उत्तर-गुप्त काल — विखंडन और नवनिर्माण का संधि-युग
भारतीय इतिहास में जब भी कोई महान साम्राज्य अस्त होता है, तो एक अजीब विरोधाभास उत्पन्न होता है — एक ओर राजनीतिक अराजकता और दूसरी ओर सांस्कृतिक उर्वरता। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद का काल — लगभग 550 ईस्वी से 1200 ईस्वी तक — ऐसा ही एक कालखंड था। इसे कभी-कभी "अंधकार युग" कह दिया जाता है, किंतु यह नाम न्यायसंगत नहीं है। यह काल वास्तव में भारत की क्षेत्रीय विविधता और सांस्कृतिक बहुलता का युग था।
गुप्त साम्राज्य के खंडहरों पर कई महान क्षेत्रीय राजवंशों ने अपने-अपने राज्य खड़े किए। उत्तर भारत में हर्षवर्धन का साम्राज्य उभरा। दक्षिण में पल्लव, चालुक्य और राष्ट्रकूट ने अपने गौरव के अध्याय लिखे। बंगाल में पाल वंश ने बौद्ध धर्म और शिक्षा को नई ऊँचाई दी। उत्तर-पश्चिम में प्रतिहारों ने अरब आक्रमणकारियों को रोककर भारत की रक्षा की। और तमिलनाडु में चोल वंश ने पुनः उठकर एक ऐसा साम्राज्य बनाया जो दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला।
यह काल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारत की विविध क्षेत्रीय संस्कृतियाँ — तमिल, कन्नड़, तेलुगु, बंगाली, राजपूत — अपनी पूर्ण पहचान और परिपक्वता के साथ उभरीं। यह राजनीतिक विखंडन था, किंतु सांस्कृतिक दृष्टि से यह भारत का महान विविधता-काल था।
हर्षवर्धन — उत्तर भारत का अंतिम महान हिंदू सम्राट
हर्षवर्धन (606-647 ईस्वी) भारतीय इतिहास का वह अंतिम महान हिंदू सम्राट था जिसने उत्तर भारत के बड़े भाग को एक शासन के अंतर्गत एकजुट किया। उसके बाद उत्तर भारत में 12वीं शताब्दी तक कोई ऐसी एकीकृत शक्ति नहीं उभरी।
हर्षवर्धन पुष्यभूति (वर्धन) वंश का था। उसके पिता प्रभाकरवर्धन थानेश्वर (हरियाणा) के शासक थे। हर्ष के बड़े भाई राज्यवर्धन एक साहसी योद्धा थे किंतु षड्यंत्र में मारे गए। उनके साथ हुए विश्वासघात ने हर्ष में एक अटूट प्रतिशोध की आग जला दी और उन्होंने सत्ता की बागडोर संभाली।
हर्ष ने मात्र 16 वर्ष की आयु में शासन आरंभ किया। उसने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया जो उत्तर भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र था। अगले छह वर्षों में उसने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के बड़े भागों पर अधिकार जमा लिया।
हर्ष की सबसे बड़ी पराजय हुई जब उसने दक्षिण भारत पर आक्रमण का प्रयास किया। चालुक्य राजा पुलकेशी द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर उसे पराजित किया — यह वह सीमा-रेखा थी जिसके आगे हर्ष कभी नहीं बढ़ सका। यह पराजय इस बात का प्रतीक थी कि दक्षिण भारत उत्तर के किसी भी शासक के अधीन होने को तैयार नहीं था।
हर्ष का प्रशासन और सांस्कृतिक योगदान
हर्षवर्धन केवल एक महान विजेता नहीं था — वह एक विद्वान, कवि और उदार शासक भी था। उसकी बहुमुखी प्रतिभा उसे भारतीय इतिहास के सबसे रोचक व्यक्तित्वों में से एक बनाती है।
