संविधान सभा की कार्यप्रणाली — एक परिचय
इतिहास के महान नाटकों में एक दृश्य ऐसा होता है जो सबसे अधिक प्रभावशाली होता है — वह दृश्य जब विचार, वाद-विवाद और लोकतांत्रिक संवाद मिलकर एक राष्ट्र की आत्मा को परिभाषित करते हैं। भारत की संविधान सभा का वह दृश्य संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में हजारों घंटों तक चला — जब देश के श्रेष्ठतम मस्तिष्क एक-दूसरे से टकराए, तर्क दिए, सुने और अंततः एक ऐसे दस्तावेज को जन्म दिया जो आज भी 140 करोड़ भारतीयों के जीवन का आधार है।
संविधान सभा की कार्यप्रणाली को समझना केवल एक ऐतिहासिक अध्ययन नहीं है — यह उस लोकतांत्रिक चेतना को समझना है जो भारत के संविधान निर्माताओं ने अपने कार्य में उड़ेली थी। यह कार्यप्रणाली न केवल व्यवस्थित और वैज्ञानिक थी, बल्कि गहरे अर्थों में लोकतांत्रिक भी थी — जहाँ हर आवाज सुनी गई, हर तर्क पर विचार किया गया और हर निर्णय सामूहिक विमर्श के बाद लिया गया।
संविधान सभा ने अपना कार्य 9 दिसंबर 1946 से आरंभ किया और 26 नवंबर 1949 को संविधान के अंगीकरण के साथ समाप्त किया। इस लगभग तीन वर्ष की अवधि में सभा ने 11 सत्रों में 166 दिन काम किया। इन 166 दिनों में जो विमर्श हुआ, वह विश्व के संवैधानिक इतिहास में अपनी गुणवत्ता, गहराई और लोकतांत्रिक भावना के लिए अद्वितीय है। संविधान सभा के कार्यवृत्त — जो बारह विशाल खंडों में प्रकाशित हैं — आज भी विधिशास्त्र, राजनीति विज्ञान और इतिहास के शोधार्थियों के लिए एक अमूल्य खजाना हैं।
संविधान सभा के सत्र और बैठकों की व्यवस्था
संविधान सभा की कार्यप्रणाली को समझने के लिए सबसे पहले उसके सत्रों की संरचना को जानना आवश्यक है। संविधान सभा ने अपने तीन वर्षों के कार्यकाल में कुल ग्यारह सत्रों में काम किया। ये सत्र निरंतर नहीं चले — इनके बीच में अंतराल थे जब समितियाँ अपना काम करती थीं, प्रारूप तैयार होते थे और सदस्यों को अध्ययन का अवसर मिलता था।
| सत्र | अवधि | प्रमुख कार्य |
| प्रथम | 9-23 दिसंबर 1946 | उद्घाटन, अस्थायी अध्यक्ष का चुनाव |
| द्वितीय | 20-25 जनवरी 1947 | स्थायी अध्यक्ष का चुनाव, उद्देश्य प्रस्ताव |
| तृतीय | 28 अप्रैल - 2 मई 1947 | समिति रिपोर्टों पर चर्चा |
| चतुर्थ | 14-31 जुलाई 1947 | विभिन्न समितियों की रिपोर्टें |
| पंचम | 14-30 अगस्त 1947 | स्वतंत्रता के बाद पुनर्गठन |
| षष्ठ | 27 जनवरी 1948 | महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि |
| सप्तम | 4 नवंबर - 8 जनवरी 1949 | प्रारूप संविधान का प्रथम वाचन |
| अष्टम | 16 मई - 16 जून 1949 | द्वितीय वाचन जारी |
| नवम | 30 जुलाई - 18 सितंबर 1949 | द्वितीय वाचन समाप्त |
| दशम | 6-17 अक्टूबर 1949 | तृतीय वाचन |
| एकादश | 14-26 नवंबर 1949 | अंतिम वाचन और अंगीकरण |
प्रत्येक सत्र की बैठकें प्रातः काल में आरंभ होती थीं। बैठक के आरंभ में उपस्थिति दर्ज की जाती थी। कोरम के लिए कम से कम एक-दशांश सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक थी। बैठकों का संचालन अत्यंत व्यवस्थित था और प्रत्येक विषय पर चर्चा के लिए एक निश्चित प्रक्रिया का पालन किया जाता था।
अध्यक्ष की भूमिका — डॉ. राजेंद्र प्रसाद का शांत नेतृत्व
