सिन्धु घाटी सभ्यता — खोज की अविश्वसनीय कहानी
इतिहास के पन्नों पर कुछ खोजें ऐसी होती हैं जो न केवल अतीत को बदल देती हैं, बल्कि वर्तमान को भी एक नई दृष्टि से देखने पर विवश कर देती हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज ऐसी ही एक असाधारण घटना थी। 1920 के दशक में जब पुरातत्वविदों ने पंजाब की मिट्टी में दबे कुछ प्राचीन अवशेषों की खुदाई की, तब उन्हें कल्पना भी नहीं थी कि वे एक ऐसी सभ्यता को उजागर करने जा रहे हैं जो मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के समकालीन थी और जो उनसे कहीं अधिक विकसित और व्यवस्थित थी।
1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा (अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में) में उत्खनन आरंभ किया। उसी वर्ष राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो (सिंध प्रांत) में खुदाई शुरू की। इन दोनों स्थलों पर जो मिला, उसने विश्व के इतिहासकारों को चकित कर दिया। सुनियोजित सड़कें, पक्की ईंटों के भवन, उन्नत जल-निकासी व्यवस्था, मानकीकृत बाट-माप और एक लिखित लिपि — ये सब एक ऐसी सभ्यता के प्रमाण थे जो 4500 वर्ष पूर्व अपने चरमोत्कर्ष पर थी।
जॉन मार्शल — जो उस समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक थे — ने 1924 में विश्व को इस महान खोज की घोषणा की। उन्होंने कहा — "हम यहाँ एक ऐसी सभ्यता के अवशेष देख रहे हैं जो किसी भी ज्ञात प्राचीन सभ्यता से कम नहीं।" यह घोषणा भारतीय इतिहास की दिशा बदलने वाली थी — क्योंकि अब यह सिद्ध हो गया था कि भारतीय सभ्यता की जड़ें कहीं अधिक गहरी और प्राचीन हैं।
भौगोलिक विस्तार — एक विशाल सभ्यता का साम्राज्य
सिन्धु घाटी सभ्यता — जिसे "हड़प्पा सभ्यता" भी कहा जाता है — अपने विस्तार की दृष्टि से विश्व की तीन प्राचीन सभ्यताओं — मेसोपोटामिया, मिस्र और सिंधु — में सर्वाधिक विशाल थी। इस सभ्यता का भौगोलिक विस्तार लगभग 12.5 लाख वर्ग किलोमीटर था — जो आधुनिक पाकिस्तान से भी बड़ा क्षेत्र है।
इस सभ्यता का विस्तार उत्तर में जम्मू (मांडा स्थल) से लेकर दक्षिण में गुजरात (भगतराव, सुरकोटडा) तक, और पश्चिम में बलूचिस्तान (सुत्कागेंडोर) से लेकर पूर्व में उत्तर प्रदेश (आलमगीरपुर) तक था। यह विशालता अपने आप में एक चमत्कार है।
| क्षेत्र | प्रमुख स्थल | देश (वर्तमान) |
| पंजाब | हड़प्पा, रोपड़ | पाकिस्तान, भारत |
| सिंध | मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो | पाकिस्तान |
| गुजरात | लोथल, धौलावीरा, सुरकोटडा | भारत |
| राजस्थान | कालीबंगन | भारत |
| हरियाणा | बनावली, राखीगढ़ी | भारत |
| जम्मू | मांडा | भारत |
| बलूचिस्तान | सुत्कागेंडोर | पाकिस्तान |
अब तक इस सभ्यता के 1400 से अधिक स्थलों की खोज हो चुकी है। इनमें से अधिकांश स्थल भारत में हैं — विशेषकर गुजरात और हरियाणा में। हाल के वर्षों में राखीगढ़ी (हरियाणा) को इस सभ्यता का सबसे बड़ा ज्ञात नगर माना जाने लगा है जो मोहनजोदड़ो से भी बड़ा है।
