संविधान सभा का गठन

 


संविधान सभा की अवधारणा — ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कल्पना कीजिए उस ऐतिहासिक क्षण की जब एक पराधीन राष्ट्र अपनी बेड़ियाँ तोड़कर स्वयं अपने भाग्य का लेखक बनने की तैयारी कर रहा हो। जब करोड़ों लोगों की आकांक्षाएँ, सपने और संघर्ष एक कागज के टुकड़े पर नहीं, बल्कि एक जीवंत, श्वास लेते संविधान में ढलने की प्रतीक्षा में हों। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें भारत की संविधान सभा का जन्म हुआ — एक ऐसी संस्था जो न केवल एक देश का संविधान बनाने के लिए, बल्कि एक सभ्यता के पुनर्जन्म के साक्षी बनने के लिए अस्तित्व में आई।

"संविधान सभा" की अवधारणा मूलतः यह मानती है कि किसी राष्ट्र का संविधान उस राष्ट्र की जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाया जाना चाहिए, न कि किसी बाहरी शक्ति या निरंकुश शासक द्वारा। यह विचार 18वीं शताब्दी की अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांतियों से उपजा था। 1787 में अमेरिका की संविधान सभा ने फिलाडेल्फिया में जो संविधान बनाया, वह विश्व का पहला लिखित संविधान था और उसने समूचे विश्व को यह संदेश दिया कि जनता स्वयं अपने शासन के नियम निर्धारित कर सकती है। भारत में इस अवधारणा का बीज उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में ही पड़ चुका था, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं ने स्वशासन की माँग उठाई थी।


संविधान सभा की माँग — राष्ट्रीय आंदोलन में एक महत्त्वपूर्ण स्वर

भारत में संविधान सभा की माँग का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि स्वतंत्रता आंदोलन का। 1895 में बाल गंगाधर तिलक ने "स्वराज विधेयक" का एक मसौदा तैयार किया था जिसमें भारतीयों के लिए अपना संविधान बनाने की माँग अंतर्निहित थी। 1916 में होमरूल आंदोलन के दौरान भी यह माँग गूँजती रही। किंतु संविधान सभा की स्पष्ट और औपचारिक माँग सर्वप्रथम 1934 में एम.एन. रॉय ने की — वे एक मार्क्सवादी चिंतक थे जिन्होंने यह तर्क दिया कि भारत का संविधान भारतीय जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ही बनाया जाना चाहिए।

1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से यह माँग अपने कार्यक्रम में सम्मिलित की कि भारत का भविष्य का संविधान एक संविधान सभा द्वारा निर्मित होना चाहिए। 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में स्पष्ट शब्दों में कहा — "स्वतंत्र भारत का संविधान वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित संविधान सभा द्वारा बनाया जाएगा, और इसमें किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के लिए कोई स्थान नहीं होगा।" 1940 में ब्रिटिश सरकार ने "अगस्त प्रस्ताव" में पहली बार यह माना कि भारत का संविधान बनाने का प्रमुख उत्तरदायित्व भारतीयों का है। यद्यपि यह प्रस्ताव अनेक शर्तों से बंधा था, तथापि यह एक महत्त्वपूर्ण स्वीकृति थी। 1942 के क्रिप्स मिशन में भी संविधान सभा की परिकल्पना को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया, किंतु उसकी शर्तें इतनी अस्वीकार्य थीं कि कांग्रेस ने उसे "दिवालिया बैंक पर उत्तरतिथीय चेक" कहकर अस्वीकार कर दिया।


कैबिनेट मिशन योजना 1946 — संविधान सभा का वैधानिक आधार

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1946 में ब्रिटेन में क्लेमेंट एटली की लेबर सरकार आई और भारतीय स्वतंत्रता के प्रति उसका रुख अपेक्षाकृत अनुकूल था। मार्च 1946 में ब्रिटिश सरकार ने तीन कैबिनेट मंत्रियों — लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस (भारत सचिव), सर स्टैफोर्ड क्रिप्स (व्यापार बोर्ड अध्यक्ष) और ए.वी. अलेक्जेंडर (नौसेना मंत्री) — को भारत भेजा। यह "कैबिनेट मिशन" था जिसने संविधान सभा के गठन का विस्तृत खाका तैयार किया।

