प्रागैतिहासिक भारत — एक परिचय
उस अनंत अंधकार की कल्पना कीजिए जो लाखों वर्ष पहले भारत की इस पावन भूमि पर छाया हुआ था — जब न कोई लिखित शब्द था, न कोई राजा था, न कोई नगर था, न कोई मंदिर। केवल था — एक विशाल, श्वास लेता हुआ जंगल, उसमें दौड़ते हुए जीव-जंतु, और उन जंगलों में छिपा हुआ एक ऐसा प्राणी जो धीरे-धीरे, अनिश्चित कदमों से, अपने भाग्य और अपनी सभ्यता की ओर बढ़ रहा था। यही है प्रागैतिहासिक भारत — वह महाकाव्य जिसे किसी ने नहीं लिखा, किंतु जिसकी गाथा पत्थरों में, गुफाओं में और मिट्टी की परतों में आज भी जीवित है।
"प्रागैतिहासिक" शब्द का अर्थ है — "इतिहास से पूर्व का।" अर्थात् वह काल जब मनुष्य ने अभी लेखन-कला का आविष्कार नहीं किया था और इसलिए जिसका कोई लिखित विवरण उपलब्ध नहीं है। यह काल लाखों वर्षों तक फैला हुआ है — मानव के इस उपमहाद्वीप पर पदार्पण से लेकर सिंधु घाटी सभ्यता के उदय तक। इस विशाल कालखंड को हम केवल पुरातात्विक साक्ष्यों — पत्थर के औजारों, गुफाचित्रों, हड्डियों के अवशेषों और मिट्टी के बर्तनों — के माध्यम से समझ सकते हैं।
भारत में प्रागैतिहासिक अनुसंधान की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हुई जब ब्रिटिश अधिकारी रॉबर्ट ब्रूस फुट ने 1863 में मद्रास के निकट पल्लवरम में पहला पुरापाषाणकालीन औजार खोजा। यह एक ऐतिहासिक खोज थी जिसने भारत के प्रागैतिहासिक अध्ययन को एक नई दिशा दी। तब से अब तक पुरातत्वविदों ने भारत भर में हजारों स्थलों की खुदाई करके उस अंधेरे अतीत पर प्रकाश डाला है जो हमारी सभ्यता की जड़ें हैं।
पाषाण काल का वर्गीकरण — प्रागैतिहास को समझने की कुंजी
प्रागैतिहासिक भारत को समझने के लिए सबसे पहले पाषाण काल के वर्गीकरण को जानना आवश्यक है। पुरातत्वविदों ने इस विशाल कालखंड को मुख्यतः चार भागों में विभाजित किया है — पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल, नवपाषाण काल और ताम्रपाषाण काल। यह वर्गीकरण मुख्यतः मानव द्वारा उपयोग किए जाने वाले औजारों की प्रकृति और तकनीक पर आधारित है।
| काल | अनुमानित समय | प्रमुख विशेषता | प्रमुख स्थल |
| पुरापाषाण काल | 5 लाख - 10,000 ईसापूर्व | कच्चे पत्थर के औजार | भीमबेटका, सोहन घाटी |
| मध्यपाषाण काल | 10,000 - 6,000 ईसापूर्व | लघु पाषाण औजार (माइक्रोलिथ) | आदमगढ़, बागोर |
| नवपाषाण काल | 6,000 - 1,000 ईसापूर्व | घिसे पत्थर के औजार, कृषि | मेहरगढ़, बुर्जहोम |
| ताम्रपाषाण काल | 3,000 - 700 ईसापूर्व | तांबे के औजार, मिट्टी के बर्तन | अहार, मालवा, जोर्वे |
यह वर्गीकरण यूरोपीय पुरातत्वशास्त्र से आया है किंतु भारतीय संदर्भ में इसे अनुकूलित किया गया है। भारत की भौगोलिक विविधता इतनी व्यापक है कि विभिन्न क्षेत्रों में ये कालखंड अलग-अलग समय में आए और विकसित हुए। उत्तर-पश्चिम भारत (आज का पाकिस्तान और राजस्थान) में जहाँ नवपाषाण काल बहुत पहले आरंभ हुआ, वहीं दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में यह बाद में आया। यह विविधता भारत के प्रागैतिहासिक अध्ययन को और भी रोचक और जटिल बनाती है।