इस सभ्यता का काल लगभग 3300 ईसापूर्व से 1300 ईसापूर्व तक माना जाता है। इसे तीन चरणों में विभाजित किया जाता है — प्रारंभिक हड़प्पा काल (3300-2600 ईसापूर्व), परिपक्व हड़प्पा काल (2600-1900 ईसापूर्व) और उत्तर हड़प्पा काल (1900-1300 ईसापूर्व)। परिपक्व हड़प्पा काल इस सभ्यता का स्वर्ण युग था।
नगर-नियोजन — विश्व की प्रथम नगर-क्रांति
यदि सिन्धु घाटी सभ्यता की एक विशेषता को सर्वाधिक असाधारण और विश्व-विजयी कहा जाए, तो वह है इसका नगर-नियोजन (Town Planning)। आज से 4500 वर्ष पूर्व जब संसार की अधिकांश जनता कच्ची झोंपड़ियों में रहती थी और कीचड़ भरी गलियों में चलती थी, तब सिन्धु घाटी के नगरों में पक्की ईंटों की सुनियोजित सड़कें थीं, व्यवस्थित मकान थे और एक ऐसी जल-निकासी व्यवस्था थी जो यूरोप में 20वीं शताब्दी से पहले नहीं देखी गई।
सिन्धु सभ्यता के नगर-नियोजन की सबसे पहली और महत्त्वपूर्ण विशेषता थी — ग्रिड प्रणाली (Grid System)। सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं जिससे शहर एक शतरंज की बिसात जैसा दिखता था। मुख्य सड़कें उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशाओं में जाती थीं। मुख्य सड़क की चौड़ाई लगभग 9-10 मीटर होती थी और गलियाँ अपेक्षाकृत संकरी होती थीं।
प्रत्येक नगर में दो प्रमुख भाग थे — "दुर्ग" (Citadel) और "निचला शहर" (Lower Town)। दुर्ग एक ऊँचे चबूतरे पर बना होता था और यहाँ सार्वजनिक भवन, अनाज भंडार और शायद शासन-केंद्र होते थे। निचले शहर में सामान्य नागरिकों के घर होते थे।
मकान पक्की पकाई हुई ईंटों से बने होते थे। ईंटों का मापन मानकीकृत था — सामान्यतः 1:2:4 के अनुपात में (मोटाई : चौड़ाई : लंबाई)। यह मानकीकरण यह सिद्ध करता है कि इस सभ्यता में एक केंद्रीय प्रशासनिक शक्ति थी जो पूरी सभ्यता में एक समान मापदंड लागू करती थी।
हड़प्पा — उत्तर की महान नगरी
हड़प्पा सिन्धु घाटी सभ्यता का वह प्रथम स्थल है जिसकी खुदाई ने इस महान सभ्यता का द्वार खोला। आज के पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के तट पर स्थित यह नगर अपने चरमोत्कर्ष पर एक विशाल और समृद्ध केंद्र था। इसकी जनसंख्या 23,000 से 35,000 के बीच रही होगी — जो उस काल में एक अत्यंत बड़ी नगरी थी।
हड़प्पा की खुदाई में जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण खोज हुई, वह थी — अनाज भंडार (Granaries)। दुर्ग क्षेत्र में छह विशाल अनाज भंडार मिले हैं जो दो पंक्तियों में व्यवस्थित हैं। इन भंडारों में हवा के लिए विशेष छिद्र बने थे ताकि अनाज खराब न हो। इन भंडारों के पास श्रमिकों के आवास के अवशेष भी मिले हैं।
हड़प्पा में एक "दो कमरों वाला बैरक" भी मिला है जिसमें 17 भट्टियाँ हैं। माना जाता है कि यहाँ अनाज पीसने या धातु-कार्य का काम होता था। यह "श्रमिक बस्ती" इस बात का संकेत है कि हड़प्पा में एक संगठित श्रम-व्यवस्था थी।