16 मई 1946 को कैबिनेट मिशन ने अपनी योजना प्रकाशित की। इस योजना के अनुसार संविधान सभा का गठन अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति से होगा। प्रत्येक प्रांत की विधानसभा अपने प्रतिनिधियों को चुनेगी। सीटों का आवंटन जनसंख्या के अनुपात में होगा — प्रत्येक दस लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि। प्रांतीय विधानसभाओं में तीन समुदायों — सामान्य (हिंदू), मुसलमान और सिख — के सदस्य अपने-अपने प्रतिनिधि अलग-अलग चुनेंगे। देसी रियासतों को भी संविधान सभा में प्रतिनिधित्व का प्रावधान था।

संविधान सभा में समुदायों का प्रतिनिधित्व

समुदायसीटों का आधारकुल अनुमानित सीटें
सामान्य (हिंदू व अन्य)जनसंख्या अनुपात212
मुसलमानजनसंख्या अनुपात78
सिखजनसंख्या अनुपात4
देसी रियासतेंबातचीत से93
कुल-389

कैबिनेट मिशन की योजना ने भारत को अखंड रखते हुए एक संघीय संविधान बनाने का प्रस्ताव दिया था। यद्यपि यह योजना विभिन्न कारणों से अंततः विफल हो गई, तथापि इसने संविधान सभा के गठन की वैधानिक नींव रखी।


संविधान सभा का चुनाव — जुलाई-अगस्त 1946

कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार जुलाई-अगस्त 1946 में ब्रिटिश भारत के प्रांतों में संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव हुआ। यह चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं — क्योंकि उस समय ऐसा करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था — बल्कि प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से हुआ। प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्य स्वयं 1945-46 में हुए चुनावों में सीमित मताधिकार के आधार पर चुने गए थे।

इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 210 सामान्य सीटों में से 208 पर विजय प्राप्त की — यह एक भारी बहुमत था जो कांग्रेस की अपार लोकप्रियता का प्रमाण था। मुस्लिम लीग ने 78 मुस्लिम सीटों में से 73 जीतीं। इस प्रकार संविधान सभा में दो प्रमुख राजनीतिक धाराओं का स्पष्ट प्रतिनिधित्व था। किंतु मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना "पाकिस्तान" की अलग माँग पर अड़े हुए थे और उन्होंने संविधान सभा में भाग लेने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि एक संविधान सभा में हिंदू बहुमत के कारण मुसलमानों के हितों की रक्षा नहीं हो सकती। इस बहिष्कार ने संविधान सभा की प्रारम्भिक कार्यवाही को अत्यंत जटिल बना दिया।

देसी रियासतों के प्रतिनिधि — जिन्हें 93 सीटें आवंटित की गई थीं — बातचीत और समझौते के माध्यम से चुने जाने थे। प्रारम्भ में अनेक रियासतों ने संविधान सभा में भाग लेने में संकोच दिखाया, किंतु धीरे-धीरे अधिकांश ने अपने प्रतिनिधि भेजे।


संविधान सभा की संरचना — एक विविधताओं का सागर

संविधान सभा की संरचना भारत की अपनी विविधता का एक लघु-रूप थी। इसमें विभिन्न धर्मों, जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों और विचारधाराओं के प्रतिनिधि सम्मिलित थे। यह एक ऐसी सभा थी जिसमें महात्मा गांधी के अनुयायी भी थे और उनके आलोचक भी, जिसमें समाजवादी भी थे और उदारवादी भी, जिसमें ब्राह्मण भी थे और दलित भी।

संविधान सभा के सदस्यों में अनेक असाधारण प्रतिभाएँ थीं। जवाहरलाल नेहरू — आधुनिक भारत के शिल्पकार, जिन्होंने "उद्देश्य प्रस्ताव" प्रस्तुत किया। डॉ. भीमराव अंबेडकर — विधि के महापंडित, जिन्हें "संविधान का जनक" कहा जाता है। सरदार वल्लभभाई पटेल — लौह पुरुष, जिन्होंने रियासतों के एकीकरण के साथ-साथ संविधान सभा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद — जो संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष बने और बाद में भारत के प्रथम राष्ट्रपति। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन — महान दार्शनिक और शिक्षाविद। मौलाना अबुल कलाम आजाद — इस्लामी विद्वान जो भारत की धर्मनिरपेक्षता के प्रबल समर्थक थे। टी.टी. कृष्णमाचारी, के.एम. मुंशी, अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, एन. गोपालस्वामी आयंगार — ये सब विधिशास्त्र के मर्मज्ञ थे।