पाषाण काल के अलावा प्रागैतिहासिक भारत में "धातु काल" भी महत्त्वपूर्ण है। ताम्रपाषाण काल के बाद लौह युग आया जो प्रागैतिहास और इतिहास के बीच की महत्त्वपूर्ण संधि-कड़ी है।
पुरापाषाण काल — आदिम मानव की प्रथम यात्रा
पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age) भारत के प्रागैतिहास का सबसे प्राचीन और सबसे लंबा काल है। यह काल लगभग 5 लाख वर्ष पूर्व से आरंभ होकर लगभग 10,000 ईसापूर्व तक चला। इस काल में भारत में रहने वाला मानव "होमो इरेक्टस" और बाद में "होमो सेपियंस" था — आधुनिक मनुष्य का पूर्वज।
पुरापाषाण काल को तीन उपभागों में विभाजित किया जाता है — निम्न पुरापाषाण काल, मध्य पुरापाषाण काल और उच्च पुरापाषाण काल। निम्न पुरापाषाण काल (5 लाख से 1 लाख वर्ष पूर्व) में मनुष्य बड़े और कच्चे पत्थर के औजार बनाता था। "हस्त-कुठार" (Hand Axe) इस काल का सबसे विशिष्ट औजार था। ये हस्त-कुठार पत्थर को तोड़कर बनाए जाते थे और इनका उपयोग काटने, खोदने और शिकार करने में होता था। सोहन घाटी (पंजाब, अब पाकिस्तान में), अतिरमपक्कम (तमिलनाडु) और पल्लवरम (मद्रास) इस काल के प्रमुख स्थल हैं।
मध्य पुरापाषाण काल (1 लाख से 40,000 वर्ष पूर्व) में औजार बनाने की तकनीक में महत्त्वपूर्ण सुधार हुआ। "फ्लेक तकनीक" का उपयोग होने लगा जिसमें एक बड़े पत्थर से छोटे-छोटे टुकड़े निकालकर तीखे औजार बनाए जाते थे। नेवासा (महाराष्ट्र), भीमबेटका (मध्यप्रदेश) और ओडिशा के कुछ क्षेत्र इस काल के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे।
उच्च पुरापाषाण काल (40,000 से 10,000 वर्ष पूर्व) में मानव की बौद्धिक क्षमता में और विकास हुआ। इस काल में "ब्लेड तकनीक" आई जिसमें पत्थर से लंबे और पतले ब्लेड जैसे टुकड़े निकाले जाते थे। इस काल में कला का भी आरंभ हुआ — भीमबेटका की गुफाओं में इस काल के चित्र मिले हैं।
मध्यपाषाण काल — परिवर्तन और अनुकूलन की बेला
लगभग 10,000 ईसापूर्व में पृथ्वी पर एक महान जलवायु परिवर्तन आया — हिमयुग का अंत हुआ। हिमनद पिघलने लगे, तापमान बढ़ा, वनस्पति का स्वरूप बदला और जीव-जगत में नई प्रजातियाँ उभरीं। यह परिवर्तन भारत के प्रागैतिहासिक मानव के लिए एक नई चुनौती और एक नया अवसर दोनों था। इसी पृष्ठभूमि में मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) का उदय हुआ।
मध्यपाषाण काल की सबसे विशिष्ट पहचान है — "माइक्रोलिथ" (Microliths) अर्थात् अत्यंत लघु पाषाण औजार। ये औजार इतने छोटे थे कि इन्हें लकड़ी या हड्डी के डंठल में फँसाकर तीर, भाला और दरांती जैसे संयुक्त औजार बनाए जाते थे। माइक्रोलिथ तकनीक एक महान तकनीकी क्रांति थी — इसने मनुष्य को अधिक सटीक, हल्के और बहुउद्देशीय औजार बनाने में सक्षम किया।