हड़प्पा के कब्रिस्तान से अनेक कंकाल मिले हैं जिनमें से कुछ को अत्यंत विधिपूर्वक दफनाया गया था — मृत व्यक्ति के सिर को उत्तर दिशा में और पाँव को दक्षिण दिशा में रखा जाता था। साथ में मिट्टी के बर्तन, आभूषण और अन्य वस्तुएँ भी रखी जाती थीं। कुछ कब्रों में शव के साथ जानवरों की हड्डियाँ भी मिली हैं।
मोहनजोदड़ो — सिन्धु सभ्यता का सर्वोच्च रत्न
मोहनजोदड़ो — जिसका सिंधी भाषा में अर्थ है "मृतकों का टीला" — सिन्धु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा, सबसे प्रभावशाली और सबसे अधिक उत्खनित नगर है। यह आज के पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिन्धु नदी के किनारे स्थित है। इस नगर का कुल क्षेत्रफल लगभग 250 हेक्टेयर था और इसकी जनसंख्या 40,000 से 50,000 के बीच रही होगी।
मोहनजोदड़ो की सबसे प्रसिद्ध संरचना है — "महास्नानागार" (Great Bath)। यह 12 मीटर लंबा, 7 मीटर चौड़ा और 2.4 मीटर गहरा एक विशाल स्नानकुंड है जो उत्तम गुणवत्ता की पक्की ईंटों से बना है। इसकी दीवारों में जलरोधी सामग्री (bitumen) का प्रयोग किया गया था। कुंड के दोनों छोरों पर सीढ़ियाँ हैं। चारों ओर कमरे हैं जो शायद परिधान बदलने या विश्राम के लिए उपयोग किए जाते थे।
महास्नानागार के निकट एक विशाल अनाज भंडार है जो लगभग 50 मीटर लंबा और 27 मीटर चौड़ा है। इसके नीचे हवा आने के लिए चैनल बने हैं। यह भंडार इतना विशाल था कि इसमें पूरे नगर की जनसंख्या के लिए कई महीनों का अनाज रखा जा सकता था।
मोहनजोदड़ो में "सभा-भवन" (Assembly Hall) के अवशेष भी मिले हैं जिसमें 20 स्तंभों के आधार मिले हैं। यह शायद नगर के प्रशासनिक या धार्मिक सभाओं का केंद्र था। इसके अतिरिक्त एक विशाल भवन मिला है जिसे "पुरोहित आवास" (Priest's House) कहा जाता है।
जल-निकासी और स्वच्छता — आधुनिकता से पाँच हजार वर्ष आगे
सिन्धु घाटी सभ्यता की जो विशेषता आधुनिक इंजीनियरों और पुरातत्वविदों को सर्वाधिक चकित करती है, वह है इसकी जल-निकासी और स्वच्छता व्यवस्था। यह व्यवस्था इतनी उन्नत थी कि विश्व के किसी अन्य प्राचीन सभ्यता में इसका समकक्ष नहीं मिलता।
प्रत्येक घर में एक स्नानघर होता था। स्नानघर की फर्श ढलुआँ होती थी ताकि पानी आसानी से बाहर निकल सके। फर्श पर पक्की ईंटें बिछी होती थीं जो जल-रोधी होती थीं। स्नानघर का गंदा पानी एक छोटी नाली के माध्यम से घर की बाहरी दीवार से होकर गली की मुख्य नाली में जाता था।
गली की नालियाँ पक्की ईंटों से बनी और ढकी हुई होती थीं। इन नालियों में निरीक्षण के लिए ढक्कन वाले मेनहोल भी होते थे। छोटी गलियों की नालियाँ बड़ी सड़कों की नालियों में मिलती थीं और अंततः शहर के बाहर एक बड़े सीवेज टैंक में जाती थीं।
