंग है, क्या इसे न्यायालय में प्रवर्तनीय बनाया जा सकता है और क्या इसमें संशोधन हो सकता है — यह प्रश्न भारतीय संवैधानिक विधि के सबसे महत्त्वपूर्ण और रोचक प्रश्नों में से एक है।
बेरुबारी संघ मामला (1960): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है — यह केवल संविधान की "कुंजी" है जो संविधान की भावना को समझने में सहायक है। यह निर्णय बाद में विवादास्पद सिद्ध हुआ।
केशवानंद भारती मामला (1973): यह भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय है। 13 न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ ने 7:6 के बहुमत से निर्णय दिया कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है। इसी मामले में "संविधान की मूल संरचना" का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया — जिसके अनुसार संसद संविधान की मूल संरचना को संशोधित नहीं कर सकती। प्रस्तावना के आदर्श — न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व — इस मूल संरचना के अभिन्न अंग हैं।
एलआईसी बनाम भारत संघ मामला (1995): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः केशवानंद भारती के निर्णय को दोहराया और स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का अंग है और इसकी व्याख्या में सहायक है।
प्रस्तावना की समकालीन प्रासंगिकता — एक चिरंतन प्रकाशस्तंभ
भारत के संविधान की प्रस्तावना आज — अपने लागू होने के 75 वर्षों बाद भी — उतनी ही प्रासंगिक, उतनी ही प्रेरणादायक और उतनी ही चुनौतीपूर्ण है जितनी 26 जनवरी 1950 को थी। यह प्रस्तावना एक चिरंतन प्रकाशस्तंभ है — जो भारत के लोकतंत्र की नौका को उसके सही मार्ग पर चलाने के लिए सदा प्रकाश देती रहती है।
समकालीन भारत में प्रस्तावना के आदर्शों की प्रासंगिकता अनेक स्तरों पर दिखाई देती है। सामाजिक न्याय का प्रश्न आज भी अनुत्तरित है — जब तक दलितों पर अत्याचार होते हैं, जब तक महिलाओं के साथ भेदभाव होता है, जब तक आदिवासियों की जमीनें छिनती हैं — तब तक "सामाजिक न्याय" का आदर्श अधूरा है। आर्थिक न्याय का प्रश्न आज और भी तीव्र हो गया है — जब भारत के 1 प्रतिशत लोगों के पास देश की 40 प्रतिशत से अधिक संपदा हो, तो "आर्थिक समानता" का स्वप्न अभी बहुत दूर है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न आज नए संदर्भों में सामने आ रहे हैं। डिजिटल युग में सोशल मीडिया और इंटरनेट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नए आयाम दिए हैं — साथ ही नई चुनौतियाँ भी। बंधुत्व का प्रश्न — जब सामाजिक विभाजन बढ़ते हैं, जब घृणा और हिंसा की घटनाएँ होती हैं — तब प्रस्तावना का यह आदर्श और भी तीव्रता से याद दिलाता है कि हम सब "भारत के लोग" हैं — भिन्न-भिन्न भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों के होते हुए भी एक।
प्रस्तावना के 85 शब्द — जो हर स्कूल के बच्चे को याद करवाए जाते हैं, जो हर नागरिकता परीक्षा में पूछे जाते हैं — ये केवल शब्द नहीं हैं। ये एक वचन हैं, एक संकल्प हैं और एक जिम्मेदारी हैं जो इस देश के हर नागरिक के कंधों पर है।