किसी भी विधायी निकाय की कार्यप्रणाली उसके अध्यक्ष की दक्षता और निष्पक्षता पर बड़ी हद तक निर्भर करती है। संविधान सभा इस मामले में अत्यंत सौभाग्यशाली थी कि उसे डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसा अध्यक्ष मिला — एक ऐसा व्यक्तित्व जो अपनी शांतचित्तता, धैर्य, निष्पक्षता और गहरी विद्वत्ता के लिए सभी दलों में समान रूप से सम्मानित था।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद बिहार के एक साधारण किसान परिवार से आए थे और अपनी प्रतिभा के बल पर उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में कानून की डिग्री ली थी। गांधीजी के आह्वान पर उन्होंने सफल वकालत छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में झंप दी थी। संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका बहुआयामी थी।
अध्यक्ष के रूप में डॉ. प्रसाद बैठकों का संचालन करते थे, वक्ताओं को समय देते थे, संशोधन प्रस्तावों को क्रमबद्ध करते थे और मतदान की प्रक्रिया का पर्यवेक्षण करते थे। जब बहस अत्यधिक तीखी हो जाती थी, तो वे अपने शांत हस्तक्षेप से वातावरण को सौम्य बना देते थे। जब किसी अनुच्छेद पर गहरा मतभेद होता था, तो वे सभी पक्षों को सुनकर एक मध्यमार्ग खोजने में सहायता करते थे।
उनकी एक विशेषता यह थी कि वे प्रत्येक सदस्य — चाहे वह बड़ा नेता हो या साधारण प्रतिनिधि — को समान सम्मान और अवसर देते थे। उनके इसी व्यवहार ने संविधान सभा में एक ऐसा वातावरण बनाया जहाँ हर आवाज़ सुनी जाती थी और हर विचार पर गंभीरता से विचार किया जाता था।
संविधान सभा की समितियाँ — कार्य का वैज्ञानिक विभाजन
संविधान सभा की सबसे महत्त्वपूर्ण कार्यप्रणाली यह थी कि उसने अपने विशाल कार्य को विभिन्न समितियों में बाँटा। यह विभाजन न केवल व्यावहारिक दृष्टि से आवश्यक था, बल्कि इसने संविधान निर्माण को एक सामूहिक और विशेषज्ञतापूर्ण प्रक्रिया बना दिया। संविधान सभा ने कुल मिलाकर लगभग 22 समितियाँ गठित कीं जिन्हें दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है — प्रक्रियात्मक समितियाँ और विषय-संबंधी समितियाँ।
प्रक्रियात्मक समितियाँ: ये समितियाँ संविधान सभा के आंतरिक संचालन से संबंधित थीं। संचालन समिति (Steering Committee) — जिसकी अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने की — संविधान सभा के कार्यक्रम और प्रक्रिया का निर्धारण करती थी। यह समिति तय करती थी कि किस सत्र में क्या विषय लिए जाएंगे, किस समिति की रिपोर्ट पहले आएगी और किस प्रकार की चर्चा होगी। प्रक्रिया समिति (Rules of Procedure Committee) ने संविधान सभा के संचालन के नियम बनाए। इन नियमों में वक्ताओं के समय, संशोधन प्रस्तावों की विधि, मतदान की प्रक्रिया और कोरम संबंधी व्यवस्थाएँ शामिल थीं।
विषय-संबंधी समितियाँ: ये समितियाँ संविधान के विभिन्न पहलुओं पर विचार करती थीं। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण थीं — प्रारूप समिति, संघ शक्तियाँ समिति, प्रांतीय संविधान समिति और मूल अधिकार समिति। प्रत्येक समिति अपने विषय पर विशेषज्ञों से परामर्श लेकर, अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों का अध्ययन करके और सभी हितधारकों के विचारों को ध्यान में रखकर अपनी रिपोर्ट तैयार करती थी।
प्रारूप समिति की कार्य-पद्धति — एक असाधारण यात्रा