प्रशासनिक व्यवस्था में हर्ष ने गुप्त परंपरा का अनुसरण किया। उसका साम्राज्य "भुक्ति", "विषय" और "ग्राम" में विभाजित था। किंतु सामंत व्यवस्था और अधिक विकसित हो गई थी। बाणभट्ट के "हर्षचरित" में हर्ष के प्रशासन का विस्तृत वर्णन है।
हर्ष बौद्ध धर्म का परम समर्थक था — यद्यपि वह शुरू में शैव था। बौद्ध धर्म के प्रति उसकी आस्था इतनी गहरी हो गई कि उसने "प्रयाग" में हर पाँच वर्षों में एक बड़ा "महादान समारोह" आयोजित किया जिसमें वह अपना सारा खजाना दान कर देता था।
हर्ष स्वयं एक उत्कृष्ट संस्कृत कवि थे। उनकी तीन नाट्य-कृतियाँ प्रसिद्ध हैं — "प्रियदर्शिका", "रत्नावली" और "नागानंद"। "नागानंद" बौद्ध जातक-कथाओं पर आधारित है और इसमें बोधिसत्त्व जीमूतवाहन की कथा है जो अपना जीवन देकर नागों की रक्षा करता है।
हर्ष के दरबार में बाणभट्ट — जिन्होंने "हर्षचरित" और "कादंबरी" लिखी — उस काल के सबसे महान साहित्यकार थे। "कादंबरी" संस्कृत गद्य का एक अद्भुत महाकाव्य है।
नसांग — हर्ष के भारत का एक अनमोल दर्पण
ह्वेनसांग (Xuanzang) — जिन्हें "युआनझुआंग" भी कहते हैं — एक चीनी बौद्ध तीर्थयात्री थे जिन्होंने 629-645 ईस्वी के बीच भारत की यात्रा की। उन्होंने लगभग 15 वर्ष भारत में बिताए और अपने अनुभव "सी-यू-की" (Si-Yu-Ki — Records of the Western Regions) में लिखे। यह ग्रंथ हर्ष-काल के भारत का सबसे विश्वसनीय और विस्तृत विदेशी विवरण है।
ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में रहे जहाँ उस समय 10,000 से अधिक छात्र और 1500 से अधिक शिक्षक थे। वे शीलभद्र जैसे महान बौद्ध विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की।
ह्वेनसांग ने हर्ष के दरबार और उसके राज्य का विवरण दिया है —
कन्नौज का वर्णन: "यह नगर अत्यंत समृद्ध है। इसकी जनसंख्या घनी है। लोग सुखी और समृद्ध हैं।"
हर्ष के चरित्र का वर्णन: "राजा बहुत परिश्रमी हैं। वे दिन के तीन भाग शासन-कार्य में और एक भाग धार्मिक कार्यों में लगाते हैं। वे कभी थकते नहीं।"
समाज का वर्णन: "लोग धार्मिक और नैतिक हैं। वे झूठ नहीं बोलते। देश में चोरी और डाकेज़नी बहुत कम है।"
ह्वेनसांग ने पाटलिपुत्र के बारे में लिखा कि यह पहले बहुत समृद्ध था किंतु अब इसकी महिमा घट गई है। यह गुप्त साम्राज्य के पतन का जीवंत साक्ष्य था।
पल्लव वंश — दक्षिण भारत की महान सांस्कृतिक शक्ति
गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण भारत में पल्लव वंश ने एक महान राज्य स्थापित किया। पल्लव तमिलनाडु और आंध्र के उत्तरी भाग में शासन करते थे और उनकी राजधानी "कांची" (कांचीपुरम) थी।
पल्लवों की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद है — कुछ उन्हें ब्राह्मण मानते हैं तो कुछ नाग कबीले से जोड़ते हैं। किंतु जो निश्चित है वह यह कि वे संस्कृत और तमिल दोनों संस्कृतियों के संरक्षक थे।
