संविधान निर्माण की प्रक्रिया — ऐतिहासिक प्रस्तावना
जब कोई राष्ट्र अपना संविधान बनाता है, तो वह केवल कानूनी धाराएँ और अनुच्छेद नहीं लिखता — वह अपनी आत्मा को शब्दों में ढालता है, अपने सपनों को वैधानिक रूप देता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा मार्गदर्शक तैयार करता है जो समय के थपेड़ों में भी अडिग रहे। भारत का संविधान ऐसा ही एक जीवंत दस्तावेज है — एक ऐसा महाकाव्य जो कानून की भाषा में लिखा गया और जिसकी हर पंक्ति में करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाएँ, बलिदान और स्वप्न समाए हुए हैं।
भारत के संविधान निर्माण की प्रक्रिया न केवल भारत के लिए, बल्कि विश्व के संवैधानिक इतिहास के लिए एक अभूतपूर्व घटना थी। एक ऐसा देश जो अभी-अभी दो शताब्दियों की पराधीनता से मुक्त हुआ था, जिसकी साक्षरता दर मात्र सोलह प्रतिशत थी, जिसमें सैकड़ों भाषाएँ, दर्जनों धर्म और हजारों जातियाँ थीं — उस देश ने तीन वर्षों के गहन विमर्श के बाद विश्व का सबसे व्यापक और सुविचारित संविधान तैयार किया। यह उपलब्धि किसी चमत्कार से कम नहीं थी।
संविधान निर्माण की यह प्रक्रिया 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की प्रथम बैठक से आरंभ हुई और 26 नवंबर 1949 को संविधान के अंगीकरण के साथ पूर्ण हुई। इन लगभग तीन वर्षों में जो प्रक्रिया अपनाई गई, वह बहुस्तरीय, वैज्ञानिक और गहरे अर्थों में लोकतांत्रिक थी। यह केवल कुछ विद्वानों द्वारा बंद कमरे में तैयार किया गया दस्तावेज नहीं था — यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें जनमत, विशेषज्ञ राय, अंतर्राष्ट्रीय अनुभव और भारत की अपनी परम्परागत ज्ञान-सम्पदा सभी का समावेश था।
संवैधानिक सलाहकार — सर बी.एन. राव और प्रारंभिक मसौदे की कहानी
संविधान निर्माण की प्रक्रिया में सबसे पहला और अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम था — एक प्रारंभिक मसौदे की तैयारी। यह कार्य संवैधानिक सलाहकार सर बेनेगल नरसिंह राव को सौंपा गया था। बी.एन. राव एक असाधारण प्रतिभाशाली भारतीय सिविल सेवा अधिकारी थे जिन्हें विधिशास्त्र और संवैधानिक कानून का गहरा ज्ञान था। उन्होंने बर्मा और जम्मू-कश्मीर के संविधानों के निर्माण में भी सहायता की थी।
बी.एन. राव ने अपने कार्य की तैयारी में अत्यंत व्यापक दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने विश्व के प्रमुख संविधानों का गहन अध्ययन किया — अमेरिका का 1787 का संविधान, ब्रिटेन की संसदीय परंपरा, आयरलैंड का 1937 का संविधान, कनाडा का 1867 का संविधान, ऑस्ट्रेलिया का संघीय संविधान, दक्षिण अफ्रीका का संविधान, जापान का नया संविधान और वाइमर गणराज्य का संविधान। इस व्यापक अध्ययन के आधार पर उन्होंने विभिन्न देशों के संवैधानिक प्रावधानों की तुलनात्मक समीक्षा तैयार की।
इसके अतिरिक्त बी.एन. राव ने 1946 में अमेरिका, कनाडा और आयरलैंड की यात्राएँ कीं। अमेरिका में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर से मुलाकात की — यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण परामर्श था। फ्रैंकफर्टर ने उन्हें सुझाया कि मौलिक अधिकारों की सूची को बहुत विस्तृत न किया जाए क्योंकि अत्यधिक विस्तृत अधिकार-सूची न्यायिक व्याख्या को जटिल बना देती है। इस सुझाव का प्रभाव भारतीय संविधान के तृतीय भाग पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
बी.एन. राव ने विभिन्न विषय-समितियों की रिपोर्टों को एकत्रित करके अक्टूबर 1947 तक एक प्रारंभिक मसौदा तैयार किया। यह मसौदा प्रारूप समिति को सौंपा गया जिसने इस पर विस्तार से विचार किया।