प्रारूप समिति (Drafting Committee) संविधान सभा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग थी। डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में इस समिति ने जो कार्य किया, वह भारतीय इतिहास की सबसे असाधारण बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है। समिति को विभिन्न विषय-समितियों की रिपोर्टों को एकत्रित करके एक सुसंगत, व्यापक और व्यावहारिक संविधान का प्रारूप तैयार करना था।
प्रारूप समिति की कार्य-पद्धति इस प्रकार थी — सबसे पहले संवैधानिक सलाहकार सर बी.एन. राव ने एक प्रारंभिक मसौदा तैयार किया जो विभिन्न समितियों की रिपोर्टों और अंतर्राष्ट्रीय संविधानों पर आधारित था। इस मसौदे को प्रारूप समिति के सामने रखा गया। समिति ने इस मसौदे के प्रत्येक अनुच्छेद पर विस्तार से चर्चा की। फिर डॉ. अंबेडकर ने समिति के विचारों को समाहित करते हुए एक परिष्कृत प्रारूप तैयार किया।
फरवरी 1948 में यह प्रारूप संविधान प्रकाशित किया गया और आठ महीनों के लिए जनता और प्रांतीय सरकारों को भेजा गया ताकि वे अपने सुझाव और आपत्तियाँ दे सकें। इस अवधि में सार्वजनिक बहस हुई, समाचार-पत्रों में टिप्पणियाँ आईं और विभिन्न संगठनों ने अपने विचार व्यक्त किए। इस प्रक्रिया के माध्यम से लगभग सात हजार से अधिक सुझाव और आपत्तियाँ प्राप्त हुईं जिन पर प्रारूप समिति ने गंभीरता से विचार किया। यह जन-भागीदारी की एक अभूतपूर्व प्रक्रिया थी जिसने संविधान को सच्चे अर्थों में "जनता का दस्तावेज" बनाया।
प्रथम वाचन — सामान्य चर्चा का स्वरूप
नवंबर 1948 में जब संविधान सभा का सातवाँ सत्र आरंभ हुआ और प्रारूप संविधान का प्रथम वाचन (First Reading) शुरू हुआ, तब एक नए और उत्तेजक अध्याय का सूत्रपात हुआ। प्रथम वाचन में संविधान के समग्र स्वरूप, उसके मूल सिद्धांतों और उसकी समग्र संरचना पर सामान्य चर्चा होती थी। यह वाचन 4 नवंबर 1948 को डॉ. अंबेडकर के ऐतिहासिक उद्घाटन भाषण से आरंभ हुआ।
डॉ. अंबेडकर का यह भाषण संविधान सभा के इतिहास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाषणों में से एक है। उन्होंने संविधान के मूल दर्शन को स्पष्ट किया, उसकी विशेषताओं को रेखांकित किया और उन आलोचनाओं का उत्तर दिया जो प्रारूप संविधान के प्रकाशन के बाद उठी थीं। उन्होंने कहा कि संविधान का उद्देश्य एक ऐसा ढाँचा तैयार करना है जिसमें राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की दिशा में ले जाया जा सके।
प्रथम वाचन में प्रत्येक सदस्य को संविधान के समग्र स्वरूप पर अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिला। इस चर्चा में जो विषय सर्वाधिक उठे, वे थे — संघीय और एकात्मक संरचना का संतुलन, मौलिक अधिकारों की प्रकृति और सीमाएँ, राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों की स्थिति, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, और आरक्षण की नीति। इन सभी विषयों पर अत्यंत तर्कपूर्ण और ज्ञानवर्धक बहसें हुईं जो संविधान सभा की बौद्धिक उत्कृष्टता का प्रमाण हैं।
द्वितीय वाचन — अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद विमर्श की प्रक्रिया