पल्लव वंश के सबसे महान शासकों में प्रमुख थे —
महेंद्रवर्मन प्रथम (600-630 ईस्वी) — एक बहुमुखी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व। वे एक कुशल शासक, कवि, संगीतकार और चित्रकार थे। उन्होंने "मत्तविलास प्रहसन" नामक व्यंग्य नाटक लिखा — जो बौद्ध और जैन भिक्षुओं पर व्यंग्य करता है। उन्होंने "गुहा-स्थापत्य" (rock-cut architecture) को एक नई दिशा दी।
नरसिंहवर्मन प्रथम "महामल्ल" (630-668 ईस्वी) — पल्लव वंश का सबसे महान शासक। उन्होंने चालुक्य राजा पुलकेशी द्वितीय को तीन बार पराजित किया। उन्होंने "महाबलिपुरम" (मामल्लपुरम) की स्थापना की और यहाँ के अद्भुत मंदिरों और "रथों" का निर्माण करवाया। यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित महाबलिपुरम के "पाँच रथ" और "अर्जुन की तपस्या" शिला-उत्कीर्णन इसी काल की देन है।
चालुक्य वंश — उत्तर और दक्षिण के बीच महान संघर्ष
चालुक्य वंश दक्कन के इतिहास में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण राजवंश था। इसकी तीन शाखाएँ प्रमुख थीं — बादामी के चालुक्य, वेंगी के चालुक्य और कल्याणी के चालुक्य।
बादामी के चालुक्य — इनकी राजधानी बादामी (कर्नाटक) थी। इस वंश का सबसे महान शासक था —
पुलकेशी द्वितीय (610-642 ईस्वी) — जिसे दक्षिण का "हर्षवर्धन" भी कहा जा सकता है। उसने हर्षवर्धन को नर्मदा के तट पर पराजित किया — यह उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक महान ऐतिहासिक युद्ध था। उसने पल्लव राज्य पर भी आक्रमण किया। ईरानी सम्राट खुसरो द्वितीय से उसके राजनयिक संबंध थे — अजंता गुफाओं में एक चित्र है जिसमें ईरानी दूतावास का दृश्य दिखाया गया है।
पुलकेशी द्वितीय का वर्णन ह्वेनसांग ने भी किया है — "दक्कन का राजा 'बोलो-जी-पो-लो' (पुलकेशी) बहुत शक्तिशाली है। उसकी सेना में हाथियों की बड़ी संख्या है।"
किंतु पुलकेशी द्वितीय का अंत दुखद था। पल्लव राजा नरसिंहवर्मन ने बदला लेते हुए वातापी (बादामी) पर आक्रमण किया और उसे नष्ट कर दिया।
बादामी के चालुक्यों के काल में ऐहोल, पत्तदकल और बादामी में अद्भुत मंदिरों का निर्माण हुआ। पत्तदकल को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है।
राष्ट्रकूट वंश — दक्कन के सर्वशक्तिमान शासक
राष्ट्रकूट वंश (753-982 ईस्वी) दक्कन के इतिहास की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति थी। इसने बादामी के चालुक्यों को उखाड़कर सत्ता प्राप्त की और अगले दो शताब्दियों तक दक्कन पर शासन किया।
राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक दंतिदुर्ग ने 753 ईस्वी में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। उसके बाद के शासकों ने दक्कन को एक अत्यंत शक्तिशाली राज्य बनाया।
राष्ट्रकूट वंश के प्रमुख शासक —