मध्यपाषाण काल के प्रमुख स्थलों में आदमगढ़ (होशंगाबाद, मध्यप्रदेश), बागोर (राजस्थान), सराईनाहर राय और महदहा (उत्तरप्रदेश) विशेष उल्लेखनीय हैं। बागोर से प्राप्त साक्ष्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि यहाँ पशुपालन के प्रारंभिक प्रमाण मिले हैं — यह संकेत देते हैं कि मध्यपाषाण काल में मनुष्य केवल शिकारी नहीं रहा, वह धीरे-धीरे पशुओं को पालतू बनाने लगा था।
इस काल में मानव का जीवन-स्तर पुरापाषाण काल से बेहतर था। वह छोटे समूहों में रहता था जिन्हें "बैंड" कहा जाता है। इन बैंडों में 20-50 व्यक्ति होते थे। बैंड के सदस्य मिलकर शिकार करते, भोजन एकत्र करते और एक-दूसरे की रक्षा करते थे। यह समाज पूरी तरह समतावादी था — कोई राजा नहीं, कोई वर्गभेद नहीं।
नवपाषाण काल — कृषि क्रांति और स्थायी जीवन का आरंभ
नवपाषाण काल (Neolithic Age) मानव इतिहास में एक ऐसी क्रांति का काल है जिसे गॉर्डन चाइल्ड ने "नवपाषाण क्रांति" कहा था। यह वह क्षण था जब मनुष्य ने भोजन की तलाश में घूमना-फिरना बंद किया और अपनी जड़ें जमा लीं। कृषि का आविष्कार, पशुपालन का विकास और स्थायी बस्तियों का निर्माण — ये तीन परिवर्तन मिलकर मानव सभ्यता की नींव बने।
भारत में नवपाषाण काल के सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल हैं — मेहरगढ़ (बलूचिस्तान, अब पाकिस्तान में), बुर्जहोम (कश्मीर), गुफ्फ्राल (कश्मीर), चिरांद (बिहार), ब्रह्मगिरि (कर्नाटक), पिकलीहाल और संगनकल्लू (कर्नाटक)।
मेहरगढ़ भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाण काल का सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण स्थल है। यह 7000 ईसापूर्व से भी पहले का है। यहाँ गेहूँ और जौ की खेती के सबसे प्रारंभिक प्रमाण मिले हैं। साथ ही भेड़, बकरी और मवेशियों को पालतू बनाने के साक्ष्य भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं। मेहरगढ़ एक ऐसी सभ्यता का उद्गम-स्थल है जो आगे चलकर सिंधु घाटी सभ्यता में परिणत हुई।
बुर्जहोम (कश्मीर) का नवपाषाणकालीन स्थल अपनी एक विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध है — यहाँ के लोग अपने मृत पालतू कुत्तों को अपने मालिकों के साथ दफनाते थे। यह मानव-पशु के बीच भावनात्मक संबंध का एक अत्यंत स्पर्शकारी प्रमाण है। बुर्जहोम में "गर्त-निवास" (Pit Dwellings) के प्रमाण भी मिले हैं — जमीन में गड्ढे खोदकर बनाए गए घर जो ठंडी जलवायु से बचाव के लिए उपयोगी थे।
ताम्रपाषाण काल — धातु युग का भारत में आगमन
नवपाषाण काल के बाद भारत में एक नए युग का उदय हुआ — ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age)। यह वह काल था जब मनुष्य ने पत्थर के साथ-साथ तांबे का उपयोग भी आरंभ किया। तांबा धरती की सतह पर प्राकृतिक रूप से पाया जाता था और अपेक्षाकृत नरम होने के कारण पत्थर से पीट-पीटकर इसे आसानी से आकार दिया जा सकता था। यही कारण था कि तांबा पहली धातु बनी जिसे मनुष्य ने औजार और हथियार बनाने के लिए उपयोग किया।