विषय-समितियों की रिपोर्टें — संविधान के कच्चे माल की तैयारी
संविधान निर्माण की प्रक्रिया में विषय-समितियों की भूमिका अत्यंत केंद्रीय थी। इन समितियों ने संविधान के विभिन्न पहलुओं पर विशेष रूप से विचार किया और अपनी सिफारिशें संविधान सभा को प्रस्तुत कीं। इन सिफारिशों ने ही आगे चलकर संविधान के विभिन्न भागों का आधार बनाया।
मूल अधिकार उपसमिति की अध्यक्षता जे.बी. कृपलानी ने की। इस समिति ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों की एक विस्तृत सूची तैयार की। इसमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार सम्मिलित थे। हंसा मेहता ने इस समिति में महिलाओं के अधिकारों के लिए विशेष रूप से संघर्ष किया और सुनिश्चित किया कि लिंग के आधार पर भेदभाव का स्पष्ट निषेध हो।
अल्पसंख्यक उपसमिति ने धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के प्रावधानों पर विचार किया। इस समिति का काम अत्यंत संवेदनशील था क्योंकि विभाजन के बाद साम्प्रदायिक तनाव अपने चरम पर था।
संघ शक्तियाँ समिति ने केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन पर विचार किया। भारत एक विशाल और विविध देश था — इसलिए संघीय ढाँचे का प्रश्न अत्यंत जटिल था। इस समिति ने तीन सूचियों की व्यवस्था सुझाई — संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची।
प्रांतीय संविधान समिति ने राज्य सरकारों की संरचना पर विचार किया। इसमें राज्यपाल की भूमिका, मंत्रिपरिषद की जिम्मेदारी और विधानमंडल की संरचना जैसे महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर सुझाव दिए गए।
प्रारूप संविधान का प्रकाशन और जन-परामर्श
फरवरी 1948 में प्रारूप समिति ने अपना प्रारूप संविधान तैयार कर लिया और इसे सार्वजनिक किया। यह प्रारूप 315 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियों में विभाजित था। इसे आठ महीनों के लिए जनता, प्रांतीय सरकारों, उच्च न्यायालयों और अन्य संस्थाओं के पास भेजा गया ताकि वे अपने सुझाव और आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकें।
यह जन-परामर्श की एक अभूतपूर्व प्रक्रिया थी। भारत जैसे देश में — जहाँ उस समय अधिकांश जनता अशिक्षित थी — यह अपेक्षा नहीं की जा सकती थी कि सामान्य नागरिक संविधान की तकनीकी धाराओं पर टिप्पणी करेंगे। किंतु शिक्षित वर्ग, राजनीतिक संगठनों, बार एसोसिएशनों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं ने इस अवसर का सदुपयोग किया।
इस जन-परामर्श के दौरान प्राप्त सुझावों और आपत्तियों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से अधिक थी। कुल मिलाकर लगभग सात हजार से अधिक सुझाव और आपत्तियाँ प्राप्त हुईं। इनमें से अनेक अत्यंत विचारपूर्ण और तकनीकी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण थे। प्रारूप समिति ने इन सभी पर गंभीरता से विचार किया और जो सुझाव उचित लगे, उन्हें संविधान में सम्मिलित किया।
| स्रोत | प्राप्त सुझाव |
| प्रांतीय सरकारें | 289 |
| उच्च न्यायालय | 156 |
| बार एसोसिएशन | 432 |
| राजनीतिक दल | 178 |
| व्यक्तिगत नागरिक | 5980+ |
| कुल | 7000+ |
इस जन-परामर्श की प्रक्रिया ने संविधान निर्माण को एक सहभागिता-आधारित प्रक्रिया बनाया। यह प्रयास इस बात का प्रमाण था कि संविधान के निर्माता चाहते थे कि यह दस्तावेज केवल कुछ विशेषज्ञों की कृति न होकर वास्तव में "हम भारत के लोगों" का दस्तावेज बने।
प्रथम वाचन — समग्र दृष्टि और बुनियादी सिद्धांतों पर विमर्श
