दक्षिण भारतीय राज्य (South Indian Kingdoms)

 


दक्षिण भारत — एक अनूठी सभ्यता का परिचय

भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिणी छोर पर एक ऐसी सभ्यता पली-बढ़ी जो उत्तर की आर्य-संस्कृत परंपरा से भिन्न थी, किंतु उतनी ही प्राचीन, उतनी ही गहरी और उतनी ही महान थी। द्राविड़ सभ्यता — जिसके मूल में तमिल, कन्नड़, तेलुगु और मलयालम भाषाएँ और संस्कृतियाँ हैं — का इतिहास हजारों वर्षों का है। दक्षिण भारत के राज्यों ने वह कार्य किया जो शायद उत्तर के किसी भी साम्राज्य ने नहीं किया — उन्होंने समुद्र को पार किया, एशिया के दूर-दूर के कोनों में अपनी सभ्यता, धर्म और व्यापार का विस्तार किया और भारतीय संस्कृति को एक अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी।

दक्षिण भारत की भौगोलिक विशेषता — विंध्य पर्वत की प्राकृतिक सीमा — ने इसे उत्तर के आक्रमणकारियों से काफी हद तक बचाए रखा। जब उत्तर भारत में एक के बाद एक विदेशी आक्रमण हो रहे थे, दक्षिण में पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, चोल, होयसाल, काकतीय और विजयनगर जैसे महान राजवंश निर्बाध रूप से भारतीय सभ्यता की रक्षा और पोषण करते रहे।

दक्षिण भारत की सबसे बड़ी देन है — मंदिर-स्थापत्य की द्राविड़ शैली जिसके गोपुरम (प्रवेश-द्वार) आज भी आकाश को छूते हुए खड़े हैं और जो भारतीय कला की अमर पहचान बन गए हैं। साथ ही तमिल साहित्य — जो संस्कृत के समानांतर विश्व की सबसे पुरानी जीवित साहित्यिक परंपराओं में से एक है — दक्षिण भारत का अमूल्य उपहार है।


संगम काल — तीन प्राचीन तमिल राजवंश

दक्षिण भारत के इतिहास का आरंभ "संगम काल" (300 ईसापूर्व — 300 ईस्वी) से होता है। यह काल तीन महान तमिल राजवंशों — चेर, चोल और पांड्य — का युग था जो एक साथ तमिलनाडु और केरल के विभिन्न भागों पर शासन करते थे।

चेर वंश (Kerala क्षेत्र) —

चेर राजाओं की राजधानी वांजि थी। उनका प्रमुख बंदरगाह मुजिरिस (आज का कोडुंगल्लूर) था जो रोम के साथ व्यापार का केंद्र था। रोमन लेखकों ने मुजिरिस की विशाल समृद्धि का वर्णन किया है। एक रोमन कहावत थी — "काली मिर्च लाओ और सोना ले जाओ।"

"पुरनानूरु" में चेर राजाओं की वीरता और उदारता के अनेक संदर्भ मिलते हैं। "उदयन जेरल आदन" वह चेर राजा था जिसने कुरुक्षेत्र युद्ध के योद्धाओं को भोजन कराया — यह पौराणिक परंपरा और तमिल इतिहास का एक रोचक संगम है।

पांड्य वंश (दक्षिणी तमिलनाडु) —

पांड्यों की राजधानी मदुरै थी जो संगम काल का सबसे महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र था। यहीं "तमिल संगम" (कवियों की सभा) आयोजित होती थी जहाँ महान साहित्य की रचना हुई।

पांड्यों ने रोम के ऑगस्टस सीजर के दरबार में दूत भेजे — यह दक्षिण भारत और रोमन साम्राज्य के बीच सीधे राजनयिक संबंध का प्रमाण है।

प्रारंभिक चोल वंश (मध्य तमिलनाडु) —

संगम काल के चोलों की राजधानी उरैयूर और बाद में पुहार (कावेरीपट्टनम) थी। "करिकाल चोल" संगम काल का सबसे प्रसिद्ध चोल राजा था। उसने "कावेरी नदी" पर एक विशाल बाँध बनवाया और कृषि को समृद्ध किया।