ताम्रपाषाण काल भारत में विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न समयों पर आया। राजस्थान में अहार संस्कृति (2800-1500 ईसापूर्व), मध्यप्रदेश और राजस्थान में मालवा संस्कृति (1700-1200 ईसापूर्व), महाराष्ट्र में जोर्वे संस्कृति (1400-700 ईसापूर्व) और पश्चिम बंगाल में पांडु राजार ढिबि इस काल के प्रमुख केंद्र थे।
अहार (राजस्थान, उदयपुर के निकट) ताम्रपाषाण काल का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थल है। यहाँ से तांबे की अनेक वस्तुएँ मिली हैं — कुल्हाड़ियाँ, मछली पकड़ने के कांटे और अन्य औजार। यहाँ के लोग चावल उगाते थे और गाय, भैंस और बकरी पालते थे। अहार की मिट्टी के बर्तन काले और लाल रंग के हैं और उन पर ज्यामितीय आकृतियाँ बनी हैं।
जोर्वे संस्कृति दक्कन की सबसे महत्त्वपूर्ण ताम्रपाषाणकालीन संस्कृति है। इनावगाँव (पुणे के निकट) इस संस्कृति का सर्वाधिक उत्खनित स्थल है। यहाँ पाँच-छह कमरों वाले घरों के अवशेष मिले हैं। शव को घर के फर्श के नीचे दफनाने की प्रथा थी — मृत व्यक्ति के साथ उसके औजार, बर्तन और भोजन रखा जाता था।
भीमबेटका — प्रागैतिहासिक कला का अद्भुत खजाना
मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका भारत के प्रागैतिहासिक अध्ययन का एक ऐसा केंद्र है जो विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में गिना जाता है। 2003 में यूनेस्को ने भीमबेटका को "विश्व धरोहर स्थल" घोषित किया। यह स्थल विंध्याचल पर्वत श्रृंखला में स्थित है जहाँ बलुआ पत्थर की सैकड़ों गुफाएँ हैं और इनमें से लगभग 500 गुफाओं में अद्भुत चित्र बने हैं।
भीमबेटका की खोज 1957-58 में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की जब वे रायसेन के पास से ट्रेन में यात्रा कर रहे थे और उन्होंने दूर पहाड़ियों पर गुफाओं को देखा। पास जाकर उन्होंने जो देखा, वह अकल्पनीय था — सैकड़ों गुफाओं की दीवारों पर हजारों वर्ष पुराने चित्रों की एक अटूट श्रृंखला।
भीमबेटका के चित्र पुरापाषाण काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक के हैं — यह एक जीवंत कैनवास है जो हजारों वर्षों के मानव इतिहास को समेटे हुए है। इन चित्रों में प्रमुख हैं — शिकार के दृश्य, जिनमें बड़े जानवरों — बाइसन, हाथी, गैंडा, हिरण — का शिकार करते मनुष्य दिखाए गए हैं। नृत्य और उत्सव के दृश्य जिनमें मनुष्य एक-दूसरे के साथ खुशी मनाते दिखते हैं। युद्ध के दृश्य जिनमें दो समूहों के बीच संघर्ष दिखाया गया है। धार्मिक अनुष्ठानों के दृश्य जिनमें शायद किसी देवता की पूजा हो रही है।
चित्रों में उपयोग किए गए रंग प्राकृतिक स्रोतों से लिए गए थे — लाल और पीले रंग के लिए गेरू (hematite), सफेद के लिए चूना पत्थर और हरे के लिए हरी मिट्टी। इन रंगों की स्थायित्व अद्भुत है — हजारों वर्ष बाद भी ये चित्र स्पष्ट दिखाई देते हैं।
प्रागैतिहासिक मानव का सामाजिक जीवन — समूह, परिवार और समाज