ध्रुव (780-793 ईस्वी) — जिसे "धारावर्ष" भी कहते हैं — उत्तर में प्रतिहारों और पालों को पराजित करने वाले पहले दक्षिणी शासक थे।
गोविंद तृतीय (793-814 ईस्वी) — राष्ट्रकूट वंश के सबसे महान विजेता। उन्होंने उत्तर में कन्नौज पर अधिकार किया और गंगा तक पहुँचे। दक्षिण में गंगों और पल्लवों को पराजित किया।
अमोघवर्ष प्रथम (814-878 ईस्वी) — 64 वर्षों तक शासन किया। वे एक महान शांतिप्रिय और विद्वान शासक थे। उन्होंने "कविराजमार्ग" — कन्नड़ साहित्य का प्रथम महत्त्वपूर्ण ग्रंथ — लिखा। वे जैन धर्म के भक्त थे। अरब यात्री सुलेमान ने उन्हें विश्व के चार महान राजाओं में गिना।
राष्ट्रकूटों की सबसे महान सांस्कृतिक उपलब्धि है — एलोरा का "कैलाश मंदिर"। यह एकाश्म (monolithic) मंदिर एक विशाल चट्टान को काटकर बनाया गया है और विश्व के सबसे अद्भुत वास्तुकला-चमत्कारों में से एक है।
प्रतिहार वंश — भारत के द्वार के संरक्षक
गुर्जर-प्रतिहार वंश (6वीं-11वीं शताब्दी ईस्वी) उत्तर-पश्चिम भारत की वह शक्ति थी जिसने अरब आक्रमणकारियों को भारत के मैदानी भागों में प्रवेश से रोका। इस वीरतापूर्ण भूमिका के कारण उन्हें "प्रतिहार" (द्वारपाल) कहा गया।
7वीं-8वीं शताब्दी में अरब खिलाफत अत्यंत शक्तिशाली हो चुकी थी। मुहम्मद बिन कासिम ने 712 ईस्वी में सिंध पर अधिकार किया। अरब सेनाएँ आगे बढ़ने की कोशिश करती रहीं किंतु प्रतिहारों ने उन्हें रोका।
अरब यात्री और इतिहासकार सुलेमान (851 ईस्वी) ने लिखा — "बाउरा" (भोजदेव प्रतिहार) के राज्य में मुसलमानों का कोई दुश्मन नहीं है जो इससे अधिक मजबूत हो।" यह प्रतिहार शक्ति की स्वीकृति है।
प्रतिहार वंश के महान शासक —
नागभट्ट द्वितीय (805-833 ईस्वी) — जिन्होंने अरबों को कई बार पराजित किया।
मिहिर भोज (836-885 ईस्वी) — प्रतिहार वंश के सबसे महान शासक। उनके अधीन साम्राज्य का विस्तार कन्नौज, राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात तक था। कन्नौज त्रिपक्षीय संघर्ष (Tripartite Struggle) — प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट — का केंद्र था।
प्रतिहार काल में राजपूत वीरता-परंपरा को एक नई पहचान मिली। इस काल में बनाए गए "ओसियाँ के मंदिर" (राजस्थान) और "खजुराहो के मंदिर" (मध्यप्रदेश) राजपूत-काल की कला की श्रेष्ठतम कृतियाँ हैं।
पाल वंश — बंगाल में बौद्ध धर्म का अंतिम किला
पाल वंश (750-1161 ईस्वी) बंगाल और बिहार का वह राजवंश था जिसने बौद्ध धर्म को अपना अंतिम और महानतम संरक्षण दिया। जब समूचे उत्तर भारत में बौद्ध धर्म क्षीण हो रहा था, पाल राजाओं ने उसे जीवित रखा।
पाल वंश की स्थापना गोपाल ने 750 ईस्वी में की। यह एक अनोखी ऐतिहासिक घटना थी — बंगाल में चल रही अराजकता को समाप्त करने के लिए जनता ने "निर्वाचन" के माध्यम से गोपाल को राजा चुना।
पाल वंश के महान शासक —