नवंबर 1948 में संविधान सभा का सातवाँ सत्र आरंभ हुआ और प्रारूप संविधान का प्रथम वाचन (First Reading) शुरू हुआ। 4 नवंबर 1948 को डॉ. अंबेडकर ने जो ऐतिहासिक भाषण दिया, वह प्रथम वाचन का उद्घाटन था — और यह भाषण संविधान निर्माण की पूरी प्रक्रिया का एक जीवंत दर्पण था।
प्रथम वाचन में चर्चा का स्वरूप समग्र था। यहाँ प्रत्येक अनुच्छेद पर विस्तृत बहस नहीं होती थी — बल्कि संविधान के मूल दर्शन, उसकी संरचना और उसके प्रमुख सिद्धांतों पर व्यापक विचार-विमर्श होता था। इस चरण में सदस्यों को अपने समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
डॉ. अंबेडकर ने अपने उद्घाटन भाषण में कई महत्त्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान का मूल लक्ष्य "राजनीतिक लोकतंत्र" स्थापित करना है जो आगे चलकर "सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र" की दिशा में बढ़े। उन्होंने संविधान की संघीय प्रकृति की व्याख्या करते हुए कहा कि यह "संघीय संविधान है जो केंद्रीय भी हो सकता है।" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान एक "जीवंत दस्तावेज" है जो देश की बदलती जरूरतों के अनुसार संशोधित किया जा सकता है।
प्रथम वाचन में जो प्रमुख मुद्दे उठे वे थे — संसदीय बनाम राष्ट्रपति प्रणाली, एकात्मक बनाम संघीय संरचना, मौलिक अधिकारों की व्यापकता, राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों की प्रकृति और न्यायपालिका की स्वतंत्रता। इन विषयों पर जो बहसें हुईं, उन्होंने संविधान की आत्मा को और अधिक स्पष्ट किया।
द्वितीय वाचन — संविधान निर्माण का सबसे जटिल चरण
यदि प्रथम वाचन संविधान का हवाई दृश्य था, तो द्वितीय वाचन (Second Reading) उसकी जमीनी परीक्षा थी। द्वितीय वाचन में संविधान के प्रत्येक अनुच्छेद को अलग-अलग प्रस्तुत किया गया, उस पर संशोधन प्रस्ताव रखे गए, विस्तृत चर्चा हुई और अंततः मतदान के माध्यम से निर्णय लिया गया। यह प्रक्रिया मई 1949 से अक्टूबर 1949 तक चली और यह संपूर्ण संविधान निर्माण प्रक्रिया का सबसे विस्तृत और श्रमसाध्य चरण था।
द्वितीय वाचन में जो 7635 संशोधन प्रस्ताव रखे गए, उनमें से 2473 को स्वीकार किया गया। यह संख्या बताती है कि संविधान निर्माण कितनी जीवंत और सहभागी प्रक्रिया थी। प्रत्येक स्वीकृत संशोधन ने संविधान को और अधिक परिपूर्ण, व्यावहारिक और न्यायसंगत बनाया।
द्वितीय वाचन में डॉ. अंबेडकर की भूमिका अत्यंत असाधारण थी। वे प्रत्येक अनुच्छेद के पक्ष में तर्क देते, विरोधी संशोधनों का उत्तर देते और जहाँ उचित लगता, वहाँ संशोधन स्वीकार भी करते। उनकी स्मृति, विधिक ज्ञान और तर्कशक्ति ऐसी थी कि वे बिना किसी नोट के घंटों तक बोल सकते थे। एक बार उनसे पूछा गया कि वे इतनी लंबी बहसों में कैसे इतने सटीक रहते हैं — उनका उत्तर था कि संविधान का प्रत्येक अनुच्छेद उनके मस्तिष्क में पूरी तरह अंकित है।
द्वितीय वाचन में कुछ विशेष अनुच्छेदों पर इतनी लंबी और जटिल बहसें हुईं कि उन पर एक-एक सप्ताह से अधिक समय लगा। संपत्ति के अधिकार पर बहस, धार्मिक स्वतंत्रता पर चर्चा और आरक्षण के प्रावधानों पर विमर्श — ये सभी अत्यंत भावनात्मक और तकनीकी दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण थे।
मौलिक अधिकारों पर विमर्श — स्वतंत्रता की परिभाषा
संविधान के तृतीय भाग में मौलिक अधिकारों के प्रावधान हैं — और इन प्रावधानों पर जो बहसें हुईं, वे संविधान सभा के इतिहास में सर्वाधिक जीवंत और महत्त्वपूर्ण बहसों में से हैं। मौलिक अधिकारों का प्रश्न केवल कानूनी नहीं था — यह उस मूल प्रश्न से जुड़ा था कि स्वतंत्र भारत में नागरिक और राज्य के बीच संबंध कैसा होगा।