प्रागैतिहासिक मानव का सामाजिक जीवन आज के सामाजिक जीवन से बिल्कुल भिन्न था, किंतु उसमें भी वे सभी मूलभूत तत्त्व विद्यमान थे जो आज के समाज की नींव हैं — परिवार, सहयोग, नेतृत्व और नियम।
पुरापाषाण काल में मनुष्य "बैंड" नामक छोटे समूहों में रहता था। एक बैंड में सामान्यतः 20 से 50 व्यक्ति होते थे — कई परिवार एक साथ। बैंड का नेतृत्व प्रायः सबसे अनुभवी और शक्तिशाली व्यक्ति करता था, किंतु यह नेतृत्व वंशानुगत नहीं था। महत्त्वपूर्ण निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते थे।
कार्य-विभाजन लिंग के आधार पर होता था — पुरुष शिकार और मछली पकड़ने का काम करते थे जबकि महिलाएँ फल, बीज और कंद इकट्ठा करती थीं। किंतु यह विभाजन पूर्णतः कठोर नहीं था। पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि कभी-कभी महिलाएँ भी शिकार में भाग लेती थीं और पुरुष भोजन एकत्र करते थे।
नवपाषाण काल में कृषि के विकास के साथ समाज में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए। स्थायी बस्तियाँ बनीं जिनमें दसियों परिवार साथ रहते थे। अब संपत्ति की अवधारणा उभरी — जमीन, पशु और अनाज के भंडार। इससे सामाजिक असमानता के बीज भी पड़े। कुछ परिवार दूसरों से अधिक संपन्न होने लगे। इस काल में श्रम-विभाजन भी अधिक जटिल हो गया — किसान, कुम्हार, बुनकर और बढ़ई अलग-अलग व्यवसाय करने लगे।
प्रागैतिहासिक काल में भोजन और शिकार — जीवन-यापन की रणनीतियाँ
प्रागैतिहासिक मानव के जीवन का केंद्रीय प्रश्न था — भोजन कैसे मिले? इस प्रश्न का उत्तर खोजते-खोजते मनुष्य ने शिकार की कला सीखी, मछली पकड़ना सीखा, खाद्य पौधों की पहचान की और अंततः कृषि का आविष्कार किया। यह यात्रा लाखों वर्षों की है।
पुरापाषाण काल में भोजन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था। मनुष्य बड़े जानवरों — हाथी, गैंडा, बाइसन, हिरण — का शिकार करता था। यह शिकार एक अत्यंत जोखिम भरा काम था क्योंकि तब न बंदूकें थीं, न धनुष-बाण। केवल पत्थर के भाले और कुठार थे। इसलिए शिकार सामूहिक रूप से होता था — पूरा बैंड मिलकर जानवर को घेरता था।
इस काल में मनुष्य "खाद्य-संग्रहकर्ता" (Food Gatherer) भी था। महिलाएँ जंगल से जड़ें, फल, बीज, कंद और शहद एकत्र करती थीं। यह संग्रहण बहुत महत्त्वपूर्ण था क्योंकि शिकार हमेशा सफल नहीं होता था। पुरातत्वविदों का अनुमान है कि पुरापाषाण काल में 60-70 प्रतिशत भोजन वनस्पति-संग्रहण से और केवल 30-40 प्रतिशत शिकार से आता था।
नवपाषाण काल में कृषि का आविष्कार एक महान क्रांति थी। जब मनुष्य ने पहली बार जमीन में बीज बोए और फसल काटी, तब उसने भोजन-उत्पादन पर नियंत्रण पा लिया। अब वह प्रकृति का दास नहीं रहा — वह प्रकृति का सहयोगी बना। भारत में गेहूँ, जौ, चावल, ज्वार और बाजरे की खेती के प्रारंभिक प्रमाण विभिन्न नवपाषाणकालीन स्थलों से मिले हैं।
औजारों का विकास — पत्थर से धातु तक की महान यात्रा