पल्लव वंश — कांची का गौरव और द्राविड़ स्थापत्य का उदय

पल्लव वंश (275-897 ईस्वी) दक्षिण भारत के इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। पल्लवों ने न केवल तमिलनाडु और आंध्र के उत्तरी भाग पर शासन किया, बल्कि उन्होंने द्राविड़ मंदिर-स्थापत्य को वह रूप दिया जो आगे चलकर दक्षिण भारतीय कला की पहचान बना।

पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम थी — जिसे "सात पवित्र नगरों" में गिना जाता है और जो आज भी एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है।

पल्लव वंश के प्रमुख शासक —

सिंहविष्णु (575-600 ईस्वी) — पल्लव शक्ति के पुनरुत्थान के जनक। उन्होंने कालभ्र (जिन्होंने तीनों तमिल राजवंशों को पराजित किया था) को हराया।

महेंद्रवर्मन प्रथम (600-630 ईस्वी) — एक बहुमुखी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व। उन्होंने "मंडपम" (गुफा-मंदिर) की परंपरा आरंभ की। उनका व्यंग्य नाटक "मत्तविलास प्रहसन" संस्कृत साहित्य की एक अनूठी रचना है।

नरसिंहवर्मन प्रथम "महामल्ल" (630-668 ईस्वी) — पल्लव वंश के सबसे महान शासक। उन्होंने चालुक्य राजा पुलकेशी द्वितीय को तीन बार पराजित किया। उन्होंने "महाबलिपुरम" (मामल्लपुरम) की स्थापना की।

नरसिंहवर्मन द्वितीय (695-722 ईस्वी) — जिन्होंने "कांचीपुरम के कैलासनाथ मंदिर" का निर्माण करवाया — यह संरचनात्मक पत्थर मंदिर-निर्माण का दक्षिण भारत में पहला उदाहरण है।

पल्लव वंश का महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक योगदान था — "पल्लव-लिपि" का विकास जिससे दक्षिण-पूर्व एशिया — इंडोनेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया — की लिपियाँ विकसित हुईं।


चालुक्य वंश — दक्कन के महान निर्माता

चालुक्य वंश दक्षिण भारत के इतिहास में सबसे दीर्घकालिक और प्रभावशाली राजवंशों में से एक था। इसकी तीन प्रमुख शाखाएँ थीं — बादामी के चालुक्य, वेंगी के चालुक्य और कल्याणी के चालुक्य

बादामी के चालुक्य (543-753 ईस्वी) —

पुलकेशी प्रथम ने "वातापी" (बादामी) को राजधानी बनाया। उनके पुत्र कीर्तिवर्मन ने कोंकण, कडंब और नल जैसे पड़ोसी राज्यों को जीता।

पुलकेशी द्वितीय (610-642 ईस्वी) — बादामी चालुक्यों का सबसे महान शासक। उन्होंने हर्षवर्धन को पराजित किया। उनके दरबार में ईरानी राजदूत आए। अजंता गुफाओं में उनके दरबार का एक चित्र है। किंतु उनका अंत दुखद था — पल्लव राजा नरसिंहवर्मन ने वातापी को नष्ट कर उन्हें मार दिया।

कल्याणी के चालुक्य (973-1190 ईस्वी) —

ये "पश्चिमी चालुक्य" भी कहलाते हैं। इनकी राजधानी मान्यखेत (मान्यकेत) और बाद में कल्याणी (आज का बसवकल्याण, कर्नाटक) थी।

विक्रमादित्य षष्ठ (1076-1126 ईस्वी) — कल्याणी चालुक्यों का सबसे महान शासक। उनके दरबार में "बिल्हण" (कश्मीरी कवि, जिन्होंने "विक्रमांकदेवचरित" लिखा) और "विज्ञानेश्वर" (जिन्होंने "मिताक्षरा" — हिंदू विधिशास्त्र का महान ग्रंथ — लिखा) जैसे विद्वान थे।

वेंगी के चालुक्य (615-1070 ईस्वी) — पूर्वी आंध्र में। इनका प्रमुख राजनीतिक महत्त्व चोल और राष्ट्रकूट के बीच संघर्ष में था।