धर्मपाल (775-810 ईस्वी) — पाल वंश के सबसे महान शासक। उन्होंने "विक्रमशिला विश्वविद्यालय" की स्थापना की — जो नालंदा के बाद भारत का सबसे महान बौद्ध शिक्षा-केंद्र था। उन्होंने "ओदंतपुरी विश्वविद्यालय" की भी स्थापना की। त्रिपक्षीय संघर्ष में उन्होंने कन्नौज पर भी अधिकार किया।
देवपाल (810-850 ईस्वी) — जिनके दरबार में शैलेंद्र वंश (श्रीविजय, इंडोनेशिया) के राजा ने नालंदा विश्वविद्यालय के लिए पाँच गाँव दान में देने की प्रार्थना की।
पाल शासकों ने "पाल चित्रकला शैली" को विकसित किया जो बाद में तिब्बती और नेपाली बौद्ध कला की जननी बनी।
राजपूत काल — नई क्षत्रिय शक्तियों का उदय
उत्तर-गुप्त काल में एक नई सामाजिक और राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ जिसने भारतीय इतिहास को अगली कई शताब्दियों तक प्रभावित किया — राजपूत।
राजपूतों की उत्पत्ति के बारे में कई मत हैं। कुछ विद्वान उन्हें विदेशी मूल — शक, कुषाण, हूण — का मानते हैं जो भारत में आकर हिंदू बन गए और क्षत्रिय दर्जा पाया। कुछ उन्हें स्थानीय जनजातियों से जोड़ते हैं जिन्हें "अग्निकुल" परंपरा द्वारा क्षत्रिय बनाया गया। और कुछ उन्हें प्राचीन क्षत्रिय परंपरा का सातत्य मानते हैं।
राजपूत राजवंशों में प्रमुख थे —
चाहमान (चौहान) वंश — अजमेर और दिल्ली क्षेत्र में। "पृथ्वीराज चौहान" इस वंश के सबसे प्रसिद्ध शासक थे।
परमार वंश — मालवा में। "भोज परमार" (1000-1055 ईस्वी) एक महान विद्वान और कवि शासक थे। "धारा" (धार, मध्यप्रदेश) उनकी राजधानी थी जो एक महान शिक्षा-केंद्र थी।
चंदेल वंश — बुंदेलखंड में। "खजुराहो के मंदिर" चंदेल शासकों की देन हैं।
चालुक्य (सोलंकी) वंश — गुजरात में। "मोढेरा का सूर्य मंदिर" और "सोमनाथ मंदिर" इनकी देन हैं।
राजपूत संस्कृति की विशेषता थी — वीरता, बलिदान और मान-मर्यादा को सर्वोच्च मूल्य मानना। "जौहर" (महिलाओं का अग्नि-समाधि) और "साका" (पुरुषों का युद्धभूमि में मृत्यु-वरण) राजपूत वीरता के प्रतीक थे।
चोल वंश का पुनरुत्थान — तंजावुर की महान सत्ता
चोल वंश संगम काल से चला आ रहा था, किंतु मध्यकाल में इसका एक महान पुनरुत्थान हुआ। मध्यकालीन चोल वंश (850-1279 ईस्वी) दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राजवंश था।
विजयालय चोल (850 ईस्वी) ने चोल वंश के इस पुनरुत्थान की नींव रखी। उन्होंने तंजावुर (तंजोर) पर अधिकार किया जो आगे चलकर चोल साम्राज्य की राजधानी बनी।
किंतु चोल वंश का वास्तविक स्वर्ण युग आया राजराज प्रथम (985-1014 ईस्वी) और राजेंद्र चोल (1014-1044 ईस्वी) के शासनकाल में।
राजराज प्रथम ने —
दक्षिण भारत पर पूरी तरह अधिकार जमाया। श्रीलंका के उत्तरी भाग को जीता। मालदीव द्वीपों को अपने अधीन किया। और तंजावुर का "बृहदेश्वर मंदिर" बनवाया — जो गुप्तकालीन विमान शैली का एक महानतम उदाहरण है और यूनेस्को विश्व धरोहर है।
राजेंद्र चोल ने — श्रीलंका को पूरी तरह जीता। बंगाल तक की उत्तर-विजय की। दक्षिण-पूर्व एशिया — श्रीविजय (इंडोनेशिया), मलाया और बर्मा — पर नौसैनिक आक्रमण किए। यह भारतीय इतिहास का एकमात्र बड़ा नौसैनिक अभियान था जो समुद्र पार गया।