प्रागैतिहासिक काल में औजारों का विकास मानव बुद्धिमत्ता और रचनात्मकता की सबसे शानदार गाथा है। यह वह कहानी है जिसमें एक ऐसा प्राणी — जिसके पास न तेज दाँत थे, न मजबूत पंजे, न तेज गति — ने अपनी बुद्धि और हाथों का उपयोग करके प्रकृति पर विजय पाई।
पुरापाषाण काल के औजार सरल थे किंतु उनका महत्त्व असाधारण था। हस्त-कुठार (Handaxe) — यह एक बड़े पत्थर को तोड़कर बनाया जाता था। इसके दोनों ओर धार होती थी और इसका उपयोग काटने, खोदने और जानवरों की हड्डियाँ तोड़ने में होता था। क्लीवर — यह हस्त-कुठार का एक प्रकार था जिसकी एक सीधी काटने वाली धार होती थी। स्क्रेपर — इसका उपयोग जानवरों की खाल उतारने में होता था।
मध्यपाषाण काल में माइक्रोलिथ तकनीक ने औजार-निर्माण में क्रांति ला दी। ये लघु औजार 1-5 सेमी तक के होते थे और इन्हें लकड़ी या हड्डी में फँसाकर तीर, भाला और दरांती जैसे "संयुक्त औजार" बनाए जाते थे। यह एक विशिष्ट तकनीकी छलाँग थी।
नवपाषाण काल में औजार बनाने की तकनीक में मूलभूत परिवर्तन आया — "घिसाई" (Grinding और Polishing) तकनीक। अब पत्थर को तोड़कर नहीं, बल्कि एक पत्थर को दूसरे पत्थर पर रगड़कर चिकने और तीखे औजार बनाए जाने लगे। इससे कुल्हाड़ी, हँसिया और अन्य कृषि औजार बनाना संभव हुआ।
प्रागैतिहासिक धर्म और आस्था — अदृश्य की खोज
प्रागैतिहासिक मानव का धार्मिक जीवन उतना ही रहस्यमय है जितना वह स्वयं। जब से मानव ने चेतना पाई, उसने अपने आसपास की अज्ञात शक्तियों को समझने का प्रयास किया — सूर्य, चंद्रमा, तूफान, बाढ़, जन्म और मृत्यु। इन्हीं शक्तियों के प्रति भय, श्रद्धा और जिज्ञासा से धर्म का जन्म हुआ।
प्रागैतिहासिक धर्म के सबसे स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं — शव-संस्कार की परंपराओं में। यदि मनुष्य यह न मानता कि मृत्यु के बाद भी कोई जीवन है, तो वह मृतकों को दफनाने की कोई चिंता नहीं करता। किंतु हमें प्रागैतिहासिक स्थलों में शवों के साथ भोजन, औजार और आभूषण रखे हुए मिले हैं — यह मृत्यु-पश्चात् जीवन में विश्वास का स्पष्ट प्रमाण है।
पशु-पूजा (Totemism) का प्रमाण भीमबेटका और अन्य गुफाचित्रों में मिलता है। कुछ जानवरों — विशेषतः बाइसन, हाथी और बाघ — को विशेष सम्मान दिया जाता था। शायद ये जानवर किसी बैंड के "टोटेम" थे — जो उस समूह की पहचान और संरक्षक थे।
मातृदेवी (Mother Goddess) की पूजा के प्रमाण नवपाषाण काल से मिलते हैं। मेहरगढ़ और अन्य स्थलों से मिली स्त्री-मूर्तियाँ संभवतः प्रजनन शक्ति की देवी का प्रतिनिधित्व करती थीं। यह कृषि समाज में स्वाभाविक था — जहाँ भूमि की उर्वरता और स्त्री की प्रजनन शक्ति एक ही शक्ति के दो रूप माने जाते थे।
जादू-टोना और अनुष्ठान भी प्रागैतिहासिक धर्म के महत्त्वपूर्ण अंग थे। शिकार पर जाने से पहले शिकार के जानवर का चित्र बनाना और उस पर प्रतीकात्मक वार करना — यह एक जादुई अनुष्ठान था जो शिकार की सफलता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता था।