यदि प्रथम वाचन संविधान का समग्र अवलोकन था, तो द्वितीय वाचन उसकी सूक्ष्मतम परीक्षा थी। द्वितीय वाचन (Second Reading) में संविधान के प्रत्येक अनुच्छेद पर अलग-अलग चर्चा और मतदान होता था। यह प्रक्रिया अत्यंत विस्तृत, धैर्यपूर्ण और समय-साध्य थी — किंतु यही वह प्रक्रिया थी जिसने संविधान को उसकी गहराई और परिपक्वता दी।
द्वितीय वाचन की प्रक्रिया इस प्रकार थी — प्रारूप समिति का कोई सदस्य (प्रायः डॉ. अंबेडकर स्वयं) किसी अनुच्छेद को सभा के सामने प्रस्तुत करता था। इसके बाद उस अनुच्छेद पर संशोधन प्रस्ताव (Amendments) रखे जाते थे। सदस्य अपने-अपने संशोधन प्रस्तावों की व्याख्या करते और उनके पक्ष में तर्क देते थे। फिर प्रारूप समिति के प्रतिनिधि प्रत्येक संशोधन का उत्तर देते थे — या तो उसे स्वीकार करते, या संशोधित रूप में स्वीकार करते, या अस्वीकार करते। अंत में मतदान होता था।
इस प्रक्रिया की विशेषता यह थी कि किसी भी अनुच्छेद पर चाहे जितने संशोधन प्रस्ताव हों, प्रत्येक पर अलग-अलग विचार होता था। कभी-कभी एक ही अनुच्छेद पर पचास से अधिक संशोधन प्रस्ताव आ जाते थे। इन सबको क्रमबद्ध करना, उन पर चर्चा कराना और मतदान करवाना अध्यक्ष और सचिवालय के लिए एक विशाल प्रशासनिक चुनौती थी। किंतु इस प्रक्रिया ने यह सुनिश्चित किया कि संविधान का कोई भी हिस्सा बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के पारित न हो।
संशोधन प्रस्तावों की प्रक्रिया — लोकतंत्र का जीवंत स्वरूप
संविधान सभा में संशोधन प्रस्तावों की प्रक्रिया लोकतंत्र के जीवंत स्वरूप का सबसे सुंदर उदाहरण थी। कोई भी सदस्य किसी भी अनुच्छेद पर संशोधन प्रस्ताव रख सकता था। इस प्रकार संविधान सभा में कुल 7635 संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए — यह संख्या अपने आप में इस प्रक्रिया की व्यापकता का प्रमाण है।
संशोधन प्रस्ताव मुख्यतः तीन प्रकार के होते थे। पहला — मूल अनुच्छेद में शब्द परिवर्तन या भाषा-सुधार के प्रस्ताव। दूसरा — मूल अनुच्छेद के स्थान पर एक वैकल्पिक अनुच्छेद प्रस्तुत करना। तीसरा — किसी अनुच्छेद को पूरी तरह हटाने का प्रस्ताव। इन तीनों प्रकार के संशोधनों पर अलग-अलग प्रक्रिया अपनाई जाती थी।
संशोधन प्रस्ताव रखने की प्रक्रिया यह थी कि सदस्य को अपना प्रस्ताव लिखित रूप में सचिवालय को पहले से देना होता था। सचिवालय सभी प्राप्त संशोधनों को वर्गीकृत करता था और उन्हें अध्यक्ष के सामने प्रस्तुत करता था। अध्यक्ष तय करते थे कि किस संशोधन को चर्चा के लिए लिया जाएगा। जो संशोधन एक-दूसरे से मिलते-जुलते होते थे, उन्हें एक साथ लिया जाता था। इस व्यवस्था ने बहुत समय बचाया और प्रक्रिया को व्यवस्थित रखा।
प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. अंबेडकर प्रत्येक संशोधन प्रस्ताव का उत्तर बड़ी सूक्ष्मता और विद्वत्ता से देते थे। उनकी स्मृति और विधिक ज्ञान इतना तीव्र था कि वे बिना किसी नोट के किसी भी संशोधन के पक्ष और विपक्ष में तर्क दे सकते थे। उनका यह कौशल संविधान सभा के सभी सदस्यों में गहरी प्रशंसा का विषय था।
मतदान प्रक्रिया — निर्णय की पारदर्शी व्यवस्था
संविधान सभा में मतदान की प्रक्रिया अत्यंत पारदर्शी और व्यवस्थित थी। जब किसी अनुच्छेद या संशोधन पर पर्याप्त चर्चा हो जाती थी, तब अध्यक्ष मतदान की घोषणा करते थे। मतदान की विधि साधारणतः "ध्वनि मत" (Voice Vote) द्वारा होती थी — जब अध्यक्ष "पक्ष में" और "विपक्ष में" के लिए आवाज़ लेते थे।