इस काल की कला और स्थापत्य — भारतीय कला का विविधरंगी उत्सव
उत्तर-गुप्त और क्षेत्रीय राज्यों का काल भारतीय कला और स्थापत्य के इतिहास में एक विशेष रूप से समृद्ध और विविधतापूर्ण युग था। इस काल में विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्थापत्य शैलियाँ विकसित हुईं।
नागर शैली (उत्तर भारत) — इसमें "शिखर" (स्पायर) मंदिर का प्रमुख तत्त्व है। यह शिखर उर्ध्वमुखी, वक्र रेखाओं वाला होता है। खजुराहो के मंदिर, ओसियाँ के मंदिर इस शैली के प्रतिनिधि हैं।
द्राविड़ शैली (दक्षिण भारत) — इसमें "विमान" (गोपुरम) मंदिर का प्रमुख तत्त्व है। यह पिरामिडाकार और बहु-मंजिला होता है। बृहदेश्वर मंदिर तंजावुर, कांचीपुरम के मंदिर इस शैली के उदाहरण हैं।
वेसर शैली — नागर और द्राविड़ का मिश्रण — दक्कन में विकसित हुई। बादामी, ऐहोल, पत्तदकल के मंदिर इस शैली के उदाहरण हैं।
मूर्तिकला में इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं —
महाबलिपुरम की अर्जुन की तपस्या — विश्व का सबसे बड़ा शिला-उत्कीर्णन।
एलोरा का कैलाश मंदिर — एकाश्म स्थापत्य का विश्व-चमत्कार।
खजुराहो की प्रेम-मूर्तियाँ — जो मानव-जीवन के सभी पहलुओं को — आध्यात्मिक और लौकिक — एक साथ प्रस्तुत करती हैं।
"तंजावुर चित्रकला" और "पाल चित्रकला" इस काल की प्रमुख चित्रकला-परंपराएँ थीं।
इस काल का धार्मिक जीवन — भक्ति आंदोलन का उदय
उत्तर-गुप्त और क्षेत्रीय राज्यों के काल में भारत के धार्मिक जीवन में एक महान क्रांति हुई — "भक्ति आंदोलन" का उदय। यह आंदोलन दक्षिण भारत में आरंभ हुआ और धीरे-धीरे उत्तर की ओर फैला।
"अलवार" (वैष्णव भक्त-संत) और "नयनार" (शैव भक्त-संत) दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन के अग्रदूत थे। 6वीं से 9वीं शताब्दी के बीच ये संत-कवि तमिलनाडु में घूम-घूमकर भक्ति का प्रचार करते थे।
12 अलवार संतों में प्रमुख थे — थिरुमल, थिरुमंगई अलवार और आंडाल (एकमात्र महिला अलवार जो अत्यंत प्रसिद्ध थीं)। उनकी रचनाएँ "दिव्य प्रबंधम्" में संकलित हैं।
63 नयनार संतों में प्रमुख थे — अप्पर, सुंदरर, तिरुज्ञान संबंदर और माणिक्कवासगर। उनकी रचनाएँ "थिरुमुराई" में संकलित हैं।
इस भक्ति आंदोलन की विशेषताएँ थीं —
जाति-विरोध: भक्त-संत सभी जातियों से थे। एक "पुलैयर" (अस्पृश्य) संत "थिरुनावुक्करसर" (अप्पर) थे।
तमिल भाषा का उपयोग: संस्कृत की जगह तमिल में भक्ति-गीत रचे गए — यह एक सांस्कृतिक लोकतंत्रीकरण था।
मंदिर केंद्रित भक्ति: देवता के साथ व्यक्तिगत प्रेम-संबंध भक्ति का आधार बना।
इस काल का आर्थिक और सामाजिक जीवन
उत्तर-गुप्त और क्षेत्रीय राज्यों के काल में भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज में कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