यह जल-निकासी व्यवस्था इसलिए और भी उल्लेखनीय है क्योंकि यह न केवल तकनीकी रूप से उन्नत थी, बल्कि यह एक केंद्रीय प्रशासन के अस्तित्व का प्रमाण भी है। इस व्यवस्था को बनाने और बनाए रखने के लिए एक ऐसी शक्ति की आवश्यकता थी जो पूरे नगर की योजना बना सके और उसके नियमित रखरखाव की व्यवस्था कर सके।
घरों में शौचालय के भी प्रमाण मिले हैं। शौचालय का गंदा पदार्थ एक ढकी हुई नाली के माध्यम से मुख्य सीवेज में जाता था। यह सुविधा 19वीं शताब्दी तक यूरोप के अधिकांश नगरों में नहीं थी।
आर्थिक जीवन — व्यापार, कृषि और शिल्प की त्रिवेणी
सिन्धु घाटी सभ्यता एक समृद्ध और विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था पर आधारित थी। इसके तीन प्रमुख स्तंभ थे — कृषि, शिल्प-उत्पादन और व्यापार। इन तीनों के अद्भुत समन्वय ने एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जो अपने काल में विश्व की सबसे उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी।
कृषि इस सभ्यता की आर्थिक नींव थी। गेहूँ, जौ, चावल (लोथल से प्रमाण), मटर, तिल, कपास और खजूर की खेती के प्रमाण मिले हैं। कपास की खेती सबसे महत्त्वपूर्ण है — सिन्धु सभ्यता के लोग विश्व में पहले थे जिन्होंने कपास की खेती और उससे कपड़ा बनाना सीखा। यूनानियों ने कपास को "सिंडन" कहा जो "सिंध" शब्द से आया है।
पशुपालन भी अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग था। गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर और कुत्ते पालतू थे। हाथी और ऊँट के भी प्रमाण मिले हैं। घोड़े के अस्तित्व के बारे में विवाद है — कुछ पुरातत्वविद् सुरकोटडा से मिले अश्व-अवशेषों को हड़प्पाकालीन मानते हैं।
व्यापार इस सभ्यता की सबसे चमकदार आर्थिक विशेषता थी। यहाँ के व्यापारी मेसोपोटामिया (आज का इराक), ओमान, बहरीन और मध्य एशिया तक व्यापार करते थे। मेसोपोटामिया के उर नगर में हड़प्पाई मुहरें और वस्तुएँ मिली हैं। मेसोपोटामिया के ग्रंथों में "मेलुहा" का उल्लेख है जो संभवतः सिन्धु प्रदेश को ही संदर्भित करता है।
बाट-माप की एक मानकीकृत व्यवस्था थी जो पूरी सभ्यता में एक समान थी। पत्थर और मिट्टी के बाट मिले हैं जो सामान्यतः 16 के गुणज में होते थे — 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64... यह द्विभाजित प्रणाली (binary system) की एक प्रारंभिक झलक है।
सामाजिक जीवन — एक परिपक्व और विकसित समाज
सिन्धु घाटी सभ्यता के सामाजिक जीवन के बारे में हमारी जानकारी पुरातात्विक साक्ष्यों तक सीमित है — कोई लिखित साहित्य या अभिलेख नहीं है। फिर भी जो वस्तुएँ और अवशेष मिले हैं, उनसे एक समृद्ध और सुव्यवस्थित सामाजिक जीवन की झलक मिलती है।
सामाजिक संरचना के बारे में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है — क्या इस समाज में वर्ग-भेद था? घरों के आकार और गुणवत्ता में भिन्नता मिलती है — कुछ घर बड़े और भव्य हैं जबकि कुछ छोटे और साधारण। यह आर्थिक असमानता का संकेत हो सकता है। किंतु अत्यधिक विलासिता की वस्तुएँ नहीं मिली हैं — कोई शाही महल नहीं, कोई विशाल राजकीय समाधि नहीं। यह इस बात का संकेत हो सकता है कि यह एक अपेक्षाकृत समतावादी समाज था।