समानता के अधिकार पर बहस में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न था — क्या जाति-आधारित आरक्षण समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करता? डॉ. अंबेडकर ने इस प्रश्न का उत्तर बड़ी तार्किकता से दिया। उन्होंने कहा कि सच्ची समानता का अर्थ केवल कानूनी समानता नहीं — बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि जो वर्ग सदियों से वंचित रहे हैं, उन्हें विशेष अवसर देकर समान धरातल पर लाया जाए। यह "सकारात्मक भेदभाव" का सिद्धांत है जो आधुनिक संवैधानिक विमर्श में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
स्वतंत्रता के अधिकार पर बहस में सबसे विवादास्पद प्रश्न था — इन अधिकारों पर लगाई जाने वाली "उचित सीमाओं" की प्रकृति क्या होगी। कुछ सदस्यों ने तर्क दिया कि अधिकारों पर कोई भी सरकारी प्रतिबंध स्वतंत्रता के मूल भाव के विरुद्ध है। किंतु डॉ. अंबेडकर और अन्य ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक नैतिकता के लिए कुछ "उचित प्रतिबंध" आवश्यक हैं।
धर्म की स्वतंत्रता पर बहस अत्यंत संवेदनशील थी। विभाजन के तत्काल बाद के उस कालखंड में जब साम्प्रदायिक हिंसा की स्मृतियाँ ताजा थीं, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के प्रावधानों पर विचार करना एक अत्यंत कठिन कार्य था। इस बहस में मौलाना आजाद, के.एम. मुंशी और टी.टी. कृष्णमाचारी के भाषण विशेष रूप से उल्लेखनीय थे।
राज्य के नीति निदेशक तत्त्व — एक नई अवधारणा का उदय
संविधान के चतुर्थ भाग में "राज्य के नीति निदेशक तत्त्व" (Directive Principles of State Policy) एक ऐसी अनूठी अवधारणा है जो भारतीय संविधान निर्माताओं की मौलिक देन है। यह विचार आयरलैंड के संविधान से प्रेरित था, किंतु भारतीय संदर्भ में इसे और अधिक व्यापक और सामाजिक-आर्थिक न्याय-उन्मुख बनाया गया।
नीति निदेशक तत्त्वों पर बहस में सबसे केंद्रीय प्रश्न यह था — जब ये तत्त्व न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं, तो इनका क्या महत्त्व है? कुछ सदस्यों ने तर्क दिया कि जो अधिकार न्यायालय में लागू नहीं कराए जा सकते, वे वास्तव में अधिकार नहीं — बल्कि केवल "शुभकामनाएँ" हैं।
के.टी. शाह ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि समाजवाद के कुछ मूल सिद्धांतों को मौलिक अधिकारों में सम्मिलित किया जाए। उन्होंने कहा कि आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक समानता अधूरी है। किंतु डॉ. अंबेडकर और नेहरू दोनों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया — उनका तर्क था कि आर्थिक नीतियाँ संविधान में नहीं, बल्कि संसद में तय होनी चाहिए।
डॉ. अंबेडकर ने नीति निदेशक तत्त्वों की व्याख्या करते हुए कहा कि यद्यपि ये न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं, तथापि ये "शासन की आत्मा" हैं। कोई भी सरकार इनकी उपेक्षा नहीं कर सकती क्योंकि जनता इनके आधार पर सरकार का मूल्यांकन करेगी और यदि सरकार इनकी अनदेखी करेगी तो जनता उसे मत नहीं देगी। यह लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का एक सूक्ष्म किंतु शक्तिशाली तंत्र था।
संघीय संरचना — केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का संतुलन
संविधान निर्माण की प्रक्रिया में सबसे जटिल और विवादास्पद प्रश्नों में से एक था — केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण कैसे हो। भारत एक विशाल देश था — विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और परम्पराओं वाला। एक ओर राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता थी जो एक मजबूत केंद्र की माँग करती थी। दूसरी ओर विविधता की रक्षा और स्थानीय स्वायत्तता के लिए राज्यों को पर्याप्त शक्तियाँ देना भी आवश्यक था।