राष्ट्रकूट वंश — दक्कन की सर्वोच्च शक्ति

राष्ट्रकूट वंश (753-982 ईस्वी) दक्षिण भारत का वह साम्राज्य था जिसने उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया और एक शताब्दी से अधिक समय तक दक्कन की सर्वोच्च शक्ति बना रहा।

राष्ट्रकूट वंश की उत्पत्ति "लट्टलूर" (लातूर, महाराष्ट्र) क्षेत्र में हुई। दंतिदुर्ग ने 753 ईस्वी में बादामी के चालुक्यों को पराजित करके इस वंश की स्थापना की।

राष्ट्रकूट वंश की प्रमुख उपलब्धियाँ —

कृष्ण प्रथम (758-773 ईस्वी) — जिन्होंने "एलोरा का कैलास मंदिर" बनवाया। यह एकाश्म मंदिर (एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया) विश्व की सबसे महान वास्तुकला-उपलब्धियों में से एक है।

ध्रुव "धारावर्ष" (780-793 ईस्वी) — पहले दक्षिणी राजा जिन्होंने उत्तर भारत में प्रतिहार और पाल दोनों को पराजित किया।

गोविंद तृतीय (793-814 ईस्वी) — राष्ट्रकूट साम्राज्य का सबसे विस्तृत काल। उत्तर में कन्नौज तक और दक्षिण में श्रीलंका तक उनका प्रभाव था।

अमोघवर्ष प्रथम (814-878 ईस्वी) — 64 वर्षों का दीर्घ शासन। उन्होंने "कविराजमार्ग" — कन्नड़ साहित्य का पहला महत्त्वपूर्ण ग्रंथ — लिखा। जैन धर्म के भक्त थे।

अरब यात्री सुलेमान और अल-मसूदी ने राष्ट्रकूट शासकों की प्रशंसा की। अल-मसूदी ने राष्ट्रकूट राजा को विश्व के चार महान राजाओं में गिना — अन्य तीन थे — खलीफा, बीजेंटाइन सम्राट और चीन का सम्राट।


चोल साम्राज्य का स्वर्ण युग — राजराज और राजेंद्र की महागाथा

भारतीय इतिहास में मध्यकालीन चोल वंश (850-1279 ईस्वी) उन विरले राजवंशों में है जिन्होंने राजनीतिक विजय, प्रशासनिक कुशलता और सांस्कृतिक उपलब्धि — तीनों को एक साथ इतनी ऊँचाई पर पहुँचाया। "चोल" शब्द सुनते ही मन में उठते हैं — "बृहदेश्वर मंदिर" के ऊँचे विमान, राजेंद्र चोल की नौसेना का समुद्र-विजय और ग्राम-सभाओं की लोकतांत्रिक परंपरा।

राजराज प्रथम (985-1014 ईस्वी) — चोल साम्राज्य के महानतम शासकों में प्रथम। उन्होंने —

दक्षिण भारत की समग्र विजय की — केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक।

श्रीलंका के उत्तरी भाग पर अधिकार किया और वहाँ "पोलोन्नरुवा" को नई राजधानी बनाई।

मालदीव द्वीपों को अपने साम्राज्य में मिलाया।

"बृहदेश्वर मंदिर" (तंजावुर) का निर्माण करवाया — जो 1010 ईस्वी में पूर्ण हुआ और जिसका "विमान" (शिखर) 66 मीटर ऊँचा है। यह उस काल का विश्व का सबसे ऊँचा मंदिर-शिखर था।

राजेंद्र चोल प्रथम (1014-1044 ईस्वी) — "चोलगंगम" की उपाधि धारण करने वाले। उन्होंने —

उत्तर-विजय — गंगा नदी तक सेना ले गए और "गंगैकोंड" (गंगा-विजेता) की उपाधि ली। "गंगैकोंड चोलपुरम" नई राजधानी बसाई।

नौसैनिक अभियानश्रीविजय (इंडोनेशिया/मलाया) के विरुद्ध एक महान नौसैनिक अभियान — यह भारतीय इतिहास का सबसे दूरगामी और सफल नौसैनिक अभियान था।