स्त्री की स्थिति के बारे में मातृदेवी की मूर्तियों की बहुलता और कुछ कब्रों में स्त्रियों के साथ बहुमूल्य आभूषणों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि स्त्रियों को समाज में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।
आभूषणों के प्रचलन के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं। सोने, चाँदी, तांबे, हाथीदाँत, शंख और विभिन्न पत्थरों से बने हार, बाली, कंगन, अंगूठी और कमरबंद मिले हैं। सोने के मनके और कार्नेलियन के मनके विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
वस्त्र के बारे में कपास और ऊन के उपयोग के प्रमाण मिले हैं। मोहनजोदड़ो से मिली "पुरोहित-राजा" की मूर्ति के शरीर पर जो शाल दिखाई देती है, उस पर तिपतिया फूल (trefoil) का अलंकरण है।
धर्म और आस्था — रहस्य और अनुमान
सिन्धु घाटी सभ्यता के धार्मिक जीवन के बारे में हमारी जानकारी सबसे अधिक अनुमान और व्याख्या पर निर्भर है। कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं, कोई पठनीय अभिलेख नहीं — केवल मुहरें, मूर्तियाँ और पुरातात्विक संरचनाएँ जिनकी व्याख्या करनी है।
मातृदेवी की पूजा इस सभ्यता का सबसे प्रमुख धार्मिक तत्त्व प्रतीत होता है। मिट्टी की अनेक स्त्री-मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें अधिकांश गर्भवती या शिशु को स्तनपान कराती हुई दिखाई देती हैं। ये मूर्तियाँ प्रजनन-शक्ति और पृथ्वी-माता की देवी का प्रतिनिधित्व करती हैं।
पशुपति महादेव — मोहनजोदड़ो से मिली एक मुहर पर एक योगी मुद्रा में बैठी आकृति है जिसके चारों ओर जानवर हैं — हाथी, बाघ, गैंडा और भैंसा। इस आकृति के सिर पर सींग जैसी आकृति है। मार्शल ने इसे "आदि-शिव" या "पशुपति" कहा। यदि यह सही है, तो यह शिव-पूजा की प्राचीनतम ज्ञात छवि है।
लिंग-योनि पूजा के प्रमाण भी मिले हैं। पत्थर और मिट्टी के अनेक शंकु-आकार की वस्तुएँ मिली हैं जिन्हें शिव-लिंग का प्रारंभिक रूप माना जाता है।
पीपल वृक्ष की पूजा के प्रमाण मुहरों पर मिलते हैं जिनमें पीपल की पत्तियों के बीच देवता दिखाई देते हैं। आज भी भारत में पीपल को पवित्र वृक्ष माना जाता है — यह परंपरा सिन्धु सभ्यता से आई हो सकती है।
कला और शिल्प — सौंदर्य की एक अनूठी परंपरा
सिन्धु घाटी सभ्यता की कला और शिल्प उसकी सांस्कृतिक परिपक्वता का जीवंत प्रमाण है। इस सभ्यता के कलाकारों और शिल्पियों ने जो वस्तुएँ बनाईं, वे आज भी अपनी सुंदरता और तकनीकी कुशलता से विश्व को आकर्षित करती हैं।