1947 के विभाजन और उसके बाद रियासतों के एकीकरण की चुनौतियों ने इस प्रश्न को और अधिक जटिल बना दिया था। सरदार पटेल — जो रियासतों के एकीकरण के महान शिल्पकार थे — एक मजबूत केंद्र के प्रबल समर्थक थे। नेहरू भी मानते थे कि एक नए, विकासशील देश में योजनाबद्ध विकास के लिए केंद्रीय शक्ति अनिवार्य है।
किंतु दक्षिण भारत और अन्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने राज्यों की स्वायत्तता के लिए आग्रहपूर्ण स्वर में माँग की। उनका तर्क था कि यदि केंद्र बहुत शक्तिशाली होगा, तो क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों का विकास अवरुद्ध होगा।
इस द्वंद्व का समाधान तीन सूचियों की व्यवस्था से निकाला गया — संघ सूची (जिसमें 97 विषय हैं जिन पर केवल केंद्र कानून बना सकता है), राज्य सूची (जिसमें 66 विषय हैं जिन पर सामान्यतः राज्य कानून बनाते हैं) और समवर्ती सूची (जिसमें 47 विषय हैं जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, किंतु विरोध की स्थिति में केंद्र का कानून प्रभावी होगा)।
न्यायपालिका की संरचना पर विमर्श — स्वतंत्र न्याय की अवधारणा
संविधान निर्माण की प्रक्रिया में न्यायपालिका की संरचना और उसकी स्वतंत्रता के प्रश्न पर अत्यंत गहन विमर्श हुआ। भारत के संविधान निर्माता जानते थे कि लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र हो — कार्यपालिका के दबाव से और विधायिका के प्रभाव से।
सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और उसके क्षेत्राधिकार पर विस्तृत चर्चा हुई। अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर — जो स्वयं एक महान विधिशास्त्री थे — ने इस विमर्श में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की अवधारणा की जोरदार पक्षधरता की। उनका तर्क था कि यदि न्यायपालिका को संसद और कार्यपालिका के कृत्यों की संवैधानिकता जाँचने का अधिकार नहीं होगा, तो मौलिक अधिकार केवल कागज पर रह जाएंगे।
न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी गहन बहस हुई। कुछ सदस्यों ने तर्क दिया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की बहुत अधिक भूमिका न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरे में डाल देगी। किंतु व्यावहारिक कारणों से यह तय किया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके करेंगे।
उच्च न्यायालयों की स्थिति पर भी महत्त्वपूर्ण विचार-विमर्श हुआ। प्रत्येक राज्य में एक उच्च न्यायालय होगा जो सर्वोच्च न्यायालय के अधीन होगा किंतु राज्य के मामलों में सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकारी होगा।
आपातकालीन प्रावधानों की चर्चा — सुरक्षा और स्वतंत्रता का द्वंद्व
संविधान निर्माण की प्रक्रिया में सबसे विवादास्पद और दूरदर्शिता की आवश्यकता वाले प्रावधान थे — आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)। संविधान के अठारहवें भाग में वर्णित ये प्रावधान संविधान सभा में अत्यंत तीखी बहस का विषय बने।
एक ओर वे सदस्य थे जो मानते थे कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक अशांति और वित्तीय संकट जैसी परिस्थितियों में केंद्र सरकार को असाधारण शक्तियाँ मिलनी चाहिए। दूसरी ओर वे सदस्य थे जिन्हें डर था कि ये आपातकालीन शक्तियाँ लोकतंत्र को कुचलने का साधन बन सकती हैं।
एच.वी. कामथ ने इस विषय पर अत्यंत प्रखर भाषण दिया। उन्होंने कहा — "जो आपातकाल प्रावधान हम बना रहे हैं, वे भविष्य में किसी तानाशाह के हाथ का हथियार बन सकते हैं।" उनकी यह भविष्यवाणी 1975 में सत्य सिद्ध हुई जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की।