यदि किसी पक्ष को ध्वनि मत से परिणाम स्पष्ट नहीं लगता था, तो वह "विभाजन" (Division) की माँग कर सकता था। विभाजन में सदस्य अपनी-अपनी सीटों पर खड़े होकर अपना मत देते थे और सचिवालय उनकी गणना करता था। इस प्रकार प्रत्येक सदस्य का मत पूरी तरह स्पष्ट और दर्ज होता था।
संविधान सभा में अधिकांश निर्णय सर्वसम्मति से या भारी बहुमत से हुए — यह इस बात का प्रमाण है कि संविधान के मूल सिद्धांतों पर व्यापक सहमति थी। जहाँ मतभेद थे, वहाँ भी बहस के बाद प्रायः एक मध्यमार्ग निकाल लिया जाता था। केवल कुछ अत्यंत विवादास्पद विषयों — जैसे संपत्ति का अधिकार, राजभाषा प्रश्न और आरक्षण की सीमाएँ — पर विभाजित मतदान की नौबत आई।
एक महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि संविधान सभा में दलीय अनुशासन का कठोर पालन नहीं होता था। सदस्य अपने विवेक के अनुसार मत देने के लिए स्वतंत्र थे। यह स्वतंत्रता संविधान सभा को एक वास्तविक विमर्शात्मक निकाय बनाती थी — जहाँ तर्क और विवेक का महत्त्व दलीय आज्ञाकारिता से अधिक था।
वाद-विवाद की गुणवत्ता — महान भाषणों की एक श्रृंखला
संविधान सभा में जो वाद-विवाद हुए, वे विश्व के संसदीय इतिहास में अपनी गुणवत्ता, गहराई और विद्वत्ता के लिए अनूठे हैं। इन बहसों में भारत के भविष्य की आत्मा थी — हर भाषण में एक सपना था, हर तर्क में एक विश्वास था और हर असहमति में एक गहरी देशभक्ति थी।
डॉ. अंबेडकर के भाषण संविधान सभा की सबसे बड़ी बौद्धिक संपदा हैं। उनका 4 नवंबर 1948 का उद्घाटन भाषण और 25 नवंबर 1949 का समापन भाषण — ये दोनों भारतीय राजनीतिक चिंतन के सर्वोच्च प्रतिमान हैं। समापन भाषण में उन्होंने कहा — "हमें केवल राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को एक सामाजिक लोकतंत्र बनाना होगा।"
जवाहरलाल नेहरू के भाषण उनकी काव्यात्मक दृष्टि और वैश्विक परिप्रेक्ष्य को दर्शाते थे। के.एम. मुंशी के भाषण विधिक और ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध होते थे। अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर की विधिक तर्कशक्ति असाधारण थी। टी.टी. कृष्णमाचारी की तीखी और व्यंग्यात्मक शैली बहसों को जीवंत बनाती थी। एच.वी. कामथ के भाषण गांधीवादी दर्शन से ओतप्रोत होते थे। के.टी. शाह आर्थिक प्रश्नों पर समाजवादी दृष्टि से विचार करते थे।
महिला सदस्यों के भाषण भी अत्यंत प्रभावशाली थे। हंसा मेहता ने महिला अधिकारों के लिए जो तर्क दिए, वे आज भी प्रासंगिक हैं। दुर्गाबाई देशमुख ने समाज के सबसे कमजोर वर्गों के अधिकारों की पक्षधरता की।
संवैधानिक सलाहकार की भूमिका — सर बी.एन. राव का योगदान
संविधान सभा की कार्यप्रणाली में एक महत्त्वपूर्ण किंतु प्रायः अनदेखा पहलू है — संवैधानिक सलाहकार की भूमिका। सर बेनेगल नरसिंह राव — जिन्हें बी.एन. राव के नाम से जाना जाता है — इस पद पर नियुक्त थे और उनका योगदान संविधान निर्माण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, यद्यपि वे संविधान सभा के सदस्य नहीं थे।
बी.एन. राव एक अत्यंत प्रतिभाशाली ICS अधिकारी थे जो विधिशास्त्र के गहरे ज्ञाता थे। उन्होंने संविधान का प्रारंभिक मसौदा तैयार किया जो विभिन्न विषय-समितियों की रिपोर्टों और अंतर्राष्ट्रीय संविधानों का एक संश्लेषण था। इस मसौदे को तैयार करने के लिए उन्होंने अमेरिका, आयरलैंड, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की यात्राएँ कीं और वहाँ के संवैधानिक विशेषज्ञों से परामर्श लिया।