मूर्तिकला में सिन्धु सभ्यता की कुछ कृतियाँ अतुलनीय हैं। "नृत्यरत बालिका" (Dancing Girl) — मोहनजोदड़ो से मिली यह कांसे की मूर्ति शायद संसार की सबसे प्रसिद्ध प्रागैतिहासिक कलाकृति है। मात्र 10.5 सेमी ऊँची यह मूर्ति एक किशोरी की है जो एक हाथ को कटि पर और दूसरे हाथ को घुटने पर रखकर लापरवाह मुद्रा में खड़ी है। उसकी दाईं बाँह पर ढेर सारे कंगन हैं। इस मूर्ति में जो जीवंतता और स्वाभाविकता है, वह आधुनिक मूर्तिकारों को भी चकित करती है।
"पुरोहित-राजा" (Priest King) — मोहनजोदड़ो से मिली इस पत्थर की प्रतिमा में एक दाढ़ी वाले पुरुष को आँखें आधी मुंदे ध्यान-मुद्रा में दिखाया गया है। उसके शरीर पर तिपतिया फूल के अलंकरण वाली शाल है।
मुहरें (Seals) सिन्धु सभ्यता की सबसे विशिष्ट कलाकृतियाँ हैं। लगभग 2000 से अधिक मुहरें मिली हैं जो सामान्यतः सेलखड़ी (steatite) से बनी हैं। इन पर विभिन्न जानवरों — एकश्रृंगी (unicorn), बैल, हाथी, बाघ, मगरमच्छ — के चित्र हैं और साथ में लिखित संकेत भी। ये मुहरें व्यापारिक उद्देश्यों के लिए उपयोग होती थीं।
मिट्टी के बर्तन (Pottery) भी अत्यंत कलात्मक थे। लाल मिट्टी पर काले रंग से ज्यामितीय और प्राकृतिक आकृतियाँ बनाई जाती थीं।
सिन्धु लिपि — इतिहास की सबसे बड़ी अनसुलझी पहेली
सिन्धु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी रहस्यमयी विशेषता है इसकी लिपि — जो आज तक पढ़ी नहीं जा सकी। यह लिपि इतिहास की सबसे लंबे समय से अनसुलझी भाषाई पहेलियों में से एक है। एक शताब्दी से अधिक समय से दुनिया भर के भाषाविद् और इतिहासकार इसे समझने का प्रयास कर रहे हैं, किंतु अभी तक कोई सफलता नहीं मिली।
इस लिपि के बारे में जो तथ्य ज्ञात हैं वे इस प्रकार हैं — लगभग 4000 से अधिक शिलालेख मिले हैं मुख्यतः मुहरों पर। लगभग 400-600 विभिन्न चिह्न हैं। प्रत्येक शिलालेख सामान्यतः बहुत छोटा है — औसतन 5 चिह्न। लेखन दाएँ से बाएँ की ओर होता था (जैसे अरबी या हिब्रू)।
इस लिपि को पढ़ने में सबसे बड़ी बाधा है एक द्विभाषी अभिलेख का अभाव। रोसेटा स्टोन ने मिस्री हायरोग्लिफिक्स को पढ़ने में सहायता की थी क्योंकि वहाँ एक ही पाठ तीन भाषाओं में था। सिन्धु लिपि के साथ ऐसा कोई सहायक अभिलेख नहीं है।
विभिन्न विद्वानों ने इस लिपि को पढ़ने के अनेक प्रयास किए हैं। कुछ ने इसे द्राविड़ भाषा परिवार से जोड़ा है, कुछ ने संस्कृत से और कुछ ने अन्य भाषाओं से। किंतु कोई भी व्याख्या सार्वभौमिक स्वीकृति नहीं पा सकी।
लोथल, कालीबंगन और धौलावीरा — सभ्यता के अन्य रत्न
सिन्धु घाटी सभ्यता केवल हड़प्पा और मोहनजोदड़ो तक सीमित नहीं थी। इसके अनेक अन्य महत्त्वपूर्ण केंद्र भी थे जो अपनी विशिष्ट पहचान के लिए प्रसिद्ध हैं।
लोथल (गुजरात) — यह भारत में स्थित सिन्धु सभ्यता का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल है। इसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषता है — "जहाज घाट" (Dockyard)। यह विश्व का प्राचीनतम ज्ञात बंदरगाह माना जाता है। यह 222 मीटर लंबा और 37 मीटर चौड़ा है। यहाँ से ताम्बे के औजार, मनके बनाने के साक्ष्य और विभिन्न स्थानों से आई वस्तुएँ मिली हैं — यह लोथल के एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र होने का प्रमाण है।