डॉ. अंबेडकर ने इस आपत्ति का उत्तर देते हुए कहा कि आपातकाल के प्रावधान अत्यंत आवश्यक हैं, किंतु इन्हें पर्याप्त सुरक्षा-उपायों से बाँधा गया है। राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के लिए मंत्रिमंडल का लिखित परामर्श, संसद की स्वीकृति और निश्चित समय-सीमा जैसी शर्तें रखी गईं। राज्यों में राष्ट्रपति शासन के प्रावधान को भी संसदीय अनुमोदन से बाँधा गया।
राजभाषा विमर्श — मुंशी-आयंगार समझौते की कहानी
संविधान निर्माण की प्रक्रिया में राजभाषा का प्रश्न सर्वाधिक भावनात्मक और विस्फोटक विषय था। यह केवल एक भाषाई प्रश्न नहीं था — यह भारत की सांस्कृतिक अस्मिता, क्षेत्रीय गौरव और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील मसला था।
हिंदी समर्थक — जिनमें पुरुषोत्तमदास टंडन, सेठ गोविंद दास और आर.वी. धुलेकर प्रमुख थे — का आग्रह था कि हिंदी को तत्काल एकमात्र राजभाषा घोषित किया जाए। आर.वी. धुलेकर तो इतने उत्साहित थे कि उन्होंने एक बार अपना पूरा भाषण हिंदी में दिया जबकि अधिकांश सदस्यों को हिंदी नहीं आती थी।
दक्षिण भारत के प्रतिनिधियों — विशेषतः टी.टी. कृष्णमाचारी, आलगेसन और अन्य — ने इसका तीव्र विरोध किया। टी.टी. कृष्णमाचारी ने एक भावपूर्ण भाषण में कहा — "यदि हम दक्षिण भारतीयों पर हिंदी थोपी गई, तो हम अपने आप को इस देश का हिस्सा नहीं मान सकते।" यह एक अत्यंत गंभीर चेतावनी थी।
के.एम. मुंशी और गोपालस्वामी आयंगार ने इस गतिरोध को तोड़ा। उन्होंने एक समझौता-फॉर्मूला प्रस्तावित किया जो "मुंशी-आयंगार फॉर्मूला" के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके अनुसार — हिंदी देवनागरी लिपि में भारत की राजभाषा होगी, किंतु अगले पंद्रह वर्षों तक अंग्रेजी सभी सरकारी कार्यों के लिए प्रयुक्त होती रहेगी। संसद चाहे तो इस अवधि को बढ़ा सकती है। प्रत्येक राज्य अपनी भाषा प्रयोग कर सकता है। यह समझौता सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया।
तृतीय वाचन — परिष्करण और अंतिम स्वरूप
अक्टूबर-नवंबर 1949 में जब संविधान सभा का दसवाँ सत्र आरंभ हुआ, तब संविधान निर्माण की प्रक्रिया अपने अंतिम और निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी थी। तृतीय वाचन (Third Reading) में संविधान के पूरे प्रारूप को एक बार फिर समग्र रूप में देखा गया। इस चरण का मुख्य उद्देश्य था — संविधान की भाषाई सुसंगति, तार्किक संरचना और समग्र सामंजस्य सुनिश्चित करना।
तृतीय वाचन में कुछ महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद जो द्वितीय वाचन में छूट गए थे या जिन पर पुनर्विचार आवश्यक था, उन्हें लिया गया। इस चरण में डॉ. अंबेडकर और उनकी टीम ने संविधान की पूरी भाषा को एक बार फिर देखा और जहाँ आवश्यक था, वहाँ शब्दावली को और अधिक स्पष्ट एवं सटीक बनाया।
हिंदी संविधान समिति का काम भी इस समय अपने चरम पर था। संविधान का हिंदी अनुवाद तैयार करना अत्यंत जटिल कार्य था। अनेक कानूनी और संवैधानिक शब्दों के लिए हिंदी समकक्ष खोजने पड़े। कुछ मामलों में नए शब्दों का निर्माण किया गया। इस कार्य में भाषाविदों, विधिशास्त्रियों और साहित्यकारों का सहयोग लिया गया।
तृतीय वाचन में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय यह लिया गया कि संविधान की प्रस्तावना (Preamble) को उसके अंतिम रूप में स्वीकार किया जाए। प्रस्तावना के शब्द — "हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए..." — ये शब्द डॉ. अंबेडकर के उद्देश्य प्रस्ताव और नेहरू की दृष्टि का एक परिपक्व संश्लेषण थे।