संविधान सभा में महिलाओं की उपस्थिति भी उल्लेखनीय थी। सरोजिनी नायडू, हंसा मेहता, दुर्गाबाई देशमुख, राजकुमारी अमृत कौर, विजयलक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी — इन साहसी महिलाओं ने संविधान निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई। हंसा मेहता ने विशेष रूप से महिला अधिकारों के लिए संघर्ष किया और सुनिश्चित किया कि संविधान में "मनुष्य" की जगह "व्यक्ति" शब्द का प्रयोग हो ताकि महिलाओं को समान अधिकार मिले।


प्रमुख व्यक्तित्व — संविधान सभा के महान निर्माता

संविधान सभा के इतिहास को समझना तब तक अधूरा है जब तक उसके प्रमुख व्यक्तित्वों के जीवन और योगदान को गहराई से नहीं समझा जाए। ये वे लोग थे जिन्होंने अपनी मेधा, अनुभव और देशप्रेम से एक ऐसे दस्तावेज को आकार दिया जो आज सात दशकों से भारत के लोकतंत्र की आत्मा है।

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का व्यक्तित्व संविधान सभा में सर्वाधिक प्रभावशाली था। एक दलित परिवार में जन्मे अंबेडकर ने जातिगत भेदभाव और अपमान को झेलते हुए कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। वे विधि, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान और इतिहास के गहरे ज्ञाता थे। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संविधान के प्रत्येक अनुच्छेद को गहन विचार-विमर्श के बाद तैयार किया। उनकी प्रतिभा, परिश्रम और विधिक दक्षता के कारण ही उन्हें "भारतीय संविधान का जनक" कहा जाता है।

जवाहरलाल नेहरू की भूमिका "उद्देश्य प्रस्ताव" के माध्यम से संविधान की आत्मा को परिभाषित करने में थी। उनका विश्वास था कि भारत का संविधान न केवल एक कानूनी दस्तावेज हो, बल्कि यह उस भारत की आत्मा को प्रतिबिंबित करे जिसका स्वप्न स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था — एक ऐसा भारत जो धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, समाजवादी और न्यायप्रिय हो।


संविधान सभा की प्रथम बैठक — 9 दिसंबर 1946

9 दिसंबर 1946 का दिन भारतीय इतिहास में एक अविस्मरणीय दिन था। नई दिल्ली के संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में संविधान सभा की प्रथम बैठक हुई। बाहर दिसंबर की सुहावनी धूप थी, किंतु भीतर का वातावरण उत्साह, उत्कंठा और एक गहरी जिम्मेदारी के भाव से भरा था।

इस प्रथम बैठक में 207 सदस्य उपस्थित थे। मुस्लिम लीग के सदस्यों ने बहिष्कार किया था और रियासतों के अनेक प्रतिनिधि अभी तक नहीं आए थे। बैठक के आरंभ में सबसे वरिष्ठ सदस्य — डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा — को अस्थायी अध्यक्ष (Provisional President) चुना गया। उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में संविधान सभा के ऐतिहासिक महत्त्व पर प्रकाश डाला और उपस्थित सदस्यों को उनके उत्तरदायित्व का स्मरण कराया।

11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष (President) चुना गया। उनका चुनाव सर्वसम्मति से हुआ — यह इस बात का प्रमाण था कि संविधान सभा में कांग्रेस के नेताओं के प्रति व्यापक सहमति थी। डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक शांत, धैर्यवान और न्यायप्रिय व्यक्तित्व थे। उनकी अध्यक्षता में संविधान सभा ने तीन वर्षों तक अनेक जटिल प्रश्नों पर विचार-विमर्श किया और अंततः एक महान संविधान का निर्माण किया।

13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने "उद्देश्य प्रस्ताव" (Objectives Resolution) प्रस्तुत किया — यह संविधान सभा के इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण था।


उद्देश्य प्रस्ताव — भारत के भविष्य का खाका

13 दिसंबर 1946 को जब जवाहरलाल नेहरू उठे और उन्होंने "उद्देश्य प्रस्ताव" पढ़ना आरंभ किया, तब संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में एक अजीब-सी शांति छा गई — वह शांति जो किसी महान क्षण के आगमन से पहले होती है। यह प्रस्ताव केवल कुछ पंक्तियों का था, किंतु इन पंक्तियों में एक स्वतंत्र राष्ट्र का समूचा स्वप्न समाया हुआ था।