बी.एन. राव ने अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर से मुलाकात की और भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के प्रावधानों पर उनकी राय ली। फ्रैंकफर्टर ने सुझाव दिया कि मौलिक अधिकारों को बहुत विस्तृत रूप में न लिखा जाए क्योंकि इससे न्यायिक व्याख्या में कठिनाई होती है। यह सुझाव आंशिक रूप से माना गया।
बी.एन. राव के मसौदे पर प्रारूप समिति ने विचार किया और उसे व्यापक रूप से संशोधित किया। किंतु इस मसौदे ने एक ठोस आधार प्रदान किया जिस पर प्रारूप समिति ने अपना काम खड़ा किया।
भाषा-नीति का प्रश्न — संविधान सभा की सबसे जटिल बहस
संविधान सभा में जो बहसें हुईं, उनमें सर्वाधिक भावनात्मक और विवादास्पद बहस राजभाषा के प्रश्न पर हुई। यह प्रश्न केवल एक भाषाई मसला नहीं था — यह भारत की सांस्कृतिक पहचान, क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील विषय था।
एक ओर हिंदी के समर्थक थे जो चाहते थे कि हिंदी को तत्काल भारत की एकमात्र राजभाषा घोषित किया जाए। पुरुषोत्तमदास टंडन, सेठ गोविंद दास और अन्य हिंदी-समर्थक सदस्यों ने जोरदार ढंग से यह माँग रखी। उनका तर्क था कि हिंदी भारत की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना ही चाहिए।
दूसरी ओर गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के प्रतिनिधि — विशेषतः दक्षिण भारत के — थे जो हिंदी की एकाधिकारिता का विरोध कर रहे थे। टी.टी. कृष्णमाचारी ने कहा कि यदि हिंदी को तत्काल एकमात्र राजभाषा बनाया गया तो दक्षिण भारत के लोग स्वयं को एक भिन्न भारत का हिस्सा समझेंगे।
अंततः एक समझौता हुआ — हिंदी राजभाषा होगी, किंतु अगले पंद्रह वर्षों तक अंग्रेजी भी सह-राजभाषा के रूप में चलती रहेगी। इस समझौते को "मुंशी-आयंगार फॉर्मूला" कहा जाता है। यह समझौता भारतीय संविधान सभा की उस परिपक्वता का प्रमाण है जो किसी एक पक्ष को पूरी तरह जीता या हराया नहीं, बल्कि एक ऐसा मध्यमार्ग खोजा जो राष्ट्र की एकता के लिए अनुकूल था।
तृतीय वाचन — अंतिम समीक्षा और परिष्करण
अक्टूबर-नवंबर 1949 में संविधान सभा का दसवाँ और ग्यारहवाँ सत्र आया — तृतीय वाचन (Third Reading) का समय। यह वह चरण था जब संविधान के सम्पूर्ण प्रारूप को एक बार फिर समग्र रूप में देखा गया, भाषाई और तकनीकी त्रुटियों को सुधारा गया और अंतिम संशोधनों को सम्मिलित किया गया।
तृतीय वाचन में चर्चा का स्वरूप प्रथम और द्वितीय वाचन से भिन्न था। इस चरण में व्यक्तिगत अनुच्छेदों पर पुनः विस्तृत चर्चा नहीं होती थी — केवल वे संशोधन लिए जाते थे जो द्वितीय वाचन में छूट गए थे या जो नई परिस्थितियों के कारण आवश्यक हो गए थे। इस चरण में मुख्य कार्य था — संविधान की भाषा का परिष्करण, अनुच्छेदों की क्रम-व्यवस्था और समग्र सुसंगति सुनिश्चित करना।
हिंदी संविधान समिति ने भी इस चरण में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। संविधान मूलतः अंग्रेजी में तैयार किया गया था — किंतु हिंदी अनुवाद भी समानांतर रूप से तैयार होता रहा। हिंदी में संवैधानिक शब्दावली का विकास करना एक जटिल कार्य था — अनेक कानूनी और प्रशासनिक शब्दों के लिए हिंदी समकक्ष खोजने पड़े। यह कार्य भाषाविदों और विधिशास्त्रियों के सहयोग से सम्पन्न हुआ।