कालीबंगन (राजस्थान) — घग्घर नदी के किनारे स्थित इस स्थल पर जुते हुए खेत (Ploughed Field) के सबसे प्राचीन प्रमाण मिले हैं। यहाँ एक खेत में दो दिशाओं में जुताई के निशान मिले हैं — उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम — जो आज भी राजस्थान में प्रचलित कृषि-पद्धति से मिलती है।
धौलावीरा (गुजरात, कच्छ का रण) — यह भारत में स्थित सिन्धु सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल है। इसकी सबसे अनूठी विशेषता है — एक विशाल जल-संग्रहण व्यवस्था। यहाँ 16 जलाशय थे जो नगर के चारों ओर बने थे। इस जल-प्रबंधन व्यवस्था की परिष्करण और व्यापकता असाधारण है। 2021 में धौलावीरा को यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
राखीगढ़ी (हरियाणा) — हाल के वर्षों में यह स्थल चर्चा में आया है क्योंकि यहाँ से बहुत बड़े क्षेत्र में हड़प्पाई अवशेष मिले हैं। यहाँ के कंकालों पर किए गए डीएनए अध्ययन से महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ मिली हैं।
सिन्धु सभ्यता और समकालीन विश्व सभ्यताएँ
सिन्धु घाटी सभ्यता अपने काल में अकेली नहीं थी। उसी समय मेसोपोटामिया में सुमेर और अक्काद की सभ्यताएँ, मिस्र में नील घाटी की सभ्यता और चीन में पीली नदी की सभ्यता विकसित हो रही थीं। इन सभ्यताओं के बीच तुलना और संबंध को समझना अत्यंत रोचक है।
| सभ्यता | काल | प्रमुख नदी | विशेषता |
| सिन्धु | 3300-1300 ईपूर्व | सिन्धु, घग्घर | नगर-नियोजन, स्वच्छता |
| मेसोपोटामिया | 3500-500 ईपूर्व | टाइग्रिस, यूफ्रेटीस | लिखित कानून, चक्र |
| मिस्र | 3100-30 ईपूर्व | नील | पिरामिड, ममीकरण |
| चीन | 2100-256 ईपूर्व | पीली नदी | रेशम, कागज |
सिन्धु सभ्यता और मेसोपोटामिया के बीच व्यापारिक संबंध के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। मेसोपोटामिया के उर नगर में हड़प्पाई मुहरें मिली हैं। मेसोपोटामिया के क्यूनिफॉर्म ग्रंथों में "मेलुहा" से लकड़ी, तांबा, सोना, हाथीदाँत और कार्नेलियन मनके आयात करने का उल्लेख है। "मेलुहा" को आधुनिक विद्वान प्रायः सिन्धु प्रदेश से जोड़ते हैं।
सिन्धु सभ्यता की मिस्री सभ्यता से तुलना करने पर एक महत्त्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है — मिस्र में राजाओं के विशाल पिरामिड और राजकीय समाधियाँ हैं जबकि सिन्धु सभ्यता में कोई राजकीय भव्यता नहीं मिली। यह इस बात का संकेत हो सकता है कि सिन्धु सभ्यता में शक्ति का केंद्रीकरण मिस्र जैसा नहीं था।
सिन्धु सभ्यता का पतन — रहस्य के अनेक रंग