उद्देश्य प्रस्ताव में घोषित किया गया कि भारत एक "स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य" होगा। इसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार-अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त होगी। अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और जनजातियों के हितों की रक्षा की जाएगी। भारत की सीमाओं की रक्षा की जाएगी और विश्व-शांति में योगदान किया जाएगा।

यह प्रस्ताव 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से पारित हुआ। इसी प्रस्ताव ने आगे चलकर संविधान की "प्रस्तावना" (Preamble) का आधार बना। भारतीय संविधान की प्रस्तावना — जिसे डॉ. अंबेडकर ने "संविधान की आत्मा" कहा — इसी उद्देश्य प्रस्ताव की परिणति है। इसमें लिखे शब्द — "हम भारत के लोग" — लोकतंत्र के सर्वोच्च सिद्धांत की घोषणा करते हैं कि सत्ता का स्रोत जनता है, न कोई राजा, न कोई विदेशी सरकार।


समितियों का गठन — कार्य का वैज्ञानिक विभाजन

संविधान सभा ने अपने विशाल कार्य को सम्पन्न करने के लिए एक अत्यंत व्यवस्थित और वैज्ञानिक पद्धति अपनाई। विभिन्न विषयों पर विचार करने के लिए अनेक समितियाँ गठित की गईं। इन समितियों ने विशेष विषयों पर गहन अध्ययन, विचार-विमर्श और रिपोर्ट तैयार की जो संविधान के निर्माण में सहायक हुईं।

प्रमुख समितियाँ इस प्रकार थीं —

प्रारूप समिति (Drafting Committee): यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समिति थी। डॉ. अंबेडकर की अध्यक्षता में इसमें सात सदस्य थे — एन. गोपालस्वामी आयंगार, अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी, सैयद मुहम्मद सादुल्लाह, बी.एल. मिट्टर (बाद में एन. माधव राव) और डी.पी. खेतान (बाद में टी.टी. कृष्णमाचारी)। इस समिति ने संविधान का मूल प्रारूप तैयार किया।

संघ शक्तियाँ समिति: जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में इस समिति ने केंद्र सरकार की शक्तियों और कार्यों पर विचार किया।

प्रांतीय संविधान समिति: सरदार पटेल की अध्यक्षता में इस समिति ने राज्यों की संवैधानिक संरचना पर काम किया।

मूल अधिकार और अल्पसंख्यक समिति: सरदार पटेल की अध्यक्षता में इस महत्त्वपूर्ण समिति ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रावधानों पर विचार किया।

इन समितियों के अतिरिक्त संचालन समिति, प्रक्रिया समिति, वित्त और कर्मचारी समिति, राष्ट्रध्वज समिति और हिंदी संविधान समिति जैसी अनेक छोटी-बड़ी समितियाँ भी गठित की गईं।


प्रारूप समिति का कार्य — अंबेडकर का असाधारण योगदान

प्रारूप समिति का कार्य संविधान सभा के समूचे कार्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और जटिल था। इस समिति को विभिन्न समितियों की रिपोर्टों, अंतर्राष्ट्रीय संविधानों के अनुभवों और भारत की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक सम्पूर्ण संविधान का प्रारूप तैयार करना था। यह कार्य फरवरी 1948 में आरंभ हुआ और अक्टूबर 1948 में प्रारूप संविधान जनता के सामने प्रकाशित किया गया।

डॉ. अंबेडकर ने इस कार्य में जो परिश्रम किया वह अकल्पनीय था। वे प्रायः रात-रात भर काम करते थे। उनका स्वास्थ्य अत्यंत खराब था — मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अनेक अन्य बीमारियाँ उन्हें कष्ट देती थीं। एक अवसर पर उन्होंने स्वयं कहा — "प्रारूप समिति के छह सदस्यों में से एक ने इस्तीफा दे दिया, एक की मृत्यु हो गई, एक अमेरिका में था, एक राजकाज में व्यस्त था — इस प्रकार वास्तविक कार्य का बोझ मुझ पर ही था।"

प्रारूप संविधान में आरंभ में 315 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ थीं। जनता से प्राप्त लगभग 7635 संशोधन प्रस्तावों पर विचार किया गया। अंततः संविधान में 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ रहीं। यह विश्व का सबसे लम्बा लिखित संविधान बना। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में अपने समापन भाषण में कहा — "मैं अनुभव करता हूँ कि यद्यपि संविधान अच्छा है, उसका भाग्य इस बात पर निर्भर करेगा कि जो लोग इसे लागू करेंगे, वे कैसे हैं।"