चोल साम्राज्य की नौसेना — समुद्र को जीतने वाले

चोल नौसेना भारतीय इतिहास की सबसे शक्तिशाली और सक्रिय नौसेना थी। "समुद्र-विजय" चोल शासकों का एक प्रमुख लक्ष्य था और इसे उन्होंने बड़ी सफलता के साथ प्राप्त किया।

राजराज प्रथम ने मालदीव और श्रीलंका के तटीय भागों पर नौसैनिक नियंत्रण स्थापित किया।

राजेंद्र चोल का 1025 ईस्वी का नौसैनिक अभियान — यह भारतीय इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण समुद्री अभियान था। इस अभियान में चोल नौसेना ने श्रीविजय (आज का इंडोनेशिया और मलेशिया) पर आक्रमण किया और "कदारम" (कादाहम, केलंतान, मलाया) को जीता।

इस अभियान में चोल नौसेना ने —

बंगाल की खाड़ी को पार किया।

अंडमान-निकोबार द्वीपों से होते हुए मलाया प्रायद्वीप तक पहुँची।

श्रीविजय के राजा संग्राम विजयोत्तुंगवर्मन को पराजित किया।

यह अभियान क्यों महत्त्वपूर्ण था? श्रीविजय भारत और चीन के बीच के समुद्री व्यापार-मार्ग पर स्थित था। चोल इस मार्ग को मुक्त रखना चाहते थे।

चोल नौसेना की तकनीक के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं है, किंतु "कोट्टम" (कट्टमरन) जैसी नौकाओं का उपयोग किया जाता था। चोल काल में "पुहार" और "नागपट्टिनम" प्रमुख नौसैनिक अड्डे थे।


चोल प्रशासन — लोकतंत्र का प्राचीन स्वरूप

चोल साम्राज्य की सबसे अनूठी और प्रेरणादायक विशेषता थी — इसकी ग्राम-स्तरीय लोकतांत्रिक व्यवस्था। यह दुनिया के किसी भी मध्यकालीन साम्राज्य में नहीं मिलती।

"उत्तरमेरूर शिलालेख" (919 ईस्वी, कांचीपुरम जिला) — यह शिलालेख ग्राम-परिषद के चुनाव की विस्तृत प्रक्रिया बताता है और विश्व के सबसे पुराने चुनाव-संविधानों में से एक माना जाता है।

इस शिलालेख के अनुसार ग्राम को "वार्ड" में विभाजित किया जाता था और प्रत्येक वार्ड एक प्रतिनिधि चुनता था।

योग्यता की शर्तें थीं:

उम्मीदवार की आयु 35 से 70 वर्ष के बीच हो। वह 30 वेली (लगभग 10 एकड़) भूमि का स्वामी हो। वह अपने घर में रहता हो (भाड़े के घर में नहीं)। वह वेद का ज्ञाता हो।

अयोग्यता की शर्तें:

जिसने पिछले तीन वर्षों में लेखा जोखा नहीं दिया। जो पतितों का सहभागी हो। जिस पर दुराचरण का आरोप हो।

चुनाव "कुडवोलाई" (lottery) पद्धति से होते थे — ताड़ के पत्ते पर उम्मीदवारों के नाम लिखकर एक बर्तन में डाले जाते थे और एक बच्चा उसमें से नाम निकालता था।

परिषद की दो समितियाँ थीं — "वार्ड समिति" (महासभा — सभी विषयों पर) और "ग्राम-कोष समिति" (वित्त प्रबंधन)।


होयसाल वंश — कर्नाटक की कला-क्रांति

होयसाल वंश (1000-1346 ईस्वी) कर्नाटक के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है जिसे "पत्थर में संगीत" कहा जाता है। होयसाल मंदिरों की जालीदार नक्काशी, हजारों मूर्तियों की अनंत श्रृंखला और उनकी "तारा-आकृति" (star-shaped) वेदिका — ये सब होयसाल कला को विश्व-स्तर पर अनूठा बनाते हैं।

होयसाल वंश के संस्थापक "विष्णुवर्धन" (1108-1142 ईस्वी) थे जिन्होंने चोलों से "गंगवाड़ी" जीती। उनके काल में "बेलूर का चेन्नकेशव मंदिर" बनाया गया।