अर्थव्यवस्था में इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता थी — "भूमि-दान" की व्यवस्था का विस्तार। राजाओं ने बड़े पैमाने पर ब्राह्मणों, मंदिरों और बौद्ध मठों को "अग्रहार" (भूमि-दान) दिया। इससे एक "सामंती अर्थव्यवस्था" विकसित हुई जिसमें भूमि का केंद्रीय महत्त्व था।
व्यापार इस काल में भी सक्रिय था। चोल साम्राज्य का दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ समुद्री व्यापार अत्यंत समृद्ध था। गुजरात और कोंकण के बंदरगाह अरब व्यापारियों के साथ व्यापार करते थे।
"नालंदा विश्वविद्यालय" के विवरण से पता चलता है कि इस काल में शिक्षा का स्तर उच्च था। आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण, तर्कशास्त्र, बौद्ध दर्शन — सभी विषयों की शिक्षा दी जाती थी।
सामाजिक जीवन में जाति-व्यवस्था और अधिक कठोर हो गई। किंतु साथ ही भक्ति आंदोलन ने जाति-बंधनों को चुनौती दी।
स्त्री की स्थिति में इस काल में मिश्रित चित्र था। एक ओर "आंडाल" जैसी संत-कवयित्री और "रानी रुद्रमा देवी" जैसी शासक-महिलाएँ थीं। दूसरी ओर "सती-प्रथा" और "बाल-विवाह" का प्रचलन बढ़ रहा था।
उत्तर-गुप्त काल की विरासत — मध्यकालीन भारत का मंच
उत्तर-गुप्त और क्षेत्रीय राज्यों का यह काल — जिसे कभी-कभी "प्रारंभिक मध्यकाल" भी कहते हैं — भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण संधि-कड़ी था। इस काल ने जो बोया, उसे मध्यकालीन और आधुनिक भारत ने काटा।
इस काल की सबसे बड़ी और स्थायी विरासत थी — "क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों" का विकास। इस काल में तमिल, कन्नड़, तेलुगु, बंगाली, मराठी और राजस्थानी साहित्य की नींव पड़ी। ये भाषाएँ और उनके साहित्य आज भी भारत की सांस्कृतिक विविधता का आधार हैं।
मंदिर-स्थापत्य की परंपरा इस काल में इतनी परिपक्व हुई कि आने वाली शताब्दियों में जो मंदिर बने — तंजावुर, मदुरै, कांचीपुरम, खजुराहो, भुवनेश्वर — वे सब इसी परंपरा के विकसित रूप हैं।
भक्ति आंदोलन — जो इस काल में दक्षिण में आरंभ हुआ — 12वीं-17वीं शताब्दी में उत्तर भारत में "संत-परंपरा" के रूप में प्रस्फुटित हुआ। कबीर, मीरा, तुलसीदास, सूरदास — ये सब उसी भक्ति-परंपरा की संतानें हैं जिसकी नींव दक्षिण के अलवार और नयनार संतों ने रखी थी।
किंतु इस काल की सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी थी — एकता का अभाव। जब मुहम्मद गजनवी (998-1030 ईस्वी) और बाद में मुहम्मद गोरी (1175-1206 ईस्वी) ने भारत पर आक्रमण किए, तो बिखरे हुए राजपूत राज्य उनका सामना संगठित रूप से नहीं कर सके। यदि प्रतिहारों जैसी एक केंद्रीय शक्ति होती, तो भारत का इतिहास शायद भिन्न होता।
उत्तर-गुप्त काल वह विशाल, रंगीन और जीवंत चित्र था जिसमें भारत की समूची विविधता — उत्तर और दक्षिण, संस्कृत और द्रविड़, बौद्ध और हिंदू, योद्धा और कवि — एक साथ अपनी पूरी शक्ति और सौंदर्य के साथ उपस्थित थी।