मुस्लिम लीग का बहिष्कार और उसके परिणाम

संविधान सभा के इतिहास में मुस्लिम लीग का बहिष्कार एक महत्त्वपूर्ण और दुखद अध्याय है। जिन्ना का मत था कि एक संयुक्त संविधान सभा में मुसलमानों के हित सुरक्षित नहीं रह सकते। उनकी माँग थी कि मुसलमानों के लिए एक अलग संविधान सभा होनी चाहिए — जो "पाकिस्तान" के संविधान का निर्माण करे। इस कारण मुस्लिम लीग के 73 निर्वाचित सदस्यों ने संविधान सभा की बैठकों में भाग लेने से इनकार कर दिया।

इस बहिष्कार के दूरगामी परिणाम हुए। एक ओर तो यह संविधान सभा की प्रतिनिधित्व क्षमता पर एक प्रश्नचिह्न था — एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल के अनुपस्थित रहने से संविधान सभा की सर्वसमावेशी प्रकृति प्रभावित हुई। दूसरी ओर, इस बहिष्कार ने कांग्रेस और संविधान सभा के बहुमत को अपनी दृष्टि से संविधान बनाने की अधिक स्वतंत्रता दी। जो संविधान बना, वह अधिकांशतः कांग्रेस के उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक आदर्शों का प्रतिबिंब है।

जब अगस्त 1947 में विभाजन हुआ, तो पाकिस्तान की भूमि से चुने गए मुस्लिम लीग के सदस्य स्वतः ही भारतीय संविधान सभा से बाहर हो गए। कुछ मुस्लिम प्रतिनिधि जो भारत में रहे — विशेषतः वे जो कांग्रेस से थे — उन्होंने संविधान सभा में सक्रिय भूमिका निभाई। मौलाना अबुल कलाम आजाद, टी. टी. कृष्णमाचारी और अन्य मुस्लिम सदस्यों ने यह सिद्ध किया कि धर्मनिरपेक्ष भारत में मुसलमानों का उचित स्थान है।


विभाजन के बाद संविधान सभा का पुनर्गठन

अगस्त 1947 में भारत के विभाजन के बाद संविधान सभा की संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। पाकिस्तान बनने के बाद वे प्रांत और रियासतें जो पाकिस्तान का हिस्सा बन गए, उनके प्रतिनिधि स्वतः ही भारतीय संविधान सभा से बाहर हो गए। इस प्रकार भारतीय संविधान सभा की सदस्य संख्या 389 से घटकर लगभग 299 रह गई।

संविधान सभा की संरचना: विभाजन से पूर्व और बाद

विवरणविभाजन से पूर्वविभाजन के बाद
कुल सीटें389299
ब्रिटिश प्रांत296~229
देसी रियासतें93~70
मुस्लिम लीग सदस्य73पाकिस्तान चले गए

विभाजन के बाद संविधान सभा ने दोहरी भूमिका निभाई — एक ओर यह भारत के नए संविधान का निर्माण कर रही थी, दूसरी ओर यह भारत की अंतरिम संसद के रूप में भी कार्य कर रही थी। यह एक अत्यंत व्यस्त और जिम्मेदारी से भरा दौर था। संविधान सभा को एक साथ संवैधानिक और विधायी दोनों कार्य करने थे। इस दोहरी जिम्मेदारी के बावजूद संविधान सभा ने अपना कार्य अत्यंत कुशलता और धैर्य से किया।


संविधान निर्माण की प्रक्रिया — तीन वाचन और विमर्श

संविधान का निर्माण तीन चरणों — "वाचनों" (Readings) — में हुआ। यह प्रक्रिया अत्यंत लोकतांत्रिक और विचारपूर्ण थी जिसमें प्रत्येक अनुच्छेद पर विस्तृत चर्चा और मतदान की व्यवस्था थी।

प्रथम वाचन (नवंबर 1948 — फरवरी 1949): प्रारूप संविधान को सभा के सामने रखा गया। सदस्यों ने सामान्य चर्चा की और अपने विचार व्यक्त किए। इस चरण में संविधान के मूल सिद्धांतों और समग्र संरचना पर विचार-विमर्श हुआ।