प्रागैतिहासिक भारत के प्रमुख पुरातात्विक स्थल
भारत भर में प्रागैतिहासिक स्थलों की एक विशाल श्रृंखला है जो इस उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास को उजागर करती है। इन स्थलों की खुदाई से जो साक्ष्य मिले हैं, उन्होंने भारत के प्रागैतिहास की एक जीवंत और विस्तृत तस्वीर बनाई है।
अतिरमपक्कम (तमिलनाडु) — हाल के वर्षों में यहाँ से 1.5 मिलियन वर्ष पुराने औजार मिले हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि भारत में मानव बसाव बहुत प्राचीन है। यहाँ से "अशोलियन" तकनीक के हस्त-कुठार मिले हैं।
हुंसगी घाटी (कर्नाटक) — यह दक्षिण भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण पुरापाषाणकालीन स्थल है। यहाँ से लगभग 5 लाख वर्ष पुराने औजार मिले हैं।
सोहन घाटी (पंजाब, अब पाकिस्तान में) — यहाँ से "सोहन संस्कृति" के औजार मिले हैं जो एक विशिष्ट पुरापाषाणकालीन औजार-परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
सराईनाहर राय और महदहा (उत्तरप्रदेश) — मध्यपाषाणकालीन ये स्थल मानव-कंकालों, माइक्रोलिथ औजारों और जानवरों की हड्डियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
मेहरगढ़ (बलूचिस्तान) — 7000 ईसापूर्व से भी पुराना यह स्थल कृषि और पशुपालन के सबसे प्रारंभिक प्रमाणों के लिए विश्वप्रसिद्ध है। यह सिंधु सभ्यता का पूर्वज माना जाता है।
पिकलीहाल और संगनकल्लू (कर्नाटक) — दक्षिण भारत के ये नवपाषाणकालीन स्थल "राख के टीलों" (Ash Mounds) के लिए प्रसिद्ध हैं। माना जाता है कि ये टीले पशुओं के बाड़ों को जलाने से बने थे।
प्रागैतिहासिक काल में जलवायु और पर्यावरण — प्रकृति और मानव का अंतर्संबंध
प्रागैतिहासिक भारत को समझने के लिए उस काल की जलवायु और पर्यावरणीय परिस्थितियों को जानना अनिवार्य है। मनुष्य का विकास और प्रसार बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तनों द्वारा निर्धारित होता रहा है — यह एक ऐसा तथ्य है जो आज भी उतना ही सत्य है जितना लाखों वर्ष पहले था।
लगभग 2 मिलियन वर्ष पूर्व से पृथ्वी पर बार-बार "हिमयुग" आते और जाते रहे। हिमयुग में तापमान गिरता था, ग्लेशियर बनते थे और समुद्र का स्तर कम होता था। इससे भारत और अफ्रीका के बीच भूमि-मार्ग खुल जाता था जिससे मानव और जीव-जंतुओं का प्रवास संभव होता था। हिमयुग के बीच के गर्म काल में समुद्र का स्तर बढ़ता था और जलवायु अनुकूल होती थी।
भारत में मानव के पदार्पण का समय इन्हीं जलवायु परिवर्तनों से जुड़ा है। जब हिमयुग में समुद्र का स्तर कम था, तब अफ्रीका से या पश्चिम एशिया से मनुष्य भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश कर सके।
लगभग 10,000 ईसापूर्व में अंतिम हिमयुग की समाप्ति के बाद जलवायु में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। तापमान बढ़ा, मानसून मजबूत हुआ और भारत में वनस्पति का विस्तार हुआ। यही परिवर्तन कृषि के उदय के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनाने में सहायक रहा।