सिन्धु घाटी सभ्यता के पतन का प्रश्न इतिहास के सबसे रहस्यमय और विवादास्पद प्रश्नों में से एक है। लगभग 1900 ईसापूर्व के बाद इस महान सभ्यता का ह्रास शुरू हुआ और 1300 ईसापूर्व तक यह सभ्यता पूरी तरह समाप्त हो गई। इसके कारणों के बारे में अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं।
आर्य-आक्रमण सिद्धांत — पुराने विद्वानों का मत था कि मध्य एशिया से आए आर्यों ने सिन्धु सभ्यता को नष्ट किया। मोहनजोदड़ो में कुछ स्थानों पर बिखरे हुए कंकाल मिले थे जिन्हें हिंसा का प्रमाण माना गया। किंतु आधुनिक पुरातत्वशास्त्री इस सिद्धांत को अस्वीकार करते हैं क्योंकि ये कंकाल एक ही समय के नहीं लगते।
जलवायु परिवर्तन सिद्धांत — अनेक वैज्ञानिकों का मत है कि लगभग 2200-1900 ईसापूर्व के बीच दक्षिण एशिया में एक लंबे सूखे का दौर आया। मानसून कमजोर हो गया, नदियाँ सूखने लगीं और कृषि उत्पादन घट गया। घग्घर-हकरा नदी — जिसे कुछ विद्वान वैदिक "सरस्वती" से जोड़ते हैं — के सूखने की भी इस काल में संभावना है।
नदी मार्ग परिवर्तन — सिन्धु और अन्य नदियों का मार्ग बदलना भी एक कारण हो सकता है। बाढ़ के प्रमाण मोहनजोदड़ो में मिले हैं — कुछ परतों में कीचड़ जमी हुई है जो बार-बार आई बाढ़ का संकेत है।
महामारी और बीमारी — कुछ विद्वानों ने सुझाया है कि किसी बड़ी महामारी ने इस सभ्यता को कमजोर किया।
वास्तव में यह पतन एकाएक नहीं हुआ — यह एक लंबी और जटिल प्रक्रिया थी जिसमें अनेक कारणों का योगदान रहा होगा।
सिन्धु सभ्यता की विरासत — अतीत जो वर्तमान में जीवित है
सिन्धु घाटी सभ्यता भले ही 3000 वर्ष पहले पतन को प्राप्त हुई, किंतु उसकी विरासत आज भी भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति, धर्म और जीवन-पद्धति में जीवित है। यह एक ऐसी नदी है जो भले ही भूमिगत हो गई हो, किंतु जिसका जल आज भी भारतीय सभ्यता की जड़ों को सींचता है।
धार्मिक विरासत की दृष्टि से देखें तो शिव-पूजा, लिंग-योनि की पूजा, नाग-पूजा, पीपल वृक्ष की पूजा, मातृदेवी की आराधना और योग की परंपरा — ये सब सिन्धु सभ्यता से हिंदू धर्म में आए हैं। पशुपति मुहर पर दिखाई देने वाली योगासन-मुद्रा और शिव की अवधारणा का संबंध सिन्धु सभ्यता से जोड़ा जा सकता है।
कृषि और जीवन-पद्धति में भी इस सभ्यता की विरासत है। कपास की खेती, भैंस और गाय का पालन, आम और केले की खेती — ये सब परंपराएँ जो आज भी भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं, सिन्धु सभ्यता से चली आ रही हैं।
आधुनिक भारत के लिए सिन्धु सभ्यता का सबसे बड़ा संदेश है — विकास और प्रगति के लिए आक्रामकता और युद्ध आवश्यक नहीं। एक ऐसी सभ्यता जिसमें कोई विशाल राजकीय महल नहीं, कोई विशाल हथियार-भंडार नहीं, कोई सैन्य-विजय के प्रमाण नहीं — वह सभ्यता फिर भी 700 वर्षों से अधिक समय तक अपने चरमोत्कर्ष पर रही। व्यापार, स्वच्छता, नगर-नियोजन और कला के माध्यम से एक सभ्यता कितनी ऊँचाइयाँ छू सकती है — यही सिन्धु घाटी सभ्यता का अमर संदेश है।