द्वितीय वाचन (अगस्त 1949 — अक्टूबर 1949): प्रत्येक अनुच्छेद पर अलग-अलग विचार और मतदान हुआ। यह सबसे लम्बा और विस्तृत चरण था। अनेक संशोधन प्रस्ताव रखे गए और उन पर वाद-विवाद हुए।

तृतीय वाचन (नवंबर 1949): अंतिम प्रारूप पर समग्र चर्चा और अनुमोदन। 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत किया गया।

संविधान सभा की बहसें अत्यंत उच्च स्तर की थीं। एच.वी. कामथ, के.टी. शाह, महावीर त्यागी, लोकनाथ मिश्र जैसे सदस्यों ने तर्कपूर्ण और प्रखर भाषण दिए। धर्मनिरपेक्षता, मौलिक अधिकारों की सीमा, संपत्ति के अधिकार, राजभाषा प्रश्न, आरक्षण — इन विषयों पर विशेष रूप से जीवंत बहसें हुईं।


संविधान सभा की विशेषताएँ और उपलब्धियाँ

संविधान सभा की अनेक विशेषताएँ थीं जो उसे विश्व के संवैधानिक इतिहास में एक अनूठा स्थान देती हैं। सबसे पहली विशेषता थी इसकी समावेशिता — यद्यपि इसके सदस्य सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से नहीं चुने गए थे, तथापि इसमें भारत के विभिन्न वर्गों, धर्मों, भाषाओं और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व था।

दूसरी विशेषता थी इसकी उच्च बौद्धिक गुणवत्ता। संविधान सभा के सदस्यों में भारत के श्रेष्ठतम विधिवेत्ता, विद्वान, समाज-सुधारक और राजनेता सम्मिलित थे। ग्रेनविले ऑस्टिन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भारतीय संविधान सभा "संविधान बनाने वाली सर्वाधिक असाधारण संस्थाओं में से एक थी।"

तीसरी विशेषता थी इसकी विमर्शात्मक प्रकृति। संविधान पर लगभग 11 सत्रों में 166 दिनों तक चर्चा हुई। कुल 7635 संशोधन प्रस्ताव रखे गए जिनमें से 2473 को स्वीकार किया गया। प्रत्येक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर व्यापक और गहन वाद-विवाद हुआ।

चौथी विशेषता थी इसका सम्पूर्ण कार्य निःशुल्क रूप से पूरा होना — संविधान सभा का कुल खर्च मात्र 64 लाख रुपए था, जो किसी भी मानक पर अत्यंत कम है। 26 नवंबर 1949 को जब संविधान को अंगीकृत किया गया, तो 284 सदस्यों ने उस पर हस्ताक्षर किए — वह क्षण था जब एक राष्ट्र ने अपने भविष्य पर अपनी मोहर लगाई।


संविधान सभा की विरासत — एक राष्ट्र का आत्मनिर्माण

26 जनवरी 1950 — वह स्वर्णिम प्रातः जब भारत का संविधान लागू हुआ और भारत "सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य" बना। इस दिन वह स्वप्न साकार हुआ जिसे महात्मा गांधी ने देखा था, जिसके लिए भगत सिंह ने फाँसी का फंदा चूमा था, जिसके लिए लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन न्यौछावर किया था।

संविधान सभा की विरासत आज भी जीवित है — भारतीय लोकतंत्र के हर स्तंभ में। वह विरासत है लोकतंत्र की — जहाँ हर पाँच वर्ष में 90 करोड़ से अधिक मतदाता अपनी सरकार चुनते हैं। वह विरासत है न्याय की — जहाँ एक दलित व्यक्ति भी अपने मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। वह विरासत है समानता की — जहाँ संविधान ने घोषणा की कि जन्म, जाति, धर्म और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा।

संविधान सभा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि एक विविधताओं से भरे, अशिक्षा और गरीबी से जूझते राष्ट्र ने जब अपने हाथों में अपना भाग्य लिया, तो उसने विश्व को एक ऐसा संविधान दिया जो आज तक मानवीय गरिमा, न्याय और स्वतंत्रता का प्रकाशस्तंभ बना हुआ है। संविधान सभा के निर्माताओं ने जो बीज बोया था, वह आज एक विशाल वृक्ष बन चुका है — भारतीय लोकतंत्र का वह महावृक्ष जिसकी छाया में 140 करोड़ भारतीय जीते, साँस लेते और अपने सपने देखते हैं।

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