प्रागैतिहासिक से ऐतिहासिक काल का संक्रमण — सभ्यता की दहलीज पर
प्रागैतिहास और इतिहास के बीच की रेखा सदा स्पष्ट नहीं होती। यह संक्रमण एक लंबी, क्रमिक और बहुस्तरीय प्रक्रिया है जो भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग समय पर हुई।
ताम्रपाषाण संस्कृतियों के विकास के साथ भारत सभ्यता की दहलीज पर खड़ा हो गया था। इस काल में कई ऐसे तत्त्व विकसित हो चुके थे जो सभ्यता के आवश्यक घटक माने जाते हैं — स्थायी बस्तियाँ, कृषि, पशुपालन, व्यापार, श्रम-विभाजन और धार्मिक अनुष्ठान। जो एकमात्र तत्त्व अनुपस्थित था, वह था लेखन।
लगभग 3000 ईसापूर्व में सिंधु घाटी में एक असाधारण घटना घटी — एक ऐसी सभ्यता का उदय हुआ जिसमें नगर-नियोजन, लिखित लिपि, व्यापक व्यापार नेटवर्क और विकसित सामाजिक संगठन था। यह सिंधु घाटी सभ्यता थी जो प्रागैतिहास का अंत और इतिहास का आरंभ है।
किंतु यह सभ्यता अचानक नहीं आई — यह उन हजारों वर्षों के प्रागैतिहासिक विकास का परिणाम था जिसकी जड़ें मेहरगढ़, अमरी और कोटदीजी जैसी प्रागैतिहासिक बस्तियों में थीं। प्रागैतिहासिक मानव ने जो कृषि, पशुपालन, मिट्टी के बर्तन बनाने की कला और धातु-कर्म सीखा था — वही आगे चलकर सिंधु सभ्यता की नींव बना।
प्रागैतिहासिक भारत की विरासत — अतीत की जड़ें, वर्तमान की शाखाएँ
प्रागैतिहासिक भारत का अध्ययन केवल एक ऐतिहासिक जिज्ञासा नहीं है — यह हमें यह समझने में सहायक है कि हम कहाँ से आए हैं, हम कौन हैं और हमारी सभ्यता की जड़ें कितनी गहरी और प्राचीन हैं।
प्रागैतिहासिक भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण विरासत है — निरंतरता की भावना। भीमबेटका के चित्रों में जो नृत्य और उत्सव के दृश्य हैं, वे आज भी भारत के आदिवासी समुदायों के लोकनृत्यों में जीवित हैं। नवपाषाण काल में जो खेती और पशुपालन आरंभ हुआ, वह आज भी भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। मेहरगढ़ में जो मातृदेवी की पूजा होती थी, उसकी परंपरा आज भी भारत के अनेक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में जीवित है।
प्रागैतिहासिक भारत यह भी सिखाता है कि मानव की जिजीविषा — जीने की इच्छा और जीवन को बेहतर बनाने की अदम्य आकांक्षा — लाखों वर्षों से अपरिवर्तित है। उस आदिम मानव ने जो पहला पत्थर का औजार बनाया, उसी चेतना ने आगे चलकर गणित, विज्ञान और दर्शन का निर्माण किया। भीमबेटका में जिस हाथ ने पहला चित्र बनाया, उसी रचनात्मक चेतना ने अजंता और एलोरा की गुफाओं को सजाया।
आज जब भारत एक महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि इस यात्रा की शुरुआत उस अनाम आदिम मानव ने की थी जिसने लाखों वर्ष पहले इसी धरती पर अपने पहले कदम रखे थे। प्रागैतिहासिक भारत हमारी सभ्यता की जड़ें हैं — और जिस वृक्ष की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, वह उतना ही ऊँचा और मजबूत होता है।