होयसाल वंश के प्रमुख शासक —

वीर बल्लाल द्वितीय (1173-1220 ईस्वी) — होयसाल साम्राज्य के विस्तार के महान काल। "हलेबिड" (द्वारसमुद्र) को राजधानी बनाया।

होयसाल काल में तीन महान मंदिर बने —

"बेलूर का चेन्नकेशव मंदिर" — इसमें 118 खंभे हैं, प्रत्येक अलग डिजाइन का। बाहरी दीवारों पर मधुमक्खी के छत्ते की तरह उत्कीर्ण हजारों मूर्तियाँ हैं।

"हलेबिड का होयसलेश्वर मंदिर" — जुड़वाँ मंदिर जिसमें 240 मीटर की दीवार पर निरंतर मूर्ति-श्रृंखला है।

"सोमनाथपुर का केशव मंदिर" — तारा-आकृति की वेदिका का सबसे परिपूर्ण उदाहरण।

2023 में यूनेस्को ने इन तीनों होयसाल मंदिरों को विश्व धरोहर घोषित किया।


काकतीय वंश — आंध्र का स्वाभिमान

काकतीय वंश (1083-1323 ईस्वी) आंध्रप्रदेश और तेलंगाना का वह राजवंश था जिसने तेलुगु भाषा और संस्कृति को पूर्ण पहचान और गौरव दिया।

काकतीय वंश की राजधानी "वारंगल" थी। इस वंश का उदय राष्ट्रकूट सामंतों के रूप में हुआ किंतु बाद में यह स्वतंत्र साम्राज्य बन गया।

काकतीय वंश के महान शासक —

गणपतिदेव (1199-1262 ईस्वी) — काकतीय वंश के सबसे महान शासक। उनके काल में साम्राज्य का अभूतपूर्व विस्तार हुआ। उन्होंने "गोलकुंडा" किले की नींव रखी। उनके शासन में "रुद्रमादेवी" — एक महान महिला शासक — भी रहीं।

रानी रुद्रमादेवी (1262-1289 ईस्वी) — भारतीय इतिहास की सबसे असाधारण महिला शासकों में से एक। उन्होंने एक पुरुष-प्रधान समाज में न केवल सत्ता संभाली, बल्कि अनेक युद्धों में व्यक्तिगत रूप से नेतृत्व किया। "मार्को पोलो" ने उनके शासन का प्रशंसात्मक विवरण दिया है।

प्रतापरुद्र (1295-1323 ईस्वी) — अंतिम काकतीय राजा। अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति "मलिक काफूर" ने 1310 ईस्वी में वारंगल पर आक्रमण किया। और गयासुद्दीन तुगलक के सेनापति "उलुग खान" ने 1323 ईस्वी में काकतीय साम्राज्य को नष्ट कर दिया।

काकतीय काल में "तेलुगु साहित्य" का अभूतपूर्व विकास हुआ।


विजयनगर साम्राज्य — हिंदू सभ्यता का महान किला

विजयनगर साम्राज्य (1336-1646 ईस्वी) दक्षिण भारत के इतिहास का सबसे महान और अंतिम हिंदू साम्राज्य था। यह साम्राज्य एक ऐसे काल में उभरा जब उत्तर भारत दिल्ली सल्तनत के अधीन था और दक्षिण के हिंदू राज्य एक-एक करके सल्तनत की सेनाओं के सामने ढह रहे थे।

विजयनगर की स्थापना की कहानी अत्यंत रोचक है। "हरिहर" और "बुक्का" — दो भाई जो कभी काकतीय दरबार में थे और बाद में दिल्ली सल्तनत की कैद में आए — ने विद्यारण्य नामक महान संत के मार्गदर्शन में 1336 ईस्वी में "विजयनगर" (विजय का नगर) की स्थापना की। यह नगर तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर "हम्पी" में बसाया गया।

विजयनगर साम्राज्य के चार राजवंश थे — संगम, सालुव, तुलुव और अरविडु

संगम वंश (1336-1485 ईस्वी) — संस्थापक काल।

सालुव वंश (1485-1505 ईस्वी) — संक्षिप्त किंतु महत्त्वपूर्ण।

तुलुव वंश (1505-1570 ईस्वी) — कृष्णदेवराय इसी वंश में थे।

अरविडु वंश (1570-1646 ईस्वी) — 1565 के तालीकोटा युद्ध के बाद का पतन-काल।

विजयनगर साम्राज्य की महानता इसलिए और भी प्रभावशाली है क्योंकि यह मुस्लिम सल्तनतों के बीच घिरा हुआ था — बहमनी और बाद में "पाँच दक्कनी सल्तनतें" (बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर, बीदर, बेरार)।


कृष्णदेवराय — विजयनगर का शिखर

कृष्णदेवराय (1509-1529 ईस्वी) विजयनगर साम्राज्य के — और शायद मध्यकालीन दक्षिण भारत के — सबसे महान शासक थे। उनका शासन-काल विजयनगर का "स्वर्ण युग" था।

कृष्णदेवराय की प्रमुख उपलब्धियाँ —

सैन्य विजय: उन्होंने बीजापुर, गोलकुंडा और उड़ीसा के गजपति वंश को पराजित किया। "कोंडविड" और "कोंडपल्ली" के किले जीते। रायचूर और मुदगल जो बहमनी के पास थे, उन्हें वापस लिया।

प्रशासनिक कुशलता: उन्होंने व्यापार को प्रोत्साहित किया। पुर्तगाली व्यापारियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखे। सेना में तोपखाने का उपयोग आरंभ किया।

साहित्यिक योगदान: कृष्णदेवराय स्वयं एक महान कवि थे। उन्होंने तेलुगु में "आमुक्तमाल्यदा" (विष्णुभक्त आंडाल की कथा) लिखी जो तेलुगु साहित्य की पंच महाकाव्यों में गिनी जाती है। उन्होंने संस्कृत में "जाम्बवती कल्याणम्" और "उषापरिणयम्" भी लिखे।

"अष्ट दिग्गज" — उनके दरबार में आठ महान तेलुगु कवि थे जिन्हें यह उपाधि मिली थी।

समकालीन यात्रियों का विवरण — पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पायस और फर्नाँव नुनिज ने विजयनगर का अत्यंत भव्य वर्णन किया है।

1565 में "तालीकोटा का युद्ध" — जिसमें पाँच दक्कनी सल्तनतों ने मिलकर विजयनगर को पराजित किया — कृष्णदेवराय के बाद के कमजोर शासकों के काल में हुआ और हम्पी नष्ट कर दिया गया।


दक्षिण भारत की कला और स्थापत्य — विश्व की अनूठी विरासत

दक्षिण भारतीय राज्यों की सबसे स्थायी और महान विरासत उनकी कला और स्थापत्य परंपरा है। यह परंपरा इतनी विशाल, इतनी विविध और इतनी उत्कृष्ट है कि विश्व की किसी भी सभ्यता से तुलना की जा सकती है।

मंदिर-स्थापत्य की द्राविड़ शैली

"गोपुरम" (प्रवेश-द्वार) — जो आकाश को छूता प्रतीत होता है और मंदिर परिसर का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है।

"विमान" (मुख्य शिखर) — गर्भगृह के ऊपर का पिरामिडाकार ढाँचा।

"मंडपम" — स्तंभ-युक्त हॉल जहाँ उत्सव होते थे।

"प्राकार" — मंदिर परिसर की चहारदीवारी।

प्रमुख मंदिर-स्थल —

तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर — 66 मीटर ऊँचा विमान, 80 टन का शिखर-पत्थर।

मदुरै का मीनाक्षी मंदिर — 14 गोपुरम, सबसे ऊँचा 52 मीटर।

महाबलिपुरम — खुले समुद्र-तट पर चट्टानों को काटकर बने मंदिर और रथ।

हम्पी के खंडहर — यूनेस्को विश्व धरोहर।

काँची के कैलासनाथ मंदिर — संरचनात्मक मंदिर-निर्माण का दक्षिण भारत में पहला उदाहरण।

चोल-कांस्य मूर्तिकला"नटराज" की कांस्य मूर्ति चोल कला की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। "शिव नटराज" — ब्रह्माण्डीय नृत्य करते शिव — अब भौतिक विज्ञान का प्रतीक बन गए हैं और CERN (जेनेवा) में इनकी प्रतिमा स्थापित है।


दक्षिण भारत का साहित्य और भाषाएँ

दक्षिण भारतीय राज्यों ने भारतीय साहित्य को जो दिया, वह संस्कृत साहित्य के समानांतर एक स्वतंत्र और उतनी ही समृद्ध परंपरा है।

तमिल साहित्य

संगम काल की "अकम्" और "पुरम्" कविताएँ।

"तिरुक्कुरल"तिरुवल्लुवर की रचना जिसे "तमिल वेद" कहा जाता है। इसके 1330 द्विपद नैतिकता, प्रेम और राजनीति पर हैं।

"सिलप्पतिकारम"इलंगो आडिगल की रचना जो तमिल का पहला महाकाव्य माना जाता है।

"मणिमेकलाई" — बौद्ध प्रभाव वाला महाकाव्य।

अलवार और नयनार संतों की भक्ति-रचनाएँ

कन्नड़ साहित्य

"कविराजमार्ग" (अमोघवर्ष, 814 ईस्वी) — पहला महत्त्वपूर्ण कन्नड़ ग्रंथ।

"आदिकवि पम्प" — कन्नड़ के पहले महाकवि जिन्होंने "आदिपुराण" और "विक्रमार्जुन विजय" लिखे।

"रन्न""गदायुद्ध" के रचयिता।

तेलुगु साहित्य

"नन्नय" — तेलुगु के आदिकवि जिन्होंने "आंध्र महाभारत" लिखना आरंभ किया।

"तिक्कना" और "एर्राप्रगड" — जिन्होंने महाभारत का अनुवाद पूरा किया।

"श्रीनाथ" — तेलुगु के सबसे महान मध्यकालीन कवि।

कृष्णदेवराय की "आमुक्तमाल्यदा"

मलयालम साहित्य

"रामचरितम्" — मलयालम का प्राचीनतम काव्य।

"एझुत्तच्छन" — आधुनिक मलयालम के जनक।


दक्षिण भारतीय राज्यों की अमर विरासत

दक्षिण भारतीय राज्यों की विरासत को उचित रूप में समझना तब तक संभव नहीं जब तक हम यह न जानें कि इस विरासत का प्रभाव केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं रहा — यह समूचे दक्षिण-पूर्व एशिया में फैला।

"भारतीय सांस्कृतिक साम्राज्य" (Indianized Kingdoms) — इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, म्यांमार और लाओस में भारतीय संस्कृति, धर्म, कला और भाषा का जो प्रसार हुआ, वह मुख्यतः दक्षिण भारतीय व्यापारियों, धर्म-प्रचारकों और कारीगरों के माध्यम से हुआ।

"बोरोबुदूर" (इंडोनेशिया) — दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर जो पल्लव-प्रभावित है।

"अंगकोर वाट" (कंबोडिया) — विष्णु को समर्पित विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक जो चोल शैली से प्रेरित है।

"नालंदा जैसे विश्वविद्यालय" — दक्षिण भारत के मंदिरों में शिक्षा की व्यवस्था होती थी — "घटिका" (मंदिर-महाविद्यालय) इस परंपरा का हिस्सा थे।

"भक्ति आंदोलन की विरासत" — जो दक्षिण में आरंभ हुआ और उत्तर में कबीर, मीरा, तुलसीदास जैसे संतों के माध्यम से परिपक्व हुआ।

"कर्नाटक संगीत" — दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत की महान परंपरा जो पल्लव, चोल और विजयनगर काल में विकसित हुई।

दक्षिण भारतीय राज्यों ने भारतीय सभ्यता को वह स्थायित्व दिया जो उत्तर के निरंतर आक्रमणों के बावजूद भारत की मूल पहचान को जीवित रखता था। जब-जब उत्तर में संकट आया, दक्षिण ने भारतीयता की लौ को जलाए रखा। यही इन राज्यों की सबसे बड़ी और अमर विरासत है।


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