संविधान का अंगीकरण — एक युग का ऐतिहासिक क्षण
25 नवंबर 1949 — यह वह दिन था जब डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में अपना अंतिम और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाषण दिया। इस भाषण में उन्होंने तीन वर्षों की थकान, तीन वर्षों की मेधा और तीन वर्षों के समर्पण का निचोड़ प्रस्तुत किया। उनका यह भाषण संविधान निर्माण की प्रक्रिया का एक जीवंत और भावपूर्ण मूल्यांकन था।
उस भाषण में उन्होंने तीन चेतावनियाँ दीं जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं — पहली, किसी महान व्यक्ति के प्रति अंध-भक्ति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। दूसरी, यदि संवैधानिक तरीके काम न करें तो भी क्रांति का मार्ग त्यागना नहीं चाहिए — बल्कि संवैधानिक तरीकों को और अधिक प्रभावी बनाना चाहिए। तीसरी, राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र में बदलना होगा — अन्यथा विषमता से पीड़ित लोग उस राजनीतिक लोकतंत्र को ही नष्ट कर देंगे।
26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में वह ऐतिहासिक क्षण आया जिसकी प्रतीक्षा तीन वर्षों से की जा रही थी। अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान को अंगीकृत करने का प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ। फिर एक-एक करके 284 सदस्यों ने संविधान पर अपने हस्ताक्षर किए — यह दृश्य अत्यंत भावपूर्ण था। प्रत्येक हस्ताक्षर एक वचन था — भारत की जनता के प्रति, लोकतंत्र के प्रति और उन सभी बलिदानियों के प्रति जिन्होंने इस स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व दिया था।
संविधान निर्माण प्रक्रिया की विश्व में विशिष्टता
भारत के संविधान निर्माण की प्रक्रिया को विश्व के संवैधानिक इतिहास में उसके उचित और गौरवपूर्ण स्थान पर रखकर देखें तो यह स्पष्ट होता है कि यह प्रक्रिया अनेक दृष्टियों से अनूठी और अभूतपूर्व थी।
पहली विशिष्टता — इसकी व्यापकता। भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। इसमें 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियाँ और एक विस्तृत प्रस्तावना है। यह विस्तार इसलिए था क्योंकि भारत के संविधान निर्माता एक ऐसे देश का संविधान बना रहे थे जहाँ साक्षरता कम थी, जनचेतना सीमित थी और प्रशासनिक परंपराएँ अभी विकसित हो रही थीं। इसलिए उन्होंने अनेक ऐसे विषयों को भी संविधान में सम्मिलित किया जो अन्य देशों में साधारण कानूनों द्वारा नियंत्रित होते हैं।
दूसरी विशिष्टता — इसकी सहभागी प्रकृति। जन-परामर्श की प्रक्रिया, विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व का प्रयास, और संसदीय विमर्श की उच्च गुणवत्ता — इन सबने इस प्रक्रिया को एक वास्तविक लोकतांत्रिक उपक्रम बनाया।
तीसरी विशिष्टता — इसका संश्लेषणात्मक चरित्र। भारत के संविधान निर्माताओं ने विश्व के अनेक संविधानों से प्रेरणा ली — किंतु उन्होंने भारत की अपनी परिस्थितियों, चुनौतियों और आकांक्षाओं के अनुसार उन्हें ढाला। यह कोई अंधानुकरण नहीं था — यह एक सृजनात्मक संश्लेषण था जिसमें भारत की सभ्यतागत विरासत और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्य एक साथ समाहित थे।
26 जनवरी 1950 को जब यह संविधान लागू हुआ, तब भारत ने न केवल एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश किया — बल्कि विश्व को यह संदेश दिया कि विविधता, लोकतंत्र और न्याय एक साथ चल सकते हैं, और एक पराधीन राष्ट्र भी अपनी स्वतंत्रता के प्रथम वर्षों में ही एक ऐसा संविधान बना सकता है जो सदियों तक उसके लोकतंत्र की रक्षा करे।