संविधान का अंगीकरण — 26 नवंबर 1949 का ऐतिहासिक दिन
25 नवंबर 1949 को डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में अपना अंतिम और सबसे महत्त्वपूर्ण भाषण दिया। यह भाषण संविधान निर्माण की तीन वर्षों की यात्रा का एक जीवंत सारांश था। उन्होंने संविधान की उपलब्धियों की चर्चा की, उसकी सीमाओं को स्वीकार किया और भावी पीढ़ियों को चेतावनी दी।
उस भाषण में अंबेडकर ने कहा — "भारत में लोकतंत्र केवल ऊपरी आवरण है, इसकी नींव में लोकतंत्र नहीं है। सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ जब तक बनी रहेंगी, राजनीतिक लोकतंत्र खतरे में रहेगा।" उन्होंने तीन चेतावनियाँ दीं — महान नेताओं की भक्ति में बह जाना, संवैधानिक मार्ग छोड़कर क्रांतिकारी मार्ग अपनाना, और राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र में न बदलना।
26 नवंबर 1949 को संविधान सभा की अंतिम बैठक हुई। अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी एक भावपूर्ण भाषण दिया। तत्पश्चात् संविधान को अंगीकृत करने का प्रस्ताव रखा गया और यह सर्वसम्मति से पारित हुआ। फिर 284 सदस्यों ने — जो उस दिन उपस्थित थे — एक-एक करके आगे आकर संविधान पर अपने हस्ताक्षर किए। यह एक अत्यंत भावपूर्ण और ऐतिहासिक दृश्य था — जब एक-एक करके भारत के प्रतिनिधियों ने उस दस्तावेज पर अपनी मोहर लगाई जो आने वाली पीढ़ियों के जीवन को आकार देने वाला था।
संविधान सभा की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन — एक अमर विरासत
संविधान सभा की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करते समय हमें कई दृष्टिकोणों से विचार करना होगा। इसकी उपलब्धियाँ असाधारण थीं, किंतु इसकी सीमाएँ और आलोचनाएँ भी थीं जिन्हें ईमानदारी से स्वीकार करना आवश्यक है।
उपलब्धियाँ: संविधान सभा ने तीन वर्षों में विश्व का सबसे लम्बा और व्यापक लिखित संविधान तैयार किया। इस प्रक्रिया में जो लोकतांत्रिक विमर्श हुआ, वह अनूठा था। प्रत्येक अनुच्छेद पर गहन चर्चा हुई और विभिन्न दृष्टिकोणों को समाहित करने का प्रयास किया गया। संविधान सभा ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और संघीय ढाँचे जैसे मूलभूत सिद्धांतों पर एक राष्ट्रीय सहमति बनाई।
आलोचनाएँ: ग्रेनविले ऑस्टिन जैसे इतिहासकारों ने यह आलोचना की है कि संविधान सभा पर कांग्रेस का वर्चस्व था और यह पूरी तरह प्रतिनिधिक नहीं थी। सर्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर इसके सदस्य नहीं चुने गए थे। मुस्लिम लीग के बहिष्कार ने इसकी सर्वसमावेशी प्रकृति को सीमित किया।
किंतु इन सीमाओं के बावजूद, संविधान सभा की कार्यप्रणाली एक अनुकरणीय आदर्श बनी हुई है। इस सभा ने यह सिद्ध किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया — चाहे वह कितनी भी धीमी और जटिल क्यों न हो — अंततः सबसे श्रेष्ठ परिणाम देती है। आज जब भारत का संविधान सात दशकों से अधिक समय से 140 करोड़ भारतीयों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा कर रहा है, तब संविधान सभा की कार्यप्रणाली की विरासत अपनी सार्थकता स्वयं सिद